महिला आरक्षण को परिसीमन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए: वेबिनार में विशेषज्ञों ने कहा

महिला आरक्षण को परिसीमन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए: वेबिनार में विशेषज्ञों ने कहा

महिला आरक्षण को परिसीमन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए: वेबिनार में विशेषज्ञों ने कहा
Modified Date: June 19, 2026 / 09:25 pm IST
Published Date: June 19, 2026 9:25 pm IST

नयी दिल्ली, 19 जून (भाषा) विचार समूह ‘दिल्ली पॉलिसी ग्रुप’ की पूर्व निदेशक राधा कुमार ने शुक्रवार को कहा कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण को परिसीमन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए था तथा कानून के तहत प्रदत्त 33 प्रतिशत कोटे को तुरंत लागू किया जा सकता था।

कुमार चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) द्वारा आयोजित ‘महिला आरक्षण विधेयक 2023 और परिसीमन विधेयक 2026 को लागू करने में आने वाली बाधाओं’ पर एक वेबिनार में बोल रही थीं।

उन्होंने कहा कि 33 प्रतिशत आरक्षण का लोकसभा और विधानसभाओं के आकार या जनसंख्या के आंकड़ों से कोई संबंध नहीं था।

कुमार ने कहा, ‘‘अगर इसका संबंध आबादी से होता, तो हम 48-49 प्रतिशत प्रतिनिधित्व की बात कर रहे होते, जो इस देश में महिलाओं की आबादी है।’’ उन्होंने कहा कि आरक्षण तब भी लागू किया जा सकता है, चाहे लोकसभा में 543 सीटें हों या फिर लगभग 850 सदस्यों वाला बड़ा सदन हो।

कुमार ने कहा कि 2023 में संसद में हुई चर्चा के दौरान महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ने वाले प्रावधानों को हटा दिया जाना चाहिए था।

उन्होंने कहा, ‘‘जिन राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में कामयाबी हासिल की है, उन्हें दंडित नहीं किया जाना चाहिए। भारत की जनगणना और परिसीमन की प्रक्रियाओं में यह एक स्थापित सिद्धांत रहा है, और इसे छोड़ने का कोई कारण नहीं है।’’

कुमार ने भविष्य में परिसीमन के लिए ऐसा तरीका अपनाने का सुझाव दिया, जिसमें सभी राज्यों को उचित प्रतिनिधित्व मिले और उन राज्यों को ‘‘सकारात्मक अंक’’ भी दिए जाएं जिन्होंने कल्याणकारी संकेतकों में सुधार किया है और जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है।

उन्होंने कहा कि जनसंख्या विशेषज्ञ इसके लिए कोई उपयुक्त फॉर्मूला तैयार कर सकते हैं।

परिसीमन के मुद्दे पर कुमार ने कहा कि देश को राजनीतिक या सांप्रदायिक आधार पर चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं में हेर-फेर से सुरक्षा की जरूरत है। उन्होंने जम्मू कश्मीर और असम में पहले हुई ऐसी प्रक्रियाओं का जिक्र करते हुए प्रतिनिधित्व और समुदायों के बीच संतुलन को लेकर चिंता जताई।

कुमार ने सवाल किया कि लोकसभा सीट संख्या बढ़ाकर लगभग 850 करने से संसदीय कामकाज और चर्चा की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि क्या एक विशाल सदन में सार्थक चर्चा के लिए पर्याप्त गुंजाइश होगी, और इस बात पर जोर दिया कि संसद को राष्ट्रीय और संघीय मुद्दों पर चर्चा करने का मंच बने रहना चाहिए।

उन्होंने सवाल किया, ‘‘क्या आप संसद को ‘रबर की मुहर’ बनाने जा रहे हैं? क्या वहां चर्चा के लिए कोई गुंजाइश होगी?’’

वारंगल से कांग्रेस सांसद के. काव्या ने कहा कि अगर महिला आरक्षण विधेयक, 2024 में लागू हो गया होता, तो महिलाओं को संसद में पहले ही 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिल गया होता।

काव्या ने कहा कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से दक्षिणी राज्यों को नुकसान हो सकता है, जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है।

भाषा सुभाष माधव

माधव


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