पहलगाम हमला : पीड़ितों की आंखों के सामने आज भी तैरता है आतंक का मंजर

पहलगाम हमला : पीड़ितों की आंखों के सामने आज भी तैरता है आतंक का मंजर

पहलगाम हमला : पीड़ितों की आंखों के सामने आज भी तैरता है आतंक का मंजर
Modified Date: April 21, 2026 / 07:53 pm IST
Published Date: April 21, 2026 7:53 pm IST

(संदीप कोलहाटकर)

पुणे, 21 अप्रैल (भाषा) पुणे की रहने वाली असावरी जगदाले के स्मार्टफोन पर दो दिन पहले सोशल मीडिया पर साझा की गई उन तस्वीरों से जुड़ा नोटिफिकेशन आया, जो एक साल पहले कश्मीर की यात्रा के दौरान उनके परिवार की ओर से पहलगाम की दिलकश वादियों में बिताए गए मौज-मस्ती भरे पलों की याद दिलाती थीं।

ज्यादातर लोगों के लिए ऐसे पोस्ट गुजरे पलों की खुशनुमा यादों में फिर से झांकने का जरिया होते हैं, लेकिन असावरी के लिए ये पहलगाम की बैसरण घाटी में आतंक के उस खौफनाक मंजर को ताजा करने वाले पोस्ट साबित हुए, जिसमें उनकी दुनिया उजड़ गई थी।

असावरी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा, “हम जब भी हम उस दिन के बारे में बात करते हैं, तो ऐसा लगता है कि हम फिर से उसे जी रहे हैं। यह अतीत की याद नहीं है। इसका खौफनाक मंजर आज भी हमारी आंखों के सामने तैरता है।”

पहलगाम की बैसरण घाटी में 22 अप्रैल 2025 को पर्यटकों को निशाना बनाकर किए गए आतंकवादी हमले में 26 लोगों की मौत हो गई थी। मृतकों में असावरी के पिता जगदीश जगदाले और उनके सबसे करीबी दोस्त कौस्तुभ गणबोटे भी शामिल थे।

असावरी की मां प्रगति जगदाले ने 22 अप्रैल 2025 के दिन को अपने जीवन का “काला दिन” करार दिया। उन्होंने कहा, “उस दिन हम सभी बहुत खुश थे। हम बैसरण घाटी में तस्वीरें लेने में मशगूल थे, तभी अचानक गोलियों की आवाज सुनाई दी। अगले कुछ ही पलों में आतंकवादियों ने मेरे पति, उनके दोस्त कौस्तुभ गणबोटे और अन्य निहत्थे हिंदू पर्यटकों को धर्म के आधार पर निशाना बनाया और उनकी हत्या कर दी।”

प्रगति ने कहा, “मैंने अपने पति और उनके दोस्त को अपनी आंखों के सामने मरते हुए देखा। इस घटना ने मेरे मन पर गहरी चोट पहुंचाई है और उस सदमे को भूल पाना संभव नहीं है।”

असावरी के मुताबिक, पहलगाम हमले के एक साल बाद भी वह और उनकी मां बेचैनी, घबराहट और नींद में खलल की समस्या से जूझ रही हैं तथा अचानक तेज आवाज होने पर दोनों कांप उठती हैं।

उन्होंने कहा, “अगर तेज आवाज होती है, फिर चाहे वह पटाखे की आवाज ही क्यों न हो, हम डर जाते हैं, यह सोचकर कि कहीं कोई और हमला तो नहीं हो गया। अजनबियों के बीच जाने पर भी डर बना रहता है। इस घटना ने हमारे जीने का तरीका बदल दिया है।”

असावरी के अनुसार, चिकित्सकीय सहायता और मनोवैज्ञानिक परामर्श के बावजूद जख्म बरकरार हैं।

उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि कोई भी इलाज उन यादों को मिटा सकता है या धुंधला कर सकता है। ये यादें जीवन भर हमारे साथ रहेंगी।”

असावरी ने कहा, “19 अप्रैल को ‘स्नैपचैट’ पर पुणे से कश्मीर की हमारी यात्रा से जुड़ी तस्वीरें दिखाई दीं। हम सोचते हैं कि अगर हमारी फ्लाइट छूट गई होती या यात्रा से पहले कुछ ऐसा हुआ होता, जिसके कारण उड़ान रद्द हो गई होती, तो शायद हम इस घटना के शिकार नहीं होते।”

पहलगाम हमले में संतोष जगदाले की मौत के बाद महाराष्ट्र सरकार ने उनकी बेटी असावरी को नौकरी देने की घोषणा की थी। असावरी को इस साल मार्च में पुणे महानगरपालिका (पीएमसी) में प्रशासनिक अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया और वह फिलहाल प्रशिक्षण हासिल कर रही हैं।

हालांकि, असावरी बताती हैं कि पहलगाम हमले में संतोष जगदाले की मौत के बाद नौकरी पाने के लिए कठिन संघर्ष ने परिवार के भावनात्मक आघात को और भी बढ़ा दिया।

वह कहती हैं, “हमें कई बार टाल-मटोल का सामना करना पड़ा। एक बार मेरी मां फूट-फूटकर रोईं और कहने लगीं कि हमें हार मान लेनी चाहिए, क्योंकि ऐसा लग रहा था जैसे हम गिड़गिड़ा रहे हों। किसी प्रियजन को खोने के बाद भी संघर्ष जारी रखने का वो दर्द मैं कभी नहीं भूल सकती।”

असावरी ने बताया कि लगातार जारी प्रयासों और उच्च स्तर पर हस्तक्षेप के बाद ही नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ पाई। हालांकि, उन्होंने कहा कि कई पीड़ित परिवार आज भी इसी तरह की सहायता के लिए इंतजार कर रहे हैं।

असावरी पहलगाम हमले में जान गंवाने वाले अन्य लोगों के परिजनों के भी संपर्क में हैं। इनमें कानपुर के शुभम द्विवेदी के परिजन शामिल हैं।

वह मान्यता और समर्थन की कमी को पीड़ित परिवारों की साझा चिंता बताते हुए कहती हैं, “उनकी मांग की है कि पीड़ितों को शहीद का दर्जा दिया जाए, ताकि उनके बलिदान को याद रखा जा सके।”

असावरी ने कहा कि उन्होंने अपने पिता की याद में हर महीने अपने वेतन का एक हिस्सा दान करने का संकल्प लिया है। उन्होंने कहा, “यह उनके नाम को अमर रखने और जरूरतमंदों की मदद करने का एक तरीका है।”

कौस्तुभ गणबोटे के बेटे कुणाल ने कहा कि वह और उनकी मां पिछले एक साल से सदमे में हैं।

उन्होंने कहा, “वे खौफनाक दृश्य मेरी मां के जहन से ओझल होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। वह अभी भी सदमे में हैं। एक साल बीत चुका है, लेकिन हम अभी भी इस दर्द से उबरने की कोशिश कर रहे हैं।”

अपने पिता का स्नैक्स कारोबार संभाल रहे कुणाल ने कहा, “मुझे सरकारी नौकरी का प्रस्ताव मिला था, लेकिन मैंने उसे ठुकरा दिया, क्योंकि मैं अपने पिता के कारोबार को आगे बढ़ाना चाहता था। मनोवैज्ञानिक पक्ष पर कठिनाइयों के बावजूद, हम इसे जारी रखने में कामयाब रहे हैं और यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।”

भाषा पारुल रंजन

रंजन


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