Pitru Stotra: क्या आपकी कुंडली में भी है पितृ दोष? इस चमत्कारी स्तोत्र को सुनने मात्र से ही सीधे पितृलोक तक गूँजेगी आपकी प्रार्थना!

Pitru Stotra: पितृ दोष से मुक्ति के लिए 'पितृ स्तोत्र' का पाठ बहुत लाभकारी माना जाता है। मान्यता है कि इस स्तोत्र के मंत्रों की दिव्य शक्ति से पितर देव पूरी तरह तृप्त और संतुष्ट हो जाते हैं आइए, अपने पूर्वजों के आशीर्वाद के लिए एक साथ पढ़ें और सुनें 'पितृ स्तोत्र'..

Pitru Stotra: क्या आपकी कुंडली में भी है पितृ दोष? इस चमत्कारी स्तोत्र को सुनने मात्र से ही सीधे पितृलोक तक गूँजेगी आपकी प्रार्थना!

Pitru Stotram/Image Credit: ScreenGrab / AI Generated / @Grok

Modified Date: September 28, 2026 / 01:07 pm IST
Published Date: September 28, 2026 1:04 pm IST
HIGHLIGHTS
  • पितृ पक्ष 2026: भाग्य की रेखाएं बदल देगा यह एक पाठ!
  • पितृ स्तोत्रम्: पितर देवों की असीम तृप्ति का महामंत्र!

Pitru Stotra: पितृ दोष से मुक्ति पाने और पूर्वजों की कृपा के लिए ‘पितृ स्तोत्र‘ का पाठ सबसे उत्तम है। यह पाठ विशेष रूप से अपने पूर्वजों की शांति के लिए किया जाता है। मान्यता है कि यदि पितृ पक्ष में यह पाठ किया जाए, तो पितरों को मुक्ति मिलती है और वे प्रसन्न होकर घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य का आशीर्वाद देते हैं।

हिन्दू धर्म के अनुसार, प्रत्येक मनुष्य पर तीन मुख्य ऋण होते हैं। ‘देव ऋण’, ‘ऋषि ऋण’ और ‘पितृ ऋण’। ‘पितृ स्तोत्र’ का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मनुष्य को ‘पितृ ऋण’ से मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि इस स्तोत्र के मंत्रों की दिव्य शक्ति से पितर देव पूरी तरह तृप्त और संतुष्ट हो जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष हो और उसे लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हो, तो पितृ स्तोत्र का नियमित पाठ उस दोष के प्रभाव को कम या पूरी तरह समाप्त कर देता है।

पितृपक्ष (Shradh Paksh) में यदि प्रतिदिन समय न मिल पाए, तो चतुर्थी और अमावस्या के दिन इस स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। यदि आप स्वयं पाठ नहीं कर सकते, तो इसे केवल श्रद्धापूर्वक सुनने मात्र से भी समान लाभ प्राप्त होते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इन विशेष तिथियों को पितरों की तृप्ति और प्रसन्नता के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। तो देर किस बात की? आइए, मिलकर श्रद्धाभाव से पढ़ते और सुनते हैं ‘पितृ स्तोत्र‘।

Pitra Dev Stotram:॥ अथ श्री पितृ स्तोत्रम् ॥

अर्चितानाममूर्तानां पितॄणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्॥1॥

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
सप्तर्षोणां तथान्येषां तान्नमस्यामि कामदान्॥2॥

मन्वादीनां च नेतारः सूर्याचन्द्रमसोस्तथा।
तान्नमस्याम्यहं सर्वान्पितॄनप्युदधावपि॥3॥

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलिः॥4॥

प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरुणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलिः॥5॥

नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वायम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे॥6॥

सोमाधारान्पितृगणान्योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्॥7॥

अग्निरूपांस्तथैवान्यान्नमस्यामि पितॄनहम्।
अग्निसोममयं विश्वं यत एतदशेषतः॥8॥

ये च तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः॥9॥

तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।
नमोनमो नमस्तेऽस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुजः॥10॥

॥ इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे
रुचिकृतपितृस्तोत्रं नामैकोननवतितमोऽध्यायान्तर्गतम् ॥

Disclaimer:- उपरोक्त लेख में उल्लेखित सभी जानकारियाँ प्रचलित मान्यताओं और धर्म ग्रंथों पर आधारित है। IBC24.in लेख में उल्लेखित किसी भी जानकारी की प्रामाणिकता का दावा नहीं करता है। हमारा उद्देश्य केवल सूचना पँहुचाना है।

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