61 साल का इंतज़ार: खन्ना को आयुष की सफलता में 1965 की अपनी झलक दिख रही
61 साल का इंतज़ार: खन्ना को आयुष की सफलता में 1965 की अपनी झलक दिख रही
… अमित कुमार दास …
नयी दिल्ली, 11 अप्रैल (भाषा) आयुष शेट्टी जब बैडमिंटन एशिया चैंपियनशिप में पुरुष एकल खिताब के लिए भारत के 61 साल के इंतजार को खत्म करने से सिर्फ एक कदम दूर खड़े हैं, तब पूर्व चैंपियन दिनेश खन्ना को अपनी 1965 की ऐतिहासिक जीत की कहानी फिर से दोहराती नजर आ रही है। खन्ना की 1965 की जीत आज भी इस टूर्नामेंट में भारत की इकलौती सफलता बनी हुई है। उस समय वह गैरवरीय खिलाड़ी के रूप में उतरे थे और उनसे ज्यादा उम्मीद नहीं थी। छह दशक बाद उन्हें आयुष के फाइनल तक के मौजूदा सफर में वही समानताएं दिख रही हैं। खन्ना ने कहा, “मुझे यह मानना होगा कि काफी समानता नजर आ रही है। मैं भी गैरवरीय था और फाइनल तक पहुंचा। आयुष की भी अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग ज्यादा ऊंची नहीं है और वह भी गैरवरीय हैं।” उन्होंने कहा कि पहले उम्मीदें लक्ष्य सेन से थीं, लेकिन वह पहले ही दौर में बाहर हो गए, ठीक वैसे ही जैसे 1965 में खन्ना बड़े नामों की छाया में थे। खन्ना ने उस समय इंजीनियरिंग कॉलेज की पढ़ाई पूरी की थी और भारत के चौथे नंबर के खिलाड़ी के रूप में खेल रहे थे, जहां सुरेश गोयल जैसे स्थापित खिलाड़ियों का दबदबा था। उनकी तैयारी भी सीमित थी, क्योंकि वह घुटने की सर्जरी से उबर रहे थे, लेकिन उन्होंने धैर्य और मानसिक मजबूती के दम पर मुकाबलों में बढ़त बनाई। खन्ना ने याद करते हुए कहा कि उन्होंने 1963 में घुटने की बड़ी सर्जरी करवाई थी और धीरे-धीरे वापसी की। चयन टूर्नामेंट में वह सेमीफाइनल तक पहुंचे और भारत के चौथे खिलाड़ी के रूप में टीम में चुने गए। उनकी जीत की राह आसान नहीं थी। क्वार्टर फाइनल में उन्होंने जापान के राष्ट्रीय चैंपियन योशिनोरी इतागाकी को हराया, जहां लंबी रैलियों के कारण दोनों खिलाड़ी थक गए थे। खन्ना ने बताया कि उस मैच में इतनी कड़ी टक्कर थी कि रेफरी को स्ट्रेचर तक तैयार रखने के लिए कहना पड़ा। उन्होंने फाइनल में थाईलैंड के संगोब रत्तानुसोर्न का सामना किया और बिना ज्यादा दबाव महसूस किए खिताब जीत लिया। खन्ना ने बताया कि महान केडी सिंह बाबू से अचानक हुई मुलाकात के बाद उन्हें प्रेरणा मिली, जिन्होंने दिग्गज ध्यानचंद के साथ हॉकी में ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता था। खन्ना ने कहा, ‘‘केडी सिंह बाबू लखनऊ में थे। उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया और मुझे शुभकामनाएं दीं। उन्हें देखकर मैंने मन ही मन सोचा कि अगर यह भारतीय जीत सकता है, तो एक भारतीय होने के नाते मैं भी अच्छा प्रदर्शन कर सकता हूं, क्योंकि उस समय भारत ने कई खेलों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था।’’ आयुष की मौजूदा यात्रा में भी कई समानताएं हैं। उन्होंने सेमीफाइनल में शीर्ष वरीयता प्राप्त और गत चैंपियन कुनलावत वितिदसर्न को हराकर फाइनल में जगह बनाई। खन्ना ने अपने समय में रक्षात्मक खेल के दम पर जीत हासिल की थी, वहीं आयुष ने आक्रामक अंदाज अपनाया है। खन्ना ने खास तौर पर आयुष की दबाव में खेलने की क्षमता की तारीफ की। उन्होंने कहा, “उन्होंने पहला गेम आसानी से गंवा दिया था, लेकिन इसके बाद शानदार वापसी की। ऐसे समय में दबाव बहुत ज्यादा होता है, लेकिन उन्होंने संयम बनाए रखा।” खन्ना ने आयुष की स्मैशिंग, नेट प्ले और लंबी रैलियों में आक्रामकता की भी सराहना की और कहा कि वह बेसलाइन से भी बेहतरीन विनर्स निकाल रहे हैं। उन्होंने बेंगलुरु के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के निदेशक विमल कुमार, सागर चोपड़ा और इंडोनेशिया के कोच इरवानस्याह आदि को भी आयुष के मार्गदर्शन के लिए श्रेय दिया। खन्ना ने 1965 में अपनी जीत पर कोई बड़ा जश्न नहीं मनाया था, लेकिन इस बार दांव कहीं ज्यादा बड़े हैं। भारत छह दशकों से इस खिताब का इंतजार कर रहा है, और वह खिलाड़ी जिसने यह कर दिखाया था, अब उम्मीद कर रहा है कि आयुष भी उसी असंभव-सी लगने वाली कहानी को फिर से सच कर दिखाएं। भाषा आनन्द नमितानमिता

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