एकदंत संकष्टी चतुर्थी : आज इस तरह प्रसन्न होंगे भगवान गणेश, जानें पूजन विधि, शुभ मुहूर्त और व्रत कथा

Worship method, auspicious time and story of Ekdant Sankashti Chaturthi : इस तरह प्रसन्न होंगे भगवान, पूजन विधि, शुभ मुहूर्त और व्रत कथा....

Edited By: , May 19, 2022 / 11:28 AM IST

Ekdant Sankashti Chaturthi : नई दिल्ली। आज ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को एकदंत संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। आज के दिन बुद्धि, बल और विवेक के देवता श्री गणेश की पूजा की जाती है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और संकटमोचन भी कहा जाता है। मान्यता है कि एकदंत संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश खास रूप से की पूजा-अर्चना, व्रत और कथा का पाठ करने से सभी दुख, परेशानी, संकट और पाप मिट जाते हैं। आज के दिन इस शुभ मुहूर्त और इस विधि से पूजा करके भगवान को प्रसन्न कर सकते है।>>*IBC24 News Channel के WhatsApp  ग्रुप से जुड़ने के लिए Click करें*<<

पूजा का शुभ मुहूर्त

चतुर्थी तिथि प्रारंभ:- 18 मई, रात 11:36 बजे से
चतुर्थी तिथि समापन:- 19 मई, रात 08:23 बजे तक
श्री गणेश के पूजा का समय:- 19 मई प्रातःकाल से
शुभ योग: दोपहर 02:58 बजे के बाद
शुभ समय :- 11:50 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक
चंद्रोदय समय:- रात 10:56 मिनट पर

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दुर्वा, चंदन और मोदक से प्रसन्न होंगे भगवान गणेश

Ekdant Sankashti Chaturthi : गुरुवार के दिन सुबह से संकष्टी चतुर्थी की पूजा की जा रही है। आज के दिन सबसे पहले सुबह उठकर स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद भगवान गणेश की पूरी विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें। उन्हें तिल, गुड़, लड्डू, दुर्वा, चंदन और मोदक का भोग लगाएं। इस दौरान ॐ गं गणपतये नम: मंत्र का जाप, गणेश स्तुति, गणेश चालीसा और संकट चौथ व्रत कथा पढ़नी चाहिए। पूजा खत्म होने के बाद गणेश जी की आरती जरूर पढ़ें। दिन पूरा होने के बाद रात में चांद निकलने से पहले गणेश भगवान की फिर से पूजा करें। चंद्रोदय के बाद दुग्ध से चंद्रदेव को अर्घ्य देकर पूजन करें और फलाहार ग्रहण करें। संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का व्रत करने से व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी होती है।

ये है एकदंत संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा

Ekdant Sankashti Chaturthi : हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नदी किनारे बैठे थे। तभी अचानक माता पार्वती को चौपड़ खेलने की इच्छा हुई, लेकिन वहां उन दोनों के अलावा तीसरा कोई नहीं था जो इस खेल में निर्णायक भूमिका निभा सकता। शिवजी और पार्वती ने मिलकर एक मिट्टी की मूर्ति बनाई और उसमें जान डाली और उसे खेल में सही फैसला लेने का आदेश दिया। खेल में माता पार्वती बार-बार भगवान शिव को मात दे रही थीं।

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चलते खेल में एक बार गलती से बालक ने माता पार्वती को हारा हुआ घोषित कर दिया। माता लपार्वती ने गुस्से में आकर बालक को श्राप दे दिया और वह लंगड़ा हो गया। बालक ने अपनी भूल के लिए माता से बार-बार क्षमा मांग रहा था। बालक के निवेदन को देखते हुए माता ने कहा कि अब श्राप वापस नहीं हो सकती, लेकिन एक उपाय से श्राप से मुक्ति पाई जा सकती है। माता ने कहा कि संकष्टी वाले दिन पूजा करने इस जगह पर कुछ कन्याएं आती हैं, तुम उनसे व्रत की विधि पूछना और सच्चे मन से व्रत का करना।

बालक ने व्रत की विधि जानकर श्रद्धापूर्वक संकष्टी का व्रत किया। उसकी सच्ची आराधना से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उसे वरदान मांगने को कहा। बालक ने माता पार्वती और भगवान शिव के पास जाने की इच्छा बताई। भगवान गणेश ने उस बालक को शिवलोक पंहुचा दिया, लेकिन जब वह पहुंचा तो वहां उसे केवल भगवान शिव ही मिले। माता पार्वती भगवान शिव से नाराज होकर कैलाश छोड़कर चली गई थीं। जब शिवजी ने बच्चे से पूछा की तुम यहां कैसे आए तो उसने बताया कि गणेश की पूजा से उसे यह वरदान प्राप्त हुआ है। यह जानने के बाद भगवान शिव ने भी पार्वती को मनाने के लिए संकष्टी का व्रत को किया और इसके बाद माता पार्वती भगवान शिव से प्रसन्न होकर कैलाश वापस लौट आती हैं।

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