समानता के लिए है समान नागरिक संहिता

समानता के लिए है समान नागरिक संहिता
Modified Date: July 14, 2026 / 08:10 pm IST
Published Date: July 14, 2026 8:10 pm IST

समानता के लिए है समान नागरिक संहिता

— डॉ कृपाशंकर चौबे

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 मे राज्य के नीति निदेशक तत्वों के द्वारा संविधान निर्माताओं ने राज्य को यह जिम्मेदारी दी है कि वह समान नागरिक संहिता लागू करे। कालांतर मे माननीय उच्चतम न्यायालय ने सरला मुद्गल विरुद्ध भारत संघ मामले में 1995 मे माननीय प्रधानमंत्री से अपेक्षा की गयी थी कि वे अनुच्छेद 44 मे सभी नागरिकों के लिए समान सिविल संहिता बनाएं जिससे पीड़ित व्यक्ति की रक्षा तथा राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सुदृढ़ किया जा सके। प्रगति बरगीज बनाम सिरिल जॉर्ज मे मुंबई उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने भारतीय तलाक अधिनियाम 1986 की धारा 10 को अवैध करार दिया था जिसमे एक ईसाई महिला को पति से तलाक लेने के लिए जार कर्म के साथ -साथ क्रूरता और अधित्यजन को साबित करना एक शर्त होती थी । नूर शबा खातून बनाम मोहम्मद कासिम मे उच्चतम न्यायालय ने यह निश्चित किया है की एक तलकशुदा मुस्लिम महिला अपने बच्चों के लिए जब तक की वे बालिग नहीं हो जाते हैं, पति से भरण पोषण पाने की अधिकारी है ।

हमारा देश विविधताओं से भरा है जहाँ अनेक पंथ, भाषाएँ, और परम्पराएँ हैं । यह विविधता ही हमारी शक्ति है, नागरिक अधिकारों और कर्तव्यों के मामले मे हमारा संविधान सबसे पहले हमे एक जिम्मेदार “भारतीय नागरिक” के रूप में देखता है और यह सुनश्चित करता है कि सभी के अधिकारों की सुरक्षा हो एवं सभी के समान अवसर तथा समानता की भावना हो।

समान नागरिक संहिता का अर्थ किसी धर्म विशेष की संहिता को सब पर थोपना नहीं है। इसका आशय केवल इतना है कि भारत के सभी नागरिकों को धर्म, जाति या लिंग की परवाह किए बिना विवाह, तलाक, बच्चा गोद लेने और सम्पत्ति के उतराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों मे एक समान व्यवहार किया जाये एवं उनके लिए एक समान कानून हो। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और भरण-पोषण जैसे नागरिक विषयों में सभी भारतीयों के लिए समान और न्यायपूर्ण कानून होना चाहिए। वर्तमान परिदृश मे देश मे भिन्न- भिन्न समुदायों के अपनी -अपनी मान्यताओं के कारण कानूनी रूप से उन्हे एक साथ लाने मे काफी कठिनाईयां हो रही है। कहीं – कहीं पर विवाह की उम्र 15 वर्ष निर्धारित की गई है जबकि बाल विवाह अधिनियाम के अनुसार यह बालकों के लिए 21 वर्ष एवं बालिकाओं के लिए 18 वर्ष है। इसी प्रकार कहीं-कहीं जनजातीय समाज मे भी विवाह की उम्र को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। बालकों को गोद लेने संबंधित प्रक्रिया के लिए भारत मे CARA अथवा HAMA के द्वारा कानूनी प्रावधान किए गए हैं। HAMA सिर्फ हिंदुओं पर लागू होता है जिसके कारण अन्य समुदायों के लोग अपने रक्त संबंधियों के बालकों को कानूनी रूप से गोद नहीं ले पाते साथ ही कहीं -कहीं व्यक्तिगत कानूनों के कारण तो गोद लिए जाने वाले बालकों को कानूनी अधिकार भी नहीं प्राप्त हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम जो सभी प्रकार के बालकों की मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा की बात करता है यह भी अल्पसख्यक विद्यालयों पर लागू नहीं होने के कारण वहाँ के बालकों को शिक्षा से बँचित रहना पड़ता है । इस संहिता के लागू होने के पश्चात वर्तमान में मौजूद अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ (जैसे हिंदू मैरिज एक्ट, मुस्लिम पर्सनल लॉ आदि) समाप्त हो जाएने और सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून प्रभावी हो जाएंगे।

