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करोड़ों देशभक्त नागरिकों के दिल में है RSS का पंजीयन

करोड़ों देशभक्त नागरिकों के दिल में है RSS का पंजीयन डॉ. लोकेन्द्र सिंह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पंजीकृत क्यों नहीं है? यह अपने आय-व्यय का हिसाब-किताब क्यों नहीं देता है? …

करोड़ों देशभक्त नागरिकों के दिल में है RSS का पंजीयन
Krishnamurari Tripathi Atal
Published: 22 Jun 2026 | 1:52 pmModified: 22 Jun 2026 | 1:52 pm
HIGHLIGHTS
  1. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पंजीकृत क्यों नहीं है? यह अपने आय-व्यय का हिसाब-किताब क्यों नहीं देता है? आरएसएस पारदर्शिता नहीं रखता है। ये ऐसे सवाल हैं, जो संघ को बदनाम करने या उसके प्रति समाज में संदेह पैदा करने के लिए अकसर उछाले जाते हैं। हालांकि, इन सवालों का कोई औचित्य नहीं है। समाज से लेकर न्यायालय तक इन्हें खारिज कर चुके हैं। मजेदार और हास्यास्पद बात यह है कि जो लोग संविधान लहराते हुए घूम रहे हैं, उन्हें यह भी नहीं पता है कि संविधान ही यह अधिकार देता है कि भारत के नागरिक बिना किसी पंजीयन के संगठन, समिति, समूह बनाकर समाज में काम कर सकते हैं।
  2. संघ के स्वयंसेवकों ने जब विभिन्न क्षेत्रों में कार्य प्रांरभ किया, कार्यालय बनाएं, भवन खड़े किए, तो उनको संचालित करने के लिए बाकायदा पंजीकृत संस्थाएं खड़ी की हैं। उदाहरण के तौर पर, सेवा के क्षेत्र में कार्यरत सेवा भारती एक पंजीकृत संस्था है। मजदूरों के क्षेत्र में कार्यरत भारतीय मजदूर संघ भी पंजीकृत है। ये संस्थाएं अपने आय-व्यय का सारा हिसाब सरकार को सौंपती हैं। कुछ नासमझ दिल्ली में बने संघ कार्यालय को लेकर बहुत प्रश्न खड़े करते हैं। वह कार्यालय भी केशव स्मारक समिति का भवन है, जो एक पंजीकृत संस्था है।
  3. संघ एक संस्था या संगठन के रूप में प्रारंभ नहीं हुआ अपितु आंदोलन के रूप में प्रारंभ हुआ था। इसलिए जब संघ शुरू किया गया, तब न तो इसका कोई नाम था और न इसे चलाने के लिए कोई समिति थी।

