हमें नवप्रवर्तक चाहिए, अनुवादक नहीं : प्रधान ने शिक्षा प्रणाली में भारतीय भाषाओं का समर्थन किया

हमें नवप्रवर्तक चाहिए, अनुवादक नहीं : प्रधान ने शिक्षा प्रणाली में भारतीय भाषाओं का समर्थन किया

हमें नवप्रवर्तक चाहिए, अनुवादक नहीं : प्रधान ने शिक्षा प्रणाली में भारतीय भाषाओं का समर्थन किया
Modified Date: May 22, 2026 / 08:26 pm IST
Published Date: May 22, 2026 8:26 pm IST

नयी दिल्ली, 22 मई (भाषा) केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शुक्रवार को शिक्षा प्रणाली में भारतीय भाषाओं पर जोर दिए जाने का बचाव करते हुए कहा कि भारत को “नवप्रवर्तकों की आवश्यकता है, अनुवादकों की नहीं”। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि विदेशी भाषाएं छात्रों के लिए बोझ नहीं बननी चाहिए।

प्रधान ने ‘जागरण भारत शिक्षा सम्मेलन 2026’ को संबोधित करते हुए विदेशी भाषाओं के शिक्षण के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया और कहा कि वैश्विक व्यापार में शामिल छात्रों को कई विदेशी भाषाएं सीखनी चाहिए।

मंत्री ने कहा, “मैं विदेशी भाषाएं सिखाने के पक्ष में हूं। वैश्विक बाजारों में भारतीय व्यापार और वाणिज्य को संभालने वालों को कम से कम पांच विदेशी भाषाएं सीखनी चाहिए।”

उन्होंने हालांकि इस बात पर जोर दिया कि छात्रों को उस भाषा में अध्ययन करना चाहिए जिसमें वे अवधारणाओं को सबसे अच्छी तरह समझते हैं।

प्रधान ने कहा, “जब किसी बच्चे को स्पष्टता की आवश्यकता होती है, तो उसे विदेशी भाषाओं के बोझ तले नहीं दबाना चाहिए। उसे उस भाषा में अध्ययन करना चाहिए जिसमें वह अवधारणाओं को स्पष्ट रूप से समझ सके।”

शिक्षा मंत्री ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा की गई एक समीक्षा का हवाला दिया, जिसमें पाया गया कि बोर्ड की कुल छात्र संख्या का केवल एक प्रतिशत ही विदेशी भाषाओं का अध्ययन कर रहा है।

उन्होंने कहा, “हमने सीबीएसई के माध्यम से एक समीक्षा की और पाया कि विदेशी भाषा के छात्र कुल छात्र संख्या का केवल एक प्रतिशत हैं।”

भारतीय भाषाओं पर जोर देने को लेकर हो रही आलोचना का जवाब देते हुए मंत्री ने कहा कि नवाचार, अनुसंधान और विनिर्माण में भारत की तीव्र वृद्धि के लिए अनुवादकों के बजाय रचनाकारों और नवप्रवर्तकों की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा, “भारतीय भाषाओं का अध्ययन किया जाना चाहिए क्योंकि भारत ने पिछले 10 वर्षों में नवाचार के क्षेत्र में तेजी से प्रगति की है। हमारा उत्पादन, अनुसंधान और राष्ट्रीय आवश्यकताएं बढ़ी हैं। भारत की जनसंख्या अब 140 करोड़ है, और वैश्विक दक्षिण के देश भारत से तेजी से जुड़ रहे हैं। वैश्विक दक्षिण की अपेक्षाएं भारत के अनुसंधान, नवाचार और कम लागत वाली उत्पादन शृंखला पर टिकी हैं।”

प्रधान ने इस बात पर जोर दिया कि भारत के नवाचार और कम लागत वाले उत्पादन तंत्र को मजबूत करने के लिए देश को अनुवादकों की तुलना में अधिक नवोन्मेषकों की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा, “कुछ अनुवादकों की आवश्यकता हमेशा रहेगी, लेकिन समाज को यह तय करना होगा कि उसे नवप्रवर्तक चाहिए या अनुवादक।”

मंत्री ने कहा, “हमारी शिक्षा नीति नवप्रवर्तकों को तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।”

प्रधान ने कहा कि लोकतंत्र में आलोचना का स्वागत है बशर्ते वह तार्किक और प्रासंगिक हो। उन्होंने कहा, “लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है। लेकिन आलोचना तार्किक और प्रासंगिक होनी चाहिए – इससे बहस को आगे बढ़ाने में मदद मिलनी चाहिए।”

भाषा

प्रशांत नेत्रपाल

नेत्रपाल


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