डेढ़ लाख तक की आबादी वाला देश क्यूरासाओ इतिहास रचने को तैयार

डेढ़ लाख तक की आबादी वाला देश क्यूरासाओ इतिहास रचने को तैयार

डेढ़ लाख तक की आबादी वाला देश क्यूरासाओ इतिहास रचने को तैयार
Modified Date: June 13, 2026 / 08:05 pm IST
Published Date: June 13, 2026 8:05 pm IST

( कुशान सरकार )

नयी दिल्ली, 13 जून (भाषा) फीफा विश्व कप में पूर्व एस्टन विला के मिडफील्डर लिएंड्रो बाकुना, उनके छोटे भाई जुनिन्हो और शेफील्ड यूनाइटेड के फॉरवर्ड ताहित चोंग जब रविवार को मजबूत जर्मनी की टीम के खिलाफ मैदान पर उतरेंगे तो छोटे से द्वीप क्यूरासाओ के लोग एक ऐतिहासिक पल का आनंद लेंगे।

वेनेजुएला से 40 मील उत्तर में स्थित और 2010 तक नीदरलैंड एंटिल्स का हिस्सा रहे क्यूरासाओ के लिए विश्व फुटबॉल की दिग्गज टीमों के बीच अपनी जगह बनाना एक चुनौती है। उसकी प्रतिद्वंद्वियों का सामना एक फुर्तीली टीम से होगा जिस पर नीदरलैंड का प्रभाव साफ दिखता है।

हालांकि क्यूरासाओ नीदरलैंड से मीलों दूर है, लेकिन सदियों से ‘डच’ (नीदरलैंड के) प्रभाव के कारण यह सांस्कृतिक रूप से कैरेबियाई के बजाय यूरोपीय ज्यादा है।

इसमें कोई हैरानी नहीं कि विश्व फुटबॉल के सबसे सम्मानित मुख्य कोच डिक एडवोकेट (78 वर्ष) इस टूर्नामेंट में भाग लेने वाले सबसे छोटे देश के सबसे उम्रदराज कोच हैं।

और 21 खिलाड़ियों की टीम में से 12 खिलाड़ी डच प्रीमियर डिवीजन में खेलते हैं जिसे ‘एरेडिविसी’ के नाम से जाना जाता है।

कप्तान लिएंड्रो इंग्लिश प्रीमियर लीग में खेल चुके हैं और अब तुर्की की शीर्ष लीग में खेलते हैं। वहीं स्ट्राइकर चोंग ने मैनचेस्टर यूनाइटेड के लिए पांच मैच खेले हैं और अब चैंपियनशिप टीम शेफील्ड यूनाइटेड के लिए खेलते हैं।

एनसीआर के ग्रेटर नोएडा में रहने वाले लोगों की संख्या से थोड़ी ज्यादा 1.55 लाख की आबादी वाला यह देश विश्व कप क्वालीफायर के दौरान अपने कॉनकाकाफ ग्रुप में अपनी क्षमता से कहीं बेहतर प्रदर्शन कर चुका है।

हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मेक्सिको और अमेरिका के सह-मेजबान होने से उनका सफर आसान हो गया क्योंकि ये दोनों देश क्वालीफायर का हिस्सा नहीं थे।

लेकिन इंग्लैंड के पूर्व मैनेजर स्टीव मैकलारेन की जमैका की टीम और यूनाइटेड के दिग्गज ड्वाइट यॉर्क की अगुवाई वाली त्रिनिदाद एवं टोबैगो की टीम को हराना निश्चित रूप से तारीफ के काबिल है।

लेकिन अगर हम इस आजाद देश (जो अभी सिर्फ़ 16 साल का है) के सफर पर नजर डालें तो यह जीत खेल की सीमाओं से आगे बढ़कर उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन जाती है।

16वीं और 17वीं सदी की शुरुआत में विलेमस्टैड (जो अब क्यूरासाओ की राजधानी है) एक बंदरगाह हुआ करता था जहां बीमार स्पेनिश और पुर्तगाली नाविकों का इलाज किया जाता था।

कैरिबियन और दक्षिण अमेरिकी क्षेत्र में अपने कारोबार का विस्तार करने की इच्छुक डच वेस्ट इंडिया कंपनी ने 1634 में क्यूरासाओ पर कब्जा कर लिया। कंपनी की सेना ने क्यूरासाओ पर हमला किया और स्पेनिश लोगों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया।

डच लोगों का यह कदम बहुत सोच-समझकर