उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने ली मदरसा बोर्ड की जगह

उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने ली मदरसा बोर्ड की जगह

उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने ली मदरसा बोर्ड की जगह
Modified Date: July 1, 2026 / 06:50 pm IST
Published Date: July 1, 2026 6:50 pm IST

देहरादून, एक जुलाई (भाषा) उत्तराखंड में बुधवार से मदरसा बोर्ड की जगह राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने ले ली जिसके तहत मुसलमान समेत सभी छह अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के शिक्षण संस्थान आएंगे।

यहां आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्राधिकरण की शुरूआत की और कहा कि संपूर्ण विश्व को अपनी ज्ञानधारा से सिंचित करने वाले उत्तराखंड की यह जिम्मेदारी है कि वह शिक्षा एवं संस्कार के मामले में एक आदर्श स्थापित करे।

उन्होंने कहा, “इसी को ध्यान में रखते हुए हमारी सरकार ने समाज के सभी वर्गों को गुणवत्तापूर्ण, संस्कार युक्त और आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराने के उददेश्य से एक जुलाई 2026 से उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की स्थापना करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। इसी के साथ मदरसा बोर्ड को भंग कर दिया गया है।”

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने विभिन्न अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मान्यता प्रमाण पत्र भी वितरित किए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह केवल उत्तराखंड ही नहीं बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था के इतिहास में भी मील का पत्थर साबित होगा।

उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता के रूप में ‘वन नेशन वन लॉ’ की तरह अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के रूप में ‘वन नेशन वन एजुकेशन’ की शुरूआत भी उतराखंड से हो रही है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह उनकी सरकार का संकल्प है कि राज्य में हर वर्ग, क्षेत्र और समुदाय के बच्चे को अच्छे संस्कार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले।

उन्होंने कहा, “जब एक बच्चे को अच्छी शिक्षा मिलती है तो वह न केवल अपने भविष्य को बेहतर बनाता है बल्कि अपने परिवार, समाज और देश को बेहतर बनाने में अपना अमूल्य योगदान देता है।”

उन्होंने कहा, “आज हम मात्र एक संस्था की शुरूआत नहीं कर रहे हैं बल्कि ऐसे भविष्य की मजबूत नींव रख रहे हैं जिसके जरिये राज्य के प्रत्येक बच्चे के सपनों को एक नयी उड़ान मिलेगी।”

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की स्थापना किसी भी समुदाय की धार्मिक पहचान, परंपराओं या अधिकारों को प्रभावित करने के लिए नहीं बल्कि समाज के सभी वर्गो को बेहतर शैक्षणिक अवसर उपलब्ध कराने के लिए की गयी है।

उन्होंने कहा, “हमारा उददेश्य आस्था और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करना है। हम चाहते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय का प्रत्येक बच्चा अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा रहे और विज्ञान, गणित, कम्प्यूटर, भाषा, तथा आधुनिक तकनीकों में भी दक्ष बने।”

मुख्यमंत्री ने कहा कि अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण केवल मान्यता देने वाली संस्था नहीं बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण, पारदर्शी व्यवस्था और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन का मजबूत माध्यम बनेगा।

उन्होंने उम्मीद जतायी कि यह प्राधिकरण आने वाले समय में हजारों बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएगा और गुणवत्तापूर्ण एवं समावेशी शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी राज्य बनाएगा।

पिछले साल अगस्त में गैरसैंण में हुए राज्य विधानसभा के मानसून सत्र में उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक–2025 पारित किया गया था जिसे अक्टूबर में राज्यपाल ने मंजूरी दे दी थी।

नए कानून में प्रदेश में मुसलमान समुदाय के साथ ही अन्य पांच अल्पसंख्यक समुदायों सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदाय के शिक्षण संस्थानों को भी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का दर्जा दिया गया है। इससे पहले अल्पसंख्यक संस्थानों की मान्यता केवल मुस्लिम समुदाय तक सीमित थी।

अल्पसंख्यक विभाग के सचिव पराग मधुकर धकाते ने बताया कि अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान के रूप में मान्यता चाहने वाले संस्थानों को पहले शिक्षा विभाग से संबद्धता लेनी होगी और उसके बाद वे आनलाइन पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से मान्यता प्राप्त कर सकेंगे।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड ऐसा पहला राज्य है, जहां सभी अल्पसंख्यक समुदायों के शिक्षण संस्थानों की मान्यता के लिए अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के माध्यम से एक समान व्यवस्था लागू की गई है।

भाषा दीप्ति

जोहेब

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