समान नागरिक संहिता लागू करने का सबसे बड़ा कारण हमारे संविधान द्वारा प्रदत्त सभी नागरिकों को समानता का अधिकार है, जब सभी के लिए समान कानून है तो व्यक्तिगत कानूनों में असमानता क्यों बनी रहे? कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं, और सभी के लिए समान कानून है तो नागरिक जीवन के महत्वपूर्ण विषयों में भी समानता का सिद्धांत लागू होना चाहिए।

महिला सशक्तिकरण और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम जैसे कानून, व्यक्तिगत कानूनों के कारण आज भी पूरी तरह से लागू नहीं हो पा रहे हैं जिनके कारण महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार नहीं प्राप्त हो रहे। समान नागरिक संहिता महिलाओं को विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में अधिक न्यायपूर्ण और समान अधिकार प्रदान करने का माध्यम बन सकता है। समान नागरिक संहिता न्याय व्यवस्था को अधिक सरल, स्पष्ट और पारदर्शी बना सकती है। समान नागरिक संहिता जैसे महत्वपूर्ण विषय को लागू करते समय संवेदनशीलता और व्यापक संवाद अत्यंत आवश्यक है। सिर्फ कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा बल्कि इसके लिए इसके उचित क्रियान्वयन हेतु समाज को जागरूक और इस कानून के बारे किए जा रहे दुष्प्रचारों से समाज को बचाना होगा जिस से किसी प्रकार की अवांछनीय स्थिति उत्पन्न न हो ।

समान नागरिक संहिता लागू करने हेतु सावधानियाँ :

समान नागरिक संहिता को तैयार करने से पहले सभी धार्मिक समुदायों, विधि विशेषज्ञों, महिला संगठनों और सामाजिक प्रतिनिधियों से व्यापक परामर्श किया जाए।संहिता का आधार किसी एक धर्म की परम्परा नहीं, बल्कि संविधान के मूल मूल्य—न्याय, समानता, स्वतंत्रता और गरिमा—होने चाहिए। व्यक्तिगत कानूनों में यदि पहले से अच्छे और प्रगतिशील प्रावधान हैं तो उनको समान नागरिक संहिता मे शामिल किया जाना चाहिए। सांस्कृतिक और धार्मिक आस्थाओं को ध्यान मे रख कर कानून लागू किया जाना चाहिए।

व्यापक जनसंवाद और विधिक साक्षरता अभियान चला कर इसे चरण बद्ध तरीके से लागू किया जाना चाहिए। महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजनों के अधिकारों की विशेष रूप से चिंता की जानी चाहिए जिसे से यह सामाजिक न्याय का वास्तविक साधन बन सके।

समान नागरिक संहिता केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि एक ऐसे भारत की परिकल्पना है जहाँ नागरिक अधिकार धर्म, जाति या लिंग के आधार पर अलग-अलग न हों, बल्कि संविधान की भावना के अनुरूप सभी के लिए समान और न्यायपूर्ण हों। समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विविधता को समाप्त करना नहीं, बल्कि विविधता के बीच समान नागरिक अधिकारों की स्थापना करना होना चाहिए।

वर्तमान परिदृश्य : पुर्तगाली सिविल कोड के रूप में यह कानून गोवा में स्वतंत्रता के पूर्व से ही लागू है जबकि उत्तराखंड यह कानून पारित करने वाला स्वतंत्र भारत का पहला राज्य है।असम भी समान नागरिक कानून का विधेयक पारित करने वाले राज्यों में शामिल है।

—डॉ कृपा शंकर चौबे
सदस्य किशोर न्याय बोर्ड, भोपाल

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