स्मार्टफोन आधारित खांसी जांच से आंध्र प्रदेश में टीबी के संभावित मरीजों की पहचान में मदद

स्मार्टफोन आधारित खांसी जांच से आंध्र प्रदेश में टीबी के संभावित मरीजों की पहचान में मदद

स्मार्टफोन आधारित खांसी जांच से आंध्र प्रदेश में टीबी के संभावित मरीजों की पहचान में मदद
Modified Date: May 11, 2026 / 11:27 am IST
Published Date: May 11, 2026 11:27 am IST

( मधु शर्मा )

अमरावती, 11 मई (भाषा) हैदराबाद स्थित एक स्टार्टअप ने स्मार्टफोन आधारित श्वसन ध्वनि जांच तकनीक विकसित की है, जिसकी मदद से आंध्र प्रदेश में संभावित तपेदिक (टीबी) संक्रमण की पहचान की जा रही है।

राज्य सरकार और रतन टाटा इनोवेशन हब (आरटीआईएच) की भागीदारी से की गई यह पहल सैलसिट टेक्नोलाजीज़ ने विकसित की है। एआई आधारित ‘स्वास’ श्वसन जांच मंच को ‘मेडटेक इनोवेशन चैलेंज 2025’ के तहत पूर्वी गोदावरी जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पायलट परियोजना के रूप में लागू किया गया।

पूर्वी गोदावरी जिले के गांवों में स्मार्टफोन लेकर घूम रहे स्वास्थ्यकर्मी ऐसे लोगों में टीबी और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों की पहचान कर रहे हैं, जो सामान्यतः चिकित्सकीय जांच नहीं कराते।

पारंपरिक सर्वेक्षण पद्धति पर निर्भर रहने के बजाय सहायक नर्स दाइयां (एएनएम) अब ग्रामीणों से ‘स्वास’ मोबाइल एप्लिकेशन में खांसने के लिए कह रही हैं। यह ऐप कृत्रिम मेधा (एआई) की मदद से श्वसन ध्वनियों का विश्लेषण कर आगे की जांच की सिफारिश करता है।

सैलसिट टेक्नोलॉजीज के संस्थापक और मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी नारायण राव ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “हमारा उद्देश्य हर व्यक्ति तक श्वसन जांच को सुलभ बनाना है। यह पायलट परियोजना दिखाती है कि स्मार्टफोन में दर्ज एक साधारण खांसी की ध्वनि भी बिना लक्षण वाले मामलों में शुरुआती पहचान संभव बना सकती है।”

‘मेडटेक इनोवेशन चैलेंज 2025’ के तहत लागू इस पहल में छह सप्ताह के भीतर करीब 8,000 लोगों की जांच की गई।

ग्रामीणों, विशेषकर बुजुर्गों, दिहाड़ी मजदूरों और दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह जांच प्रक्रिया केवल कुछ मिनटों में पूरी हो गई।

कार्यक्रम से संबद्ध स्वास्थ्यकर्मियों ने कहा कि यह तकनीक ग्रामीण इलाकों में उपयोगी साबित हुई, जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं और लोग बीमारी गंभीर होने तक जांच नहीं कराते।

एआई आधारित यह मंच स्मार्टफोन पर रिकॉर्ड की गई खांसी की आवाज का विश्लेषण कर टीबी, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) और दमा के जोखिम वाले लोगों की पहचान करता है।

राव के अनुसार, पायलट परियोजना के दौरान पहचाने गए टीबी मामलों में करीब 36 प्रतिशत मरीज ऐसे थे जिनमें कोई लक्षण नहीं थे और पारंपरिक जांच में उनके छूट जाने की संभावना थी।

उन्होंने कहा कि इस पहल से पारंपरिक सक्रिय निदान पद्धतियों की तुलना में टीबी की पहचान दर में लगभग 15 प्रतिशत सुधार हुआ।

टीबी के अलावा इस जांच में ग्रामीणों के बीच श्वसन संबंधी पुरानी बीमारियों का भी पता चला।

यह प्रणाली विकिरण-मुक्त है और इसमें किसी विशेष तकनीशियन या उपभोग्य सामग्री की आवश्यकता नहीं होती, जिससे यह सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में बड़े पैमाने पर उपयोग के लिए उपयुक्त होती है।

मंच को आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) प्रणाली से भी जोड़ा गया है, जिससे एबीएचए आईडी के जरिए मरीजों का पंजीकरण और ‘निक्षय’ जैसे राष्ट्रीय टीबी निगरानी मंचों से संपर्क संभव हो सका है।

कंपनी के अनुसार, ‘स्वास’ अब तक पांच लाख से अधिक श्वसन जांच कर चुका है।

भाषा मनीषा वैभव

वैभव


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