इंदौर कम्पोस्ट : भारत की जैविक खाद तकनीक जिसे दुनिया ने अपनाया; ब्रिक्स प्रतिनिधियों ने जानी कहानी
इंदौर कम्पोस्ट : भारत की जैविक खाद तकनीक जिसे दुनिया ने अपनाया; ब्रिक्स प्रतिनिधियों ने जानी कहानी
इंदौर (मध्यप्रदेश), 10 जून (भाषा) ब्रिक्स कृषि कार्य समूह की इंदौर में जारी बैठक के बीच बुधवार को सदस्य देशों के प्रतिनिधियों ने जैविक खाद (कम्पोस्ट) बनाने की करीब 100 साल पुरानी उस पद्धति के बारे में जानकारी हासिल की जिसने भारत के सबसे स्वच्छ शहर को दुनिया भर में पहचान दिलाई है।
अधिकारियों ने बताया कि ब्रिक्स कृषि कार्य समूह की बैठक में खाद्य सुरक्षा, टिकाऊ खेती, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों और कृषि क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने जैसे विषयों पर चर्चा हो रही है। इस संदर्भ में विदेशी प्रतिनिधियों को इंदौर की कम्पोस्ट परंपरा और प्राकृतिक खेती से जुड़े स्थानीय मॉडल दिखाए गए।
अधिकारियों के मुताबिक शहर के भ्रमण के दौरान प्रतिनिधियों को ‘इंदौर मेथड ऑफ कम्पोस्ट मेकिंग’ के बारे में बताया गया। यह जैविक खाद बनाने की एक ऐसी पद्धति है जिसे बाद में दुनिया के कई देशों ने अपनाया।
इथियोपिया, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और ब्रिक्स के अन्य देशों के प्रतिनिधियों को इंदौर की विरासत से रू-ब-रू कराने के लिए ऐतिहासिक राजबाड़ा महल का भ्रमण कराया गया। इस दौरान स्थानीय प्रशासन ने उन्हें ‘इंदौर कम्पोस्ट’ की पद्धति की जानकारी दी।
अधिकारियों ने बताया कि आधुनिक जैविक खेती के जनक माने जाने वाले ब्रितानी कृषि वैज्ञानिक अल्बर्ट हावर्ड ने 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में इंदौर की पारंपरिक खेती का अध्ययन किया था।
उन्होंने देखा कि किसान कृषि अवशेषों, गोबर और अन्य जैविक पदार्थों से खाद तैयार करते हैं। इस अनुभव के आधार पर उन्होंने कम्पोस्ट बनाने की एक व्यवस्थित पद्धति विकसित की जो बाद में ‘इंदौर मेथड ऑफ कम्पोस्ट मेकिंग’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।
इतिहासकार जफर अंसारी ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया,‘‘इंदौर का वर्तमान शासकीय कृषि महाविद्यालय वर्ष 1923 में इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री के नाम से स्थापित किया गया था। हावर्ड ने इसी संस्थान में अपने अध्ययन और प्रयोग किए थे।’’
उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी ने भी वर्ष 1935 में इंदौर प्रवास के दौरान इस कम्पोस्ट पद्धति की सराहना की थी।
अधिकारियों ने बताया कि स्थानीय संसाधनों के उपयोग पर आधारित यह पद्धति आज भी मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए उपयोगी मानी जाती है।
ब्रिक्स कृषि कार्य समूह की बैठक के तहत विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधियों ने ग्रामीण हाट केंद्र का भी भ्रमण किया जहां उन्हें मध्यप्रदेश की कृषि विविधता, प्राकृतिक खेती, कृषि प्रसंस्करण और ग्रामीण उद्यमिता से जुड़े प्रयासों की जानकारी दी गई।
भ्रमण के दौरान प्रतिनिधियों ने बुरहानपुर जिले के केले से बने मूल्य संवर्धित उत्पादों, बालाघाट के जीआई टैग प्राप्त चिन्नौर चावल और रीवा के जीआई टैग प्राप्त सुंदरजा आम सहित विभिन्न कृषि उत्पादों के बारे में जानकारी ली।
उन्होंने झाबुआ की पारंपरिक फसलों, मंडला में संरक्षित दुर्लभ श्रीअन्न (मोटा अनाज) किस्मों, नीमच की औषधीय फसलों और अन्य प्राकृतिक खेती आधारित उत्पादों में भी रुचि दिखाई।
भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता में 11 जून तक कृषि कार्य समूह की बैठक चलेगी जिसमें सदस्य देशों के अधिकारी शामिल हो रहे हैं।
ब्रिक्स एक प्रमुख अंतर-सरकारी संगठन है। इसके सदस्य देशों में ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया शामिल हैं।
भाषा हर्ष जोहेब
जोहेब

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