नयी दिल्ली, दो सितंबर (भाषा) एकनाथ शिंदे के गुट ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने पार्टी प्रमुख के हाथों में सारी ताकत जमा होने से रोकने और पार्टी को अधिक ‘लोकतांत्रिक’ बनाने के लिए जो संगठनात्मक ढांचा बनाया था, उसे उद्धव ठाकरे ने 2018 में काफी हद तक बदल दिया।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ को शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने बताया कि 1999 में निर्वाचन आयोग की ओर से सभी राजनीतिक दलों को अपने-अपने संविधान रिकॉर्ड पर रखने के निर्देश दिए जाने के बाद शिवसेना का संविधान आयोग को सौंपा गया था।
कौल ने कहा कि बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद पार्टी ने उस ढांचे में बुनियादी बदलाव किए।
कौल ने कहा, ‘‘मुख्य तर्कों में से एक यह है कि निर्वाचन आयोग ने पार्टी के संविधान की जांच करने का एक ऐसा अधिकार क्षेत्र बना लिया जो पहले नहीं था। वर्ष 1994 से निर्वाचन आयोग अलग-अलग आदेशों और पत्रों के जरिए सभी राजनीतिक दलों को लिखता रहा है कि उनके संविधान लोकतांत्रिक होने चाहिए।’’
कौल ने कहा, ‘‘पार्टियों को यह पक्का करना चाहिए कि उनके संविधान लोकतांत्रिक हों। एक समय शिवसेना ने कहा कि हमारा संविधान चुनाव की इजाजत नहीं देता है। निर्वाचन आयोग ने शिवसेना को आश्वस्त किया और संशोधित संविधान सामने आया। उसके बाद अचानक 2018 में नया संविधान सामने आया।’’
वरिष्ठ वकील ने यह भी कहा कि बालासाहेब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे ने संविधान में बदलाव किया और पार्टी प्रमुख के हाथों में सारी ताकत सौंप दी। उन्होंने आगे यह भी तर्क दिया कि पार्टी ने बदले हुए संविधान को आयोग के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं कराया।
वकील ने न्यायालय को बताया कि निर्वाचन आयोग ने सही कहा है कि किसी राजनीतिक पार्टी के भीतर किसके पास बहुमत है, यह तय करने के लिए विधायी बहुमत ही सही पैमाना है।
इस मामले में अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।
उद्धव ठाकरे के गुट ने पहले उच्चतम न्यायालय से कहा था कि एकनाथ शिंदे के गुट की ओर से‘शिवसेना’ का नाम और उसके चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करना ‘गैर-कानूनी’ है।
ठाकरे गुट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवकता कपिल सिब्बल और देवदत्त कामत ने कहा था कि शिंदे गुट को ‘असली’ पार्टी के तौर पर मान्यता देना एक ‘संवैधानिक पाप’ को इनाम देने जैसा होगा।
पीठ ठाकरे गुट की ओर से 2024 में दायर उन दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें निर्वाचन अयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसके तहत शिंदे गुट को ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न दिया गया था।
भाषा संतोष नरेश
नरेश