पदक जीतने वाले थ्रो से पहले पिता ने यशवीर से कहा था, भविष्य इसी पर निर्भर है, पूरी ताकत लगा दो

पदक जीतने वाले थ्रो से पहले पिता ने यशवीर से कहा था, भविष्य इसी पर निर्भर है, पूरी ताकत लगा दो

पदक जीतने वाले थ्रो से पहले पिता ने यशवीर से कहा था, भविष्य इसी पर निर्भर है, पूरी ताकत लगा दो
Modified Date: August 1, 2026 / 08:17 pm IST
Published Date: August 1, 2026 8:17 pm IST

(फिलेम दीपक सिंह)

नयी दिल्ली, एक अगस्त (भाषा) भाला फेंक एथलीट यशवीर सिंह के पिता ने बेटे के राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीतने से कुछ क्षण पहले कहा था, ‘जिंदगी का आखिरी सवाल है, दम लगाके मारना’। ये शब्द यशवीर के लिए प्रेरणादायी साबित हुए और उन्होंने अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो लगाकर पदक जीत लिया।

शुक्रवार को ग्लास्गो में 24 वर्षीय यशवीर ने छठे और अंतिम प्रयास में 85.41 मीटर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ थ्रो डाला जो उन्हें तीसरा स्थान दिलाने के लिए काफी था। इसके साथ ही वह रजत पदक जीतने वाले भारतीय स्टार नीरज चोपड़ा के साथ पोडियम पर खड़े हुए। इससे पहले यशवीर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 83.72 मीटर था।

यशवीर तीसरे प्रयास में 81.33 मीटर के थ्रो के साथ अंतिम राउंड से पहले सातवें स्थान पर थे, लेकिन अंतिम प्रयास में 85.41 मीटर का शानदार थ्रो कर उन्होंने इतिहास रच दिया।

यशवीर के पिता राय सिंह ने ग्लास्गो से पीटीआई से फोन पर कहा, ‘‘मेरे बेटे के लिए 85 मीटर से ज्यादा दूर फेंकना कोई बड़ी बात नहीं है। अंतिम थ्रो से पहले रन-अप पर जाने से ठीक पहले मैंने उससे सीधे कहा था कि ‘जिंदगी संवर जाएगी, दम लगाकर मारना।’ उसने बिल्कुल वैसा ही किया और मुझे उस पर बहुत गर्व है। ’’

राय सिंह यशवीर के निजी कोच भी हैं और खुद पूर्व राष्ट्रीय स्तर के भाला फेंक खिलाड़ी रह चुके हैं। वह ग्लास्गो के स्कॉटस्टोन स्टेडियम में भाला फेंकने वाले खिलाड़ियों के रनवे के ठीक ऊपर दर्शक दीर्घा में मौजूद थे।

राय ने बताया, ‘‘मैंने उससे कहा था, ‘बेटा जिंदगी बदल जाएगी, पूरा जोर लगाना, जितना तेज भाग सकते हो भागना, गिर जाओ तो गिरने देना। जिंदगी का आखिरी सवाल है, उस मकसद में तुम्हें खरा उतरना है’। ’’

यशवीर पहले भी अपने करियर में पिता के योगदान के बारे में बता चुके हैं और यह भी बताया था कि उन्होंने शुरुआत बांस के भाले से की थी।

राय सिंह ने 2006 में संन्यास लेने से पहले राष्ट्रीय पदक और रेलवे चैंपियनशिप खिताब जीते थे। इसके बाद वह खेल कोटे के तहत रेलवे में कोच बने। वह एनआईएस डिप्लोमा धारक भी हैं।

यह कांस्य पदक केवल यशवीर की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं था, बल्कि उनके पिता के अधूरे सपने का भी पूरा होना था।

राय ने कहा, ‘‘मैंने सीनियर राष्ट्रीय ओपन और राष्ट्रीय अंतर-राज्यीय प्रतियोगिताओं में पदक जीते हैं। मेरे नाम रेलवे, दिल्ली और हरियाणा के रिकॉर्ड रहे हैं। मैं एनआईएस डिप्लोमा धारक हूं और खेल कोटे से रेलवे कर्मचारी रहा हूं। मैं मूल रूप से भिवानी का हूं, लेकिन पिछले 32 वर्षों से रेलवे में काम कर रहा हूं और अब जयपुर में बस गया हूं। ’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने अपनी पूरी ताकत उसके (यशवीर) पीछे लगा दी है। मेरे परिवार ने भी उसके लिए पूरा सहयोग किया है। ’’

यशवीर का जन्म और पालन-पोषण जयपुर में हुआ और वह वहीं भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं।

राय ने कहा, ‘‘मैं हमेशा से चाहता था कि यशवीर कोई व्यक्तिगत खेल अपनाए और राष्ट्रमंडल खेलों, एशियाई खेलों जैसे बड़े टूर्नामेंट में पदक जीते। मैं खुद ऐसा नहीं कर पाया, राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों में पदक नहीं जीत सका इसलिए चाहता था कि वह ये बड़े पदक जीते। ’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैं चाहता था कि मेरा बेटा वह सपना पूरा करे, जिसे मैं पूरा नहीं कर सका। शायद उस समय कोचिंग, उपकरण, डाइट जैसी सुविधाओं की कमी थी। इसलिए मैंने पूरी कोशिश की कि मेरे बेटे को उन मुश्किलों और सुविधाओं की कमी का सामना नहीं करना पड़े। ’’

यशवीर के परिवार की तीन पीढ़ियों में एथलेटिक्स का जुनून रहा है।

राय ने कहा, ‘‘मेरे पिता राष्ट्रीय स्तर के 400 मीटर बाधा दौड़ एथलीट थे और मेरा छोटा भाई 110 मीटर बाधा दौड़ खेलता है और रेलवे में है। यशवीर के भाई (उत्सव) ने हाल में खेलो इंडिया विश्वविद्यालय खेलों में भाला फेंक में पदक जीता है। ’’

भाषा नमिता मोना

मोना


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