Kamika Ekadashi 2026: कामिका एकादशी पर बन रहे ‘द्विपुष्कर’ और ‘हर्षण’ योग में करें यह एक अचूक साधना, मिलेगा “वाजपेय” यज्ञ का महापुण्य!

Kamika Ekadashi 2026: कामिका एकादशी पर बना 'द्विपुष्कर' और 'हर्षण' योग का दुर्लभ संयोग! जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा एवं पारण का शुभ समय..

Kamika Ekadashi 2026: कामिका एकादशी पर बन रहे ‘द्विपुष्कर’ और ‘हर्षण’ योग में करें यह एक अचूक साधना, मिलेगा “वाजपेय” यज्ञ का महापुण्य!

Kamika Ekadashi 2026/Image Credit: ScreenGrab / AI Generated / @Grok

Modified Date: August 8, 2026 / 06:03 pm IST
Published Date: August 8, 2026 6:03 pm IST
HIGHLIGHTS
  • कामिका एकादशी पर 'द्विपुष्कर' और 'हर्षण' योग का दुर्लभ मिलन!
  • साक्षात् विष्णु जी के 'श्रीधर' रूप से मांग लें अपनी हर अधूरी कामना!
  • जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा एवं पारण का शुभ समय!

Kamika Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व हैं। श्रवण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को “कामिका एकादशी” कहा जाता है, जो इस वर्ष 9 अगस्त 2026, रविवार को मनाई जाएगी। वैदिक पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 8 अगस्त को दोपहर लगभग 1:59 बजे शुरू होकर 9 अगस्त को सुबह 11:04 बजे समाप्त होगी।

चूंकि उदयातिथि के नियम के अनुसार व्रत उसी दिन रखा जाता है जब सूर्योदय के समय तिथि उपस्थित हो, इसलिए कामिका एकादशी का व्रत 9 अगस्त को ही रखा जाएगा। इस व्रत का पारण अगले दिन 10 अगस्त (सोमवार) की सुबह 5:47 बजे से 8:00 बजे के बीच किया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार, सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले, पारण करना अत्यंत आवश्यक है।

कामिका एकादशी 2026 क्यों है विशेष?

इस वर्ष, 9 अगस्त को आने वाली “कामिका एकादशी” भक्तों के लिए बेहद खास होने वाली है, क्योंकि इस दिन “द्विपुष्कर” और “हर्षण” नामक दो विशेष योगों का महासंयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, ऐसे योगों में की गई पूजा-अर्चना का फल कई गुना अधिक मिलता है।

जहाँ “द्विपुष्कर योग” सुबह 11:04 बजे से दोपहर 2:43 बजे तक रहेगा, वहीं “हर्षण योग” पूरे दिन प्रभावी रहकर 10 अगस्त की रात 2:04 बजे समाप्त होगा। इस पावन समय में किए गए जप, ध्यान और दान से भक्तों को विशेष दैवीय कृपा प्राप्त होगी।

कामिका एकादशी का महत्व!

“कामिका एकादशी” का नाम ही इसके महत्व को बताता है। “कामिका” शब्द की उत्पत्ति “कामना” से हुई है, जिसका अर्थ है कि यह एकादशी सच्ची और शुभ इच्छाओं को पूर्ण करने वाली मानी जाती है। चूँकि सावन का महीना, चातुर्मास के अंतर्गत आता है, इसलिए इस पावन समय में किया गया हर धार्मिक कार्य विशेष फलदायी होता है। यह व्रत भगवान विष्णु के “श्रीधर” रूप को समर्पित है और चातुर्मास के शुरूआती दौर में आने के कारण इसका धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

शास्त्रों के अनुसार, इस पावन दिन भगवान विष्णु की आराधना करने से सभी पापों का नाश होता है और मन को असीम शांति मिलती है। इससे जीवन में सुख-समृद्धि आती है और मृत्यु के पश्चात मोक्ष के द्वार खुलते हैं। इस पूजा में भगवान श्रीहरि को तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) अर्पित करने का विशेष महत्व है, क्योंकि तुलसी उन्हें अत्यंत प्रिय है।

पूजा के शुभ मुहूर्त!

ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:02 से 4:45 बजे तक।
अमृत काल: सुबह 6:42 से 8:09 बजे तक।
अभिजीत मुहूर्त: 11:37 से 12:30 बजे तक।
विजय मुहूर्त: 2:15 से 3:07 बजे तक।
पूजा के लिए विशेष रूप से सुबह 7:27 से दोपहर 12:26 बजे तक का समय अच्छा उत्तम है।
व्रत पारण का समय: व्रत का पारण द्वादशी तिथि पर किया जाता है पारण के लिए 10 अगस्त 2026 की सुबह 5:50 से 8:00 बजे तक का समय उत्तम है।

कामिका एकादशी व्रत कथा !

पद्म पुराण में इस व्रत की अनुपम महिमा का वर्णन मिलता है, जिसकी कथा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी। कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक व्यक्ति से अनजाने में एक घोर पाप हो गया, जिससे वह अत्यंत दुखी और भयभीत रहने लगा। तब एक परम पूज्य ऋषि ने उसे मार्ग दिखाते हुए श्रावण कृष्ण पक्ष की ‘कामिका एकादशी’ का व्रत रखने की सलाह दी।

ऋषि के कहे अनुसार, उसने पूरी श्रद्धा के साथ भगवान विष्णु की पूजा की, उन्हें तुलसी दल अर्पित किया और रात्रि में जागरण किया। इस पावन व्रत के प्रभाव से उसके समस्त पाप नष्ट हो गए और उसे आत्मिक शांति मिली। मान्यताओं के अनुसार, इस कथा को केवल सुनने मात्र से ही वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि यह व्रत पापों से मुक्ति दिलाने और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना जाता है।

कामिका एकादशी व्रत की पूजा विधि!

  • एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ (पीले या सफ़ेद) वस्त्र धारण करें।
  • हाथ में जल और अक्षत लेकर भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
  • घर के मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र को पीले कपडे पर स्थापित करें और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) या गंगाजल से अभिषेक करें।
  • फिर चन्दन, पीले पुष्प, अक्षत, धुप-दीप अर्पित करें और तुलसी के पत्ते आवश्य चढ़ाएं।
  • फल, मिठाई और पंजीरी का भोग लगाएं।
  • फिर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें और “श्री विष्णु सहस्रनाम” या “विष्णु चालीसा” का पाठ करें। शाम को आरती व रात्रि जागरण करें।

Disclaimer:- उपरोक्त लेख में उल्लेखित सभी जानकारियाँ प्रचलित मान्यताओं और धर्म ग्रंथों पर आधारित है। IBC24.in लेख में उल्लेखित किसी भी जानकारी की प्रामाणिकता का दावा नहीं करता है। हमारा उद्देश्य केवल सूचना पँहुचाना है।

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