वैदिक काल में स्त्रियों का अत्यधिक सम्मान किया जाता था: एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक
वैदिक काल में स्त्रियों का अत्यधिक सम्मान किया जाता था: एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक
नयी दिल्ली, 26 जून (भाषा) राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की सामाजिक विज्ञान विषय की एक नयी किताब में मनुस्मृति का महिलाओं के सम्मान से जुड़ा एक श्लोक शामिल किया गया है। पुस्तक में कहा गया है कि वैदिक काल में स्त्रियों का अत्यधिक सम्मान किया जाता था, लेकिन समय के साथ सामाजिक और राजनीतिक स्थिति बदलने पर उनका दर्जा ‘‘ऊपर-नीचे होता रहा, और यहाँ तक कि गिरा भी’’।
इसका उल्लेख ‘1000 ईस्वी तक राज्य और समाज’ वाले अध्याय में मिलता है, जिसमें वैदिक काल को ‘‘प्राय: एक ऐसे दौर के तौर पर बताया जाता है, जब समाज में महिलाओं का स्थान ऊंचा और सम्मानजनक था’’।
मनुस्मृति संस्कृत का एक प्राचीन ग्रंथ है, जो हिंदू परंपरा में सही ढंग से जीवन जीने, सामाजिक वर्गों और शासन-व्यवस्था के नियमों को बताता है। जाति और लिंग से संबंधित इसके प्रावधान लंबे समय से बहस का विषय रहे हैं।
पाठ्यपुस्तक में कहा गया है, ‘‘स्त्रियां विद्वतापूर्ण शिक्षा और कुछ खास अवसरों पर पुरुषों के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेती थीं तथा सार्वजनिक सभाओं में भी शामिल होती थीं। ऋग्वेद के कई सूक्त पारंपरिक रूप से अपाला, विश्ववारा, घोषा और लोपामुद्रा जैसी ऋषिकाओं से जुड़े माने जाते हैं। जहाँ स्त्रियों सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ स्त्रियों का सम्मान नहीं होता, वहाँ किए गए सभी अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं।’’
यह पाठ्यपुस्तक इस बात पर भी ज़ोर देती है कि महिलाओं की स्थिति एक जैसी नहीं रही।
इसमें कहा गया कि समय के साथ, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति बदलने पर महिलाओं की स्थिति और भूमिकाओं में उतार-चढ़ाव आया, और यहाँ तक कि उनमें गिरावट भी आई। हालाँकि, ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि महिलाएँ घर संभालने, कृषि, दस्तकारी और धार्मिक कार्यों में योगदान देती रहीं।
यह पाठ्यपुस्तक ‘वर्ण’ और ‘जाति’ की अवधारणाओं पर भी फिर से विचार करती है और तर्क देती है कि प्रारंभिक वैदिक समाज में सामाजिक पहचान केवल जन्म से तय नहीं होती थी।
इसमें कहा गया है, ‘‘प्रारंभिक वैदिक ग्रंथों में जन्म के आधार पर तय सामाजिक दर्जे का कोई संकेत नहीं मिलता। इसके बजाय, आम तौर पर यह माना जाता है कि सामाजिक पहचान कई जटिल और एक-दूसरे से जुड़े कारकों से बनती थी, जिनमें जातीयता, उप-समूह, क्षेत्र, गाँव से जुड़ाव, भाषा, पेशा और खासकर सांस्कृतिक संबंध शामिल थे।’’
भाषा नेत्रपाल दिलीप
दिलीप

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