करोड़ों देशभक्त नागरिकों के दिल में है RSS का पंजीयन

डॉ. लोकेन्द्र सिंह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पंजीकृत क्यों नहीं है? यह अपने आय-व्यय का हिसाब-किताब क्यों नहीं देता है? आरएसएस पारदर्शिता नहीं रखता है। ये ऐसे सवाल हैं, जो संघ को बदनाम करने या उसके प्रति समाज में संदेह पैदा करने के लिए अकसर उछाले जाते हैं। हालांकि, इन सवालों का कोई औचित्य नहीं है। समाज से लेकर न्यायालय तक इन्हें खारिज कर चुके हैं। मजेदार और हास्यास्पद बात यह है कि जो लोग संविधान लहराते हुए घूम रहे हैं, उन्हें यह भी नहीं पता है कि संविधान ही यह अधिकार देता है कि भारत के नागरिक बिना किसी पंजीयन के संगठन, समिति, समूह बनाकर समाज में काम कर सकते हैं। इसलिए कहा जाता है कि संविधान लहराने की वस्तु नहीं है, अपितु उसका अध्ययन करना चाहिए और पालन भी। लेकिन नहीं, उन्हें तो प्रोपेगेंडा खड़ा करने में ही आनंद आता है। जरा सोचिए, यदि आरएसएस के लिए पंजीयन अनिवार्य होता तब क्या कांग्रेस बिना पंजीयन संघ को इतने वर्ष चलने देती? कांग्रेस की सरकारों ने संघ को तीन बार प्रतिबंधित किया लेकिन उसको पंजीयन के लिए कभी बाध्य नहीं किया। महात्मा गांधी की हत्या के झूठे आरोप लगाकर जब संघ पर प्रतिबंध लगाया था, तब उसके विरुद्ध स्वयंसेवकों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया। सरकार को बिना शर्त संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा। सरकार ने अपने आपको शर्मिंदगी से बचाने के लिए संघ से उसके संविधान की लिखित कॉपी तो मांगी, लेकिन उस समय भी पंजीयन नहीं माँगा। यह स्थिति तब है जबकि उस समय की सरकार येन-केन-प्रकारेण संघ को कुचलना या उस पर अपना नियंत्रण चाहती थी। बहरहाल, उसके बाद भी सरकार ने कभी संघ का पंजीयन नहीं माँगा। हाँ, संघ को रोकने के सारे हथकंडे अवश्य अपनाए गए, आज भी अपनाए जा रहे हैं। लेकिन समाज का विश्वास जीतकर संघ अजेय शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है। इस मामले में सच यह है कि आज भी पंजीयन की माँग नहीं होती अपितु इस फर्जी प्रश्न की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का प्रयास किया जाता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में प्रारंभ से यह स्पष्ट किया जाता रहा है कि संघ भारत के सभी कानूनों का सम्मान करता है और उनके दायरे में रहकर ही कार्य करता है।

एक संस्था नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन :

संघ के पंजीकृत संगठन न होने के कई कारण हैं। उनमें से एक है कि संघ स्वयं को समाज में अलग से किसी संगठन के तौर पर नहीं देखता है अपितु संघ तो स्वयं को संपूर्ण समाज का संगठन मानता है। जब समाज का पंजीयन आवश्यक नहीं है तब संघ के पंजीयन का प्रश्न क्यों? दूसरी बात, संघ एक संस्था या संगठन के रूप में प्रारंभ नहीं हुआ अपितु आंदोलन के रूप में प्रारंभ हुआ था। इसलिए जब संघ शुरू किया गया, तब न तो इसका कोई नाम था और न इसे चलाने के लिए कोई समिति थी। 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में कुछ युवाओं के साथ इसकी शुरुआत की। उद्देश्य केवल एक था- समाज का संगठन, व्यक्ति निर्माण और भारत की सर्वांगीण स्वतंत्रता। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत अकसर कहते हैं कि “जिन अंग्रेजों के विरुद्ध संघ प्रारंभ हुआ था, उनके पास जाकर ही संघ का पंजीयन कराते क्या? संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े थे और अंग्रेजों की उन पर कड़ी नजर थी। इसलिए उन्होंने जानबूझकर संघ को 1860 के अंग्रेजों के ‘सोसायटी पंजीकरण अधिनियम’ के तहत पंजीकृत कराने से परहेज किया”। याद रहे कि वर्तमान समय में संघ इकलौता संगठन नहीं है, जिसका पंजीयन नहीं है, अपितु देश में अनेक संस्थाएं, समितियां, समूह और अध्ययन मंडल हैं, जो भारत के संविधान के प्रकाश में बगैर पंजीयन के श्रेष्ठ सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं। याद रहे कि संघ में कोई भी व्यक्ति सदस्यता फॉर्म भरकर औपचारिक सदस्य नहीं बनता था, न ही नियमित शुल्क देकर सदस्यता ली जाती है। स्वयंसेवक शाखा में आते हैं, प्रशिक्षण लेते हैं और सामाजिक कार्यों में भागीदारी करते हैं। इसलिए संघ की संरचना आरंभ से ही एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन की रही, न कि किसी पंजीकृत संस्था की।

भारत का संविधान क्या कहता है :

संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ग) हर नागरिक को संगठन, यूनियन या सहकारी समितियां बनाने का मौलिक अधिकार देता है। इसके लिए राज्य से पूर्व-पंजीकरण कराना अनिवार्य नहीं है। किसी संगठन और संस्था को सरकारी सहायता प्राप्त करने के लिए पंजीयन की आवश्यकता होती है। संस्था की पहचान एवं अस्तित्व के लिए पंजीयन जरूरी नहीं है। संघ न तो सरकार से और न ही किसी बाहरी संस्था से फंड लेता है, वह तो अपने स्वयंसेवकों की गुरु दक्षिणा से चलता है। इसलिए संविधान के अनुसार उसे पंजीयन की कतई आवश्यकता नहीं है।

क्या कहते हैं न्यायालय :

संघ विरोधियों ने इनकम टैक्स के बहाने हाथ घुमाकर संघ का कान पकड़ने का प्रयास किया था। लेकिन वह प्रयास भी संघ के पक्ष में ही गया। विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार बताते हैं कि “इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने 1967-68 और 1975-76 में असेसिंग ऑफिसर के जरिए आदेश जारी किए थे कि आरएसएस को अपनी आय पर टैक्स देना होगा। दोनों ही मामलों में हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि ‘म्यूचुअल ट्रस्ट कानूनों’ के तहत ‘गुरु दक्षिणा’ से होने वाली आय पर इनकम टैक्स नहीं लगता”। पटना उच्च न्यायालय के सामने यह भी रखा गया कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने 19 दिसंबर 1978 के एक पत्र में स्पष्ट किया था कि आरएसएस को उसके सदस्यों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा को पारस्परिकता के सिद्धांत के आधार पर कर-मुक्त माना जाएगा। पटना उच्च न्यायालय ने फरवरी 1994 में आरएसएस के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे आज तक विरोधी चुनौती नहीं दे सके हैं।

संघ की अन्य संस्थाएं विधिवत पंजीकृत हैं :

संघ के स्वयंसेवकों ने जब विभिन्न क्षेत्रों में कार्य प्रांरभ किया, कार्यालय बनाएं, भवन खड़े किए, तो उनको संचालित करने के लिए बाकायदा पंजीकृत संस्थाएं खड़ी की हैं। उदाहरण के तौर पर, सेवा के क्षेत्र में कार्यरत सेवा भारती एक पंजीकृत संस्था है। मजदूरों के क्षेत्र में कार्यरत भारतीय मजदूर संघ भी पंजीकृत है। ये संस्थाएं अपने आय-व्यय का सारा हिसाब सरकार को सौंपती हैं। कुछ नासमझ दिल्ली में बने संघ कार्यालय को लेकर बहुत प्रश्न खड़े करते हैं। वह कार्यालय भी केशव स्मारक समिति का भवन है, जो एक पंजीकृत संस्था है। कार्यालय के निर्माण का संपूर्ण विवरण केशव स्मारक समिति के पास उपलब्ध है। जरा आँखें खोलकर देखेंगे तो दिखेगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अस्तित्व, इसकी कार्यप्रणाली और फंडिंग मॉडल कोई रहस्य नहीं है। सबकुछ पारदर्शी है। न्यायालयों, आयकर अपीलीय अधिकरणों और सरकारों ने कई बार इसकी समीक्षा की है और हर बार इसे एक वैध सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में मान्यता दी है। बिना ठोस कानूनी आधार के संघ के पंजीकरण पर सवाल उठाना केवल राजनीतिक बहस का हिस्सा तो हो सकता है, लेकिन यह संगठन की वैधानिकता या उसकी संवैधानिक स्वतंत्रता को खंडित नहीं करता। इस प्रकार के वितंडावाद को समाज बहुत पहले ही खारिज कर चुका है। इसलिए इस मामले में विरोधियों को गाल बजाने के अलावा और कुछ हासिल नहीं होगा।

  • डॉ. लोकेन्द्र सिंह

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।)

Disclaimer- ब्लॉग में व्यक्त विचारों से IBC24 अथवा SBMMPL का कोई संबंध नहीं है। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर से जिम्मेदार हैं।

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Web Title: The RSS is registered in the hearts of crores of patriotic citizens ARTICLE BY DR LOKENDRA SINGH

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