हम अब विश्वगुरु नहीं हैं; संस्कृत को बढ़ावा देने की आवश्यकता: मुरली मनोहर जोशी

हम अब विश्वगुरु नहीं हैं; संस्कृत को बढ़ावा देने की आवश्यकता: मुरली मनोहर जोशी

हम अब विश्वगुरु नहीं हैं; संस्कृत को बढ़ावा देने की आवश्यकता: मुरली मनोहर जोशी
Modified Date: April 20, 2026 / 03:29 pm IST
Published Date: April 20, 2026 3:29 pm IST

नयी दिल्ली, 20 अप्रैल (भाषा) भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने संस्कृत के व्यापक प्रचार-प्रसार और ‘क्वांटम कंप्यूटिंग’ में भी इसके उपयोग की वकालत करते हुए सोमवार को कहा कि भारत अब विश्वगुरु नहीं है और इस शब्द का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।

जोशी ने यहां एक कार्यक्रम के दौरान संवाददाताओं से बात करते हुए संस्कृत को भारत की राजभाषा बनाने की भी जोरदार वकालत की और कहा कि भीम राव आंबेडकर सहित कई लोगों ने अतीत में इसके लिए प्रयास किए थे, लेकिन प्रस्तावों को मंजूरी नहीं मिली।

वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध संस्कृत भारती के केंद्रीय कार्यालय के उद्घाटन के अवसर पर संवाददाताओं से बात कर रहे थे।

भारत के विश्वगुरु के रूप में उभरने और कृत्रिम बुद्धिमत्ता केंद्र के रूप में भी अपनी पहचान बनाने के दौरान संस्कृत के संवर्धन में देश की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर, पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा, ‘‘यह धारणा कि हम विश्वगुरु हैं… मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना ​​है कि वर्तमान में हमें इस शब्द का प्रयोग करने से परहेज करना चाहिए। हम वर्तमान में विश्वगुरु नहीं हैं। हमें विश्वगुरु बनने की आकांक्षा रखनी चाहिए।’’

भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘‘सचमुच, एक समय हम विश्वगुरु थे। लेकिन आज वास्तविकता यह है कि हम वर्तमान में (विश्वगुरु) नहीं हैं।’’

जोशी ने कहा कि इस दृष्टिकोण से, संस्कृत आज बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने संस्कृत भाषा को और अधिक बढ़ावा देने और ‘क्वांटम कंप्यूटिंग’ सहित आधुनिक वैज्ञानिक कार्यों में इसके उपयोग की वकालत करते हुए यह बात कही।

भाषा सुभाष प्रशांत

प्रशांत


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