आरएसएस ‘भूल कर माफ कर दो’ के सिद्धांत पर कायम, उसके केंद्र में सत्ता नहीं राष्ट्र: आंबेकर

आरएसएस ‘भूल कर माफ कर दो’ के सिद्धांत पर कायम, उसके केंद्र में सत्ता नहीं राष्ट्र: आंबेकर

आरएसएस ‘भूल कर माफ कर दो’ के सिद्धांत पर कायम, उसके केंद्र में सत्ता नहीं राष्ट्र: आंबेकर
Modified Date: October 1, 2025 / 09:48 pm IST
Published Date: October 1, 2025 9:48 pm IST

(प्रमोद शर्मा और चार्ल्स साल्वे)

नागपुर, एक अक्टूबर (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेता सुनील आंबेकर ने बुधवार को संगठन के अनवरत जारी मूल दर्शन ‘समावेशिता और क्षमा’ को रेखांकित करते हुए कहा कि आरएसएस के केंद्र में राजनीतिक शक्ति की लालसा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय उत्थान है।

आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख आंबेकर ने ‘पीटीआई वीडियो’ से बातचीत के दौरान कहा कि इस शताब्दी पुराने संगठन की स्थापना कभी किसी पुरस्कार या इनाम की चाह में नहीं की गई थी। उन्होंने कहा कि संघ की प्रगति उसके गहरे सामाजिक बंधन और आपातकाल के बाद की सलाह ‘‘भूल जाओ और माफ कर दो’’ के मार्गदर्शक सिद्धांत से परिभाषित होती है।

उन्होंने आरएसएस के गैर-भौतिकवादी (अलौकिक या निष्काम) आधार को भी रेखांकित किया। संघ प्रचारक ने कहा, ‘‘आरएसएस की 100 साल की यात्रा लोकसमर्थन की यात्रा रही है। आरएसएस की शुरुआत किसी पुरस्कार या सम्मान के लिए नहीं हुई थी।’’

आंबेकर ने संगठन के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा डाक टिकट जारी किये जाने का स्वागत किया और इसे ‘अच्छा कदम’ बताया।

आरएसएस की पृष्ठभूमि वाले अटल बिहारी वाजपेयी और मोदी जैसे नेताओं के प्रधानमंत्री बनने पर संघ में भावना के सवाल पर आंबेकर ने कहा, ‘‘यह निश्चित रूप से हमारे लिए गर्व का क्षण है।’’ उन्होंने यह भी दोहराया कि संघ का ध्यान राजनीतिक सत्ता की तलाश के बजाय राष्ट्रीय उत्थान पर केंद्रित है।

उन्होंने कहा कि हालांकि इन नेताओं का उत्थान ‘गर्व की बात’ है, लेकिन संगठन का उद्देश्य ‘‘कभी भी राजनीतिक शक्ति हासिल करना नहीं रहा है; इसका उद्देश्य राष्ट्र है’’।

आरएसएस नेता ने रेखांकित किया कि समग्र विकास के लिए अकेले राजनीतिक शक्ति अपर्याप्त है। उन्होंने कहा कि ‘‘सरकार के अपने कर्तव्य और सीमाएं हैं।’’

आंबेकर ने कहा कि समाज को मजबूत करने के प्रमुख कार्य के लिए ‘‘सभी की जागरूकता की आवश्यकता है’’ और ‘समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सक्रिय रूप से शामिल करने’’ का आरएसएस का मुख्य कार्य लंबे समय तक जारी रहेगा।

उन्होंने कहा कि बढ़ते जनादेश के साथ, आरएसएस अब ‘‘अधिक तेजी से आगे बढ़ने’’ के लिए तैयार है।

आंबेकर ने आरएसएस के भविष्य के लक्ष्यों के सवाल पर बढ़ते सामाजिक समर्थन को रेखांकित करते हुए कहा कि लोग ‘‘आरएसएस के साथ राष्ट्र निर्माण की सेवा में भाग लेना चाहते हैं।’’

उन्होंने विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा की जा रही आलोचना और आरएसएस के लिए भविष्य की चुनौतियों पर कहा, ‘‘आरएसएस ने हमेशा देश और उसके लोगों को अपना माना है।’’

आंबेकर ने इस दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए दो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उदाहरणों- 1948 में आरएसएस पर पाबंदी और 1975 से 1977 तक आपातकाल- का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर लगाया गया प्रतिबंध कुछ महीनों बाद हटा लिया गया था, तब तत्कालीन प्रमुख एम एस गोलवलकर ने घोषणा की थी कि ‘‘नफरत के लिए कोई स्थान नहीं है और (संघ को) आगे बढ़ना चाहिए।’’

आंबेकर ने कहा कि इसी तरह, आपातकाल हटाए जाने के बाद तत्कालीन प्रमुख बालासाहेब देवरस ने कार्यकर्ताओं को ‘‘भूल जाओ और माफ कर दो’’ की सलाह दी थी।

उन्होंने कहा, ‘‘आरएसएस पूरे समाज को अपना मानता है और इसमें नफरत के लिए कोई जगह नहीं है। आंबेकर ने संघ की समावेशी विचार का उल्लेख करते हुए कहा, ‘‘आरएसएस का दृष्टिकोण यह है कि आज कोई (व्यक्ति) हमारे साथ नहीं है, लेकिन (आगे) वह हमारे साथ रहेगा।’’

संघ नेता ने कहा, ‘‘आज आरएसएस के 32 मुख्य संगठन हैं और कई अन्य बड़े एवं छोटे संगठन तथा गतिविधियां हैं। इनका और विस्तार होगा, तथा नए विषयों को अपनाया जाएगा, जिन्हें स्वयंसेवक समझेंगे और शुरू करेंगे।’’

भाषा धीरज सुरेश

सुरेश


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