टीसीएस मामले में निदा खान की अग्रिम जमानत याचिका खारिज
टीसीएस मामले में निदा खान की अग्रिम जमानत याचिका खारिज
मुंबई, चार मई (भाषा) नासिक की एक अदालत ने कथित यौन उत्पीड़न और जबरन धर्म परिवर्तन से संबंधित मामले में टीसीएस कर्मचारी निदा खान की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि पीड़िता का ‘सुनियोजित तरीके से’ ‘ब्रेनवाश’ करके उसे मलेशिया भेजने की ‘एक सुनियोजित साजिश’ थी।
अदालत ने कहा कि खान की याचिका में ‘कोई दम नहीं है।’ अदालत ने कहा, ‘अपराध की गंभीरता वास्तव में बहुआयामी और बहुस्तरीय है तथा मामले की जड़ तक पहुंचने के लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक है।’
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (नासिक रोड) के. जी. जोशी का आदेश सोमवार को उपलब्ध हुआ। अदालत ने अपने तर्कों सहित दिए गए आदेश में कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से पता चलता है कि आरोपी की पीड़िता का नाम बदलने के बाद उसे मलेशिया भेजने की योजना थी।
अभियोजन पक्ष द्वारा उससे हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता पर जोर दिये जाने के बाद अदालत ने खान की याचिका दो मई को खारिज कर दी।
प्राथमिकी के अनुसार, खान ने कथित तौर पर महिला कर्मचारियों को इस्लामी परंपराओं के अनुसार कपड़े पहनने और व्यवहार करने की सलाह दी थी। उसने गर्भावस्था का हवाला देते हुए अग्रिम जमानत का अनुरोध किया था।
पुलिस ने कहा था कि खान की महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में तलाश जारी है।
आदेश में कहा गया, ‘प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता की भूमिका का विशेष रूप से (प्राथमिकी में) उल्लेख किया गया है और उसकी संलिप्तता भी दिखती है।’
न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि निस्संदेह पीड़िता को किसी भी धर्म का अनुसरण करने और अपनी पसंद का नाम रखने का संवैधानिक अधिकार है, ‘लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसके लिए उसका ‘ब्रेनवाश’ किया जाए और वह भी एक संगठित योजना के तहत।’
देवलाली पुलिस थाने में दर्ज विशेष मामले में, खान और दो अन्य सह-आरोपी, दानिश शेख और तौसीफ (सभी टीसीएस की नासिक इकाई में पीड़िता के सहकर्मी) पर भारतीय न्याय संहिता की प्रासंगिक धाराओं के तहत विवाह का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाना, यौन उत्पीड़न और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने आदि के आरोप में मामला दर्ज किया गया है।
उन पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराओं के तहत भी आरोप लगाए गए हैं।
पुलिस के अनुसार, दानिश शेख ने विवाह का झूठा वादा करके पीड़िता का यौन उत्पीड़न किया, जबकि तौसीफ ने बार-बार उससे छेड़छाड़ की और शेख के साथ उसके कथित संबंध को महिला के परिवार के सामने उजागर करने की धमकी देकर उस पर यौन संबंध बनाने का दबाव डाला।
प्राथमिकी के अनुसार, खान ने अपने दोनों सह-आरोपियों के साथ मिलकर पीड़िता को डराकर और उसकी धार्मिक भावनाओं को बार-बार ठेस पहुंचाकर उसे धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करने का प्रयास किया।
पुलिस की ओर से पेश हुए जिला सरकारी अभियोजक (डीजीपी) ए एस मिश्र ने दलील दी कि पीड़िता को आरोपियों के धार्मिक रीति-रिवाजों और दैनिक धार्मिक दिनचर्या का पालन करने के लिए मजबूर किया गया था।
मिश्र ने कहा कि जांच से पता चलता है कि खान ने पीड़िता को बुर्का और पैगंबर मोहम्मद के जीवन पर किताबें दी थीं। मिश्र ने बताया कि उसने मोबाइल में मुस्लिम सिद्धांतों और धार्मिक गतिविधियों से संबंधित एप्लिकेशन भी इंस्टॉल किए थे।
जांच का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पीड़िता का नाम बदलकर हानिया रखा जाना था और उसे मलेशिया भेजा जाना था।
उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों में, यह पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक है कि क्या कोई अंतरराष्ट्रीय गिरोह इसमें शामिल है और क्या याचिकाकर्ता (खान) उससे जुड़ी हुई है।
पीड़िता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता एम जी कुरकुटे और नितिन पंडित ने दलील दी कि आरोपियों ने कंपनी में अपने पद का अनुचित लाभ उठाकर पीड़िता को उनका धर्म मानने के लिए मजबूर किया।
उन्होंने (आरोपियों ने) पीड़िता की भावनाओं को ठेस पहुंचाकर उसे मांसाहारी भोजन खाने के लिए मजबूर किया और कार्यालय में उसकी जाति को लेकर उसका अपमान भी किया।
खान के अधिवक्ता राहुल कसलीवाल ने दलील दी कि चूंकि पीड़िता और याचिकाकर्ता एक ही कार्यालय में कार्यरत थे, इसलिए वे एक-दूसरे को जानती थीं और प्रतिदिन मिलती थीं।
उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने पीड़िता की धार्मिक भावनाओं को कभी ठेस नहीं पहुँचाई।
खान की तीन महीने की गर्भावस्था का हवाला देते हुए, कसलीवाल ने दलील दी कि यदि उसे गिरफ्तार किया जाता है, तो बच्चे को अपूरणीय क्षति होगी।
अदालत ने कहा कि जांच खान की संलिप्तता की ओर इशारा करती है, और प्राथमिकी में उसकी भूमिका स्पष्ट रूप से उल्लिखित है।
उसने कहा कि प्राथमिकी में विशेष रूप से खान और अन्य आरोपियों की भूमिका का उल्लेख किया गया है, जिन्होंने हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के विरुद्ध आपत्तिजनक कहानियां सुनाकर पीड़िता की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई।
अदालत ने कहा, ‘कथित अपराध पीड़िता का सुनियोजित तरीके से ब्रेनवाश करने का एक सुनियोजित प्रयास प्रतीत होता है।’
न्यायाधीश ने कहा कि ‘अग्रिम जमानत देना, कुछ हद तक, अपराध की जांच के क्षेत्र में हस्तक्षेप करेगा।’
अदालत ने कहा कि पीड़िता पर अनुचित प्रभाव डालने, धमकी देकर या अन्य तरीके से किसी विशेष धर्म को थोपने या उस पर दबाव डालने के संबंध में विस्तृत जांच आवश्यक है।
आदेश में कहा गया है, ‘कथित अपराध की गंभीरता और व्यापकता, याचिकाकर्ता की भूमिका और स्थापित कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, यह अग्रिम जमानत का मामला नहीं है।’
एक विशेष जांच दल (एसआईटी) टीसीएस इकाई में महिला कर्मचारियों के कथित शोषण, जबरन धर्मांतरण के प्रयास, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने, छेड़छाड़ और मानसिक उत्पीड़न के संबंध में दर्ज नौ मामलों की जांच कर रहा है।
एसआईटी ने एक महिला ऑपरेशन मैनेजर सहित आठ लोगों को गिरफ्तार किया है।
टीसीएस ने स्पष्ट किया है कि उसने लंबे समय से किसी भी प्रकार के उत्पीड़न और दबाव के प्रति बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करने की नीति अपनाई है और नासिक कार्यालय में यौन उत्पीड़न में कथित रूप से शामिल कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है।
भाषा अमित माधव
माधव

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