महाराष्ट्र : धोखाधड़ी मामले में पूर्व राज्यसभा सदस्य रिजवी को नहीं मिली अग्रिम जमानत
महाराष्ट्र : धोखाधड़ी मामले में पूर्व राज्यसभा सदस्य रिजवी को नहीं मिली अग्रिम जमानत
मुंबई, 27 जुलाई (भाषा) यहां की एक अदालत ने कथित धोखाधड़ी और जालसाजी के एक मामले में पूर्व राज्यसभा सदस्य अख्तर हसन रिजवी को सोमवार को अग्रिम ज़मानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया प्रतीत हो रहा है कि वह इस अपराध में गहराई से शामिल हैं।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश महेश जाधव ने कहा कि याचिकाकर्ता मुख्य आरोपी है और हिरासत में उससे पूछताछ आवश्यक है।
कारोबारी रिजवी पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि उन्होंने शिकायतकर्ता के परिवार की निरक्षरता का फ़ायदा उठाकर उन्हें धोखा देने के इरादे से संपत्ति के झूठे और जाली दस्तावेज तैयार किए।
पुलिस के मुताबिक, संपत्ति की वास्तविक मालकिन, हाजानी नूरबीबाई कालू का 26 अप्रैल, 1971 को निधन हो गया था। उसने बताया कि कालू की मौत के बाद रिजवी ने कथित तौर पर संपत्ति हड़पने के लिए एक ‘एक अन्य महिला’ को पेश किया, जिसने मृतका के स्थान पर संपत्ति विलेख पर हस्ताक्षर किया।
रिजवी के वकील ने दलील दी कि 84 वर्षीय पूर्व सांसद एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं और उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। बचाव पक्ष का दावा है कि वह परमार्थ के कार्यों के लिए सादा कागजों पर हस्ताक्षर करके अपने कर्मचारी को दे देते थे, जिसने दस्तावेज में हेर-फेर करने के लिए उनके हस्ताक्षर का गलत इस्तेमाल किया।
वकील ने दलील दी कि रिजवी की कोई आपराधिक मंशा नहीं थी, उन्हें कोई गलत फ़ायदा नहीं हुआ था, और वह मृतका के वारिसों के पक्ष में संपत्ति वापस करने के दस्तावेज़ तैयार थे।
अभियोजन पक्ष ने उनकी याचिका का विरोध करते हुए कहा कि रिजवी ने दुर्भावनापूर्ण इरादे से एक पंजीकृत दस्तावेज तैयार किया और उस पर अपने हस्ताक्षर होने की बात स्वीकार की।
अभियोजन पक्ष ने कहा कि उस महिला की पहचान का पता लगाने के लिए—जिसे उसने मृत मालिक के तौर पर पेश किया था—और राजस्व अधिकारियों की संभावित संलिप्तता की जांच करने के लिए हिरासत में विस्तृत पूछताछ जरूरी है।
दस्तावेजों की जांच-पड़ताल के बाद, अदालत ने पाया कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि याचिकाकर्ता एक डीड (विलेख) के आधार पर उक्त विवादित संपत्ति पर अपना नाम दर्ज कराने में सफल रहा।
अदालत ने अग्रिम जमानत अर्जी खारिज करते हुए कहा, ‘‘अगर याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी से पहले जमानत मिल जाती है, तो वह निश्चित रूप से अभियोजन पक्ष के गवाहों को प्रभावित करेगा। वह मुख्य आरोपी है और अपराध में गहराई से शामिल है। उससे हिरासत में पूछताछ जरूरी है।’’
भाषा धीरज दिलीप
दिलीप

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