नागपुर, पांच सितंबर (भाषा) प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) के प्रधान संपादक एवं सीईओ विजय जोशी ने शनिवार को यहां कहा कि लोकतंत्र को ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो किसी भी बात पर विश्वास करने से इनकार करते हैं, बल्कि उसे ऐसे नागरिकों की जरूरत है जो हर चीज पर सवाल उठाने में सक्षम हों।
जोशी ने कहा कि मीडिया के प्रति संदेह की गुंजाइश रखनी चाहिए, लेकिन उसके प्रति निंदक रवैया नहीं अपनाना चाहिए, क्योंकि पत्रकारिता नागरिकों को सोच-समझकर निर्णय लेने में सक्षम बनाती है, जो लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने सोशल मीडिया से उत्पन्न चुनौतियों, खबरों की पुष्टि के बजाय उन्हें तेजी से प्रसारित करने पर अधिक जोर दिए जाने और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के जरिए तैयार की गई फर्जी सामग्री को भी चुनौतियों के रूप में रेखांकित किया।
वह भारतीय प्रबंधन संस्थान–नागपुर द्वारा ‘मीडिया कॉन्क्लेव 2026’ में ‘बदलाव के दौर में नेतृत्व: एआई के युग में मीडिया संस्थानों का प्रबंधन’ विषय पर संबोधित कर रहे थे।
जोशी ने कहा कि बहुत से लोगों की यह धारणा है कि पूरा मीडिया पक्षपाती है, यह भी एक अतिवादी सोच है। उन्होंने कहा कि जब आप पूरे मीडिया को ही पक्षपाती मान लेते हैं, तो यह खबरों पर सवाल उठाने के बजाय हर चीज को नकारात्मक नजर से देखने जैसा हो जाता है। उन्होंने कहा “मीडिया की खबरों को परखना चाहिए, लेकिन उसे पूरी तरह अविश्वसनीय नहीं मानना चाहिए।”
‘पीटीआई’ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) ने कहा, ‘‘क्योंकि जब लोग हर किसी की बात पर विश्वास करना बंद कर देते हैं, तो अंत में गुमराह करने वाली आवाजें ही प्रभावी रह जाती हैं। अगर आप अपने सामने कही जा रही हर बात पर विश्वास करना बंद कर देंगे, तो अंत में केवल वही लोग टिके रहेंगे जो आपका इस्तेमाल करने में माहिर हैं। लोकतंत्र को ऐसे नागरिकों की जरूरत नहीं है जो किसी भी बात पर विश्वास न करें। लोकतंत्र को ऐसे नागरिकों की जरूरत है जो अपने आसपास की हर चीज पर सवाल उठाने में सक्षम हों।’’
उन्होंने कहा कि चाहे वह आर्थिक आंकड़े हों, राजनीतिक विचार हों या सामाजिक मापदंड, हर चीज पर सवाल उठाया जाना चाहिए।’’
जोशी ने कहा कि आजकल सोशल मीडिया पर सामग्री अपलोड करने वाले लाखों लोग मीडिया के लिए प्रतिस्पर्धा बन गए हैं, जबकि एआई फर्जी खबरों के निर्माण को बढ़ावा दे रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है कि ‘‘प्रकाशित करने से पहले पुष्टि करें’’।
हाल में बॉलीवुड के एक दिग्गज अभिनेता की मौत से जुड़ी फर्जी खबर के वायरल होने का उदाहरण देते हुए, जबकि वह अभिनेता उस समय जीवित थे, जोशी ने कहा कि ऐसी घटनाओं से यह धारणा बनती है कि मीडिया भरोसेमंद नहीं है।
उन्होंने हालांकि कहा कि ‘पीटीआई’ ने कभी भी ऐसी खबरें बिना पुष्टि के प्रकाशित नहीं की हैं।
जोशी ने कहा कि एक समय ऐसा था जब किसी खबर में गलती को सबसे बड़ा पाप माना जाता था और अखबार अपनी विश्वसनीयता के दम पर चलते थे।
उन्होंने कहा, ‘‘आज पत्रकारों के बीच प्रतिस्पर्धा इस बात को लेकर नहीं है कि कौन सबसे पहले कोई विशेष खबर हासिल करेगा, बल्कि इस बात को लेकर है कि कौन खबर सबसे पहले प्रकाशित या प्रसारित करेगा। अब गति ही प्रतिस्पर्धा का पैमाना बन गई है।’’
जोशी ने कहा कि मीडिया संस्थानों को किसी खबर को जल्द से जल्द जारी करना पड़ता है, क्योंकि एक तरह से सोशल मीडिया उपयोगकर्ता उनके प्रतिस्पर्धी बन गए हैं।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य लोगों को अच्छे विकल्प चुनने और उचित निर्णय लेने में सक्षम बनाना है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में इसका बहुत अधिक महत्व है, क्योंकि यह लोगों को यह तय करने में सक्षम बनाता है कि उन्हें अपना वोट किसे देना चाहिए या अपना पैसा कहां निवेश करना चाहिए, इसके अलावा भी कई अन्य फैसले लेने में मदद करता है और ये सभी निर्णय जानकारी पर निर्भर करते हैं।
जोशी ने कहा कि हर व्यक्ति और खासतौर पर पत्रकारों को मीडिया की विश्वसनीयता के महत्व का एहसास होना चाहिए, क्योंकि पत्रकार इस देश के लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘और यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। आपको खबरों में तेजी की जरूरत के कारण गुमराह नहीं होना चाहिए, जिसके चलते आप अपने तथ्यों की पुष्टि न करें और अपनी विश्वसनीयता खो दें।”
जोशी ने कहा कि हर जगह ‘‘ध्यान आकर्षित करने की होड़’’ लगी हुई है, जिसने पत्रकारिता की कार्यप्रणाली को बदल दिया है।
प्रबंधन के छात्रों को सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें “ऐसी चुनिंदा प्रतिक्रिया पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, जो उन्हें वही बताए जो वे सुनना चाहते हैं”, बल्कि असहमति वाले विचारों को भी जानने की कोशिश करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब सोशल मीडिया पर कोई वीडियो सामने आए और उसे तुरंत आगे भेजने की इच्छा हो, तो “एक आसान हथियार है जिसका इस्तेमाल आप कर सकते हैं और वह है—खुद को रोक लेना।” उन्होंने कहा कि सबसे पहले यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या यह सामग्री झूठी हो सकती है या इसके पीछे कोई खास एजेंडा तो नहीं है।
भाषा
देवेंद्र पवनेश
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