Madhya Pradesh UCC Act: एमपी में UCC कानून की आहट!.. कांग्रेस बोली, ‘किसी समाज का अपमान नहीं होना चाहिए, विश्वास में लेकर हो निर्णय’

Madhya Pradesh Uniform Civil Code Act: मध्य प्रदेश में UCC लागू होने की संभावनाओं पर उमंग सिंघार ने कहा, सर्वानुमति और आदिवासी समुदाय का सम्मान जरूरी।

Madhya Pradesh UCC Act: एमपी में UCC कानून की आहट!.. कांग्रेस बोली, ‘किसी समाज का अपमान नहीं होना चाहिए, विश्वास में लेकर हो निर्णय’

Madhya Pradesh UCC Act || Image- Symbolic (Canva)

Modified Date: April 8, 2026 / 01:48 pm IST
Published Date: April 8, 2026 1:48 pm IST
HIGHLIGHTS
  • मध्य प्रदेश में UCC लागू होने की चर्चाएँ
  • उमंग सिंघार ने सर्वानुमति पर जोर दिया
  • आदिवासी कानून और रिपोर्ट भी जरूरी

भोपाल: भाजपा शासित राज्यों में समान नागरिक संहिता की दिशा एम् फैसले लिए जा रहे है। देवभूमि उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता यानी UCC लागू किया जा चुका है जबकि गुजरात विधानसभा में यह बिल पास हो चुका है। (Madhya Pradesh UCC Act) भाजपा ने असम में भी वादा किया है कि, सरकार बनने के बाद कैबिनेट की पहली बैठक में इस पर फैसले ले लिया जाएगा।

ऐसे में अब इस कानून के दूसरे भाजपा शासित राज्यों में भी लागू किये जाने की सुगबुगाहट है। इनमें सबसे प्रमुख है मध्य प्रदेश। यहाँ UCC लागू किये जाने के संभावनाओं के बीच मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की प्रतिक्रिया सामने आई है।

क्या कहा नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने?

यूसीसी से जुड़े मसले पर चर्चा करते हुए नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा है कि, यह बड़ा फैसला सभी की सर्वानुमति से लिया जाना चाहिए। फैसले से किसी समाज या समुदाय का अपमान न हो इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। आदिवासी समाज को UCC कानून से अलग रखने के सवाल अपर सिंघार ने कहा है कि, कई बार आदिवासियों को लेकर कानून बनाने की चर्चा की जा चुकी है। (Madhya Pradesh UCC Act) राज्य सरकार के पास कई कानून अभी भी लंबित पड़े हुए है। आदिवासियों के कानून को लेकर जो कमेटी बनाई गई है उसकी रिपोर्ट भी आना चाहिए। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि, ये कानून भी विधानसभा में पारित करना चाहिए।

असम में लागू होंगे समान नागरिक संहिता क़ानून!

गौरतलब है कि, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम में रविवार को कहा कि भाजपा सरकार ने पिछले 10 वर्षों में असम में घुसपैठ को रोका है, लेकिन यह ‘‘पर्याप्त नहीं है’’, क्योंकि प्रत्येक अवैध प्रवासी को उनके देशों में वापस भेजा जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राज्य में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू की जाएगी। शाह ने कांग्रेस पर घुसपैठियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया और दावा किया कि जब पार्टी सत्ता में थी, तो उसने ‘‘वोट बैंक के लालच में’’ सीमाओं को खुला रखा, जिससे राज्य की जनसांख्यिकी बदल गई।

सोनितपुर जिले के ढेकियाजुली और नलबाड़ी के तिहु में चुनावी रैलियों को संबोधित करते हुए शाह ने कहा कि भाजपा ने 10 साल पहले असम में घुसपैठियों को रोकने का वादा किया था और उस वादे को निभाया। शाह ने कहा, “हालांकि, यह पर्याप्त नहीं है, क्योंकि हमें अगले पांच वर्षों में प्रत्येक अवैध प्रवासी को देश से बाहर भेजना होगा।” (Madhya Pradesh UCC Act) उन्होंने आरोप लगाया कि घुसपैठियों ने असम के मूल निवासियों के रोजगार छीन लिए हैं और गरीबों का अनाज हड़प लिया है।

क्या राज्य लागू कर सकते है UCC?

उत्तराखंड में UCC कानून लागू किये जाने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि, क्या राज्यों को यह कानून लागू करने का अधिकार है? इस बारे में संविधान विशेषज्ञ एवं लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचारी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि केंद्र और राज्य दोनों को इस तरह का कानून लाने का अधिकार है, क्योंकि शादी, तलाक, विरासत और संपत्ति पर अधिकार जैसे मुद्दे संविधान की समवर्ती सूची में आते हैं। लेकिन, पूर्व केंद्रीय कानून सचिव पीके मल्होत्रा ​​का मानना है कि केंद्र सरकार ही संसद के रास्ते ऐसा कानून ला सकती है।

क्या है सामान नागरिक संहिता (UCC) कानून?

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) एक प्रस्तावित कानून है, जिसके तहत देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना और संपत्ति के बंटवारे जैसे व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानून लागू किया जाएगा, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। वर्तमान में भारत में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू होते हैं, लेकिन UCC लागू होने पर सभी के लिए एक ही नियम व्यवस्था लागू हो जाएगी।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में इसका उल्लेख किया गया है, जो राज्य के नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा है। इसमें सरकार को समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में प्रयास करने की सलाह दी गई है, हालांकि यह अनिवार्य नहीं है। UCC के समर्थकों का मानना है कि इससे सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलेंगे, खासकर महिलाओं को अधिक न्याय मिलेगा और कानून प्रणाली सरल बनेगी।

वहीं, इसके विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप कर सकता है और भारत की सांस्कृतिक विविधता को प्रभावित कर सकता है। अलग-अलग समुदायों की परंपराओं और रीति-रिवाजों को नजरअंदाज करने की आशंका भी जताई जाती है। वर्तमान में यह कानून पूरे देश में लागू नहीं है, हालांकि उत्तराखंड जैसे कुछ राज्यों ने इसे लागू करने की दिशा में पहल की है, और इस विषय पर देशभर में चर्चा जारी है।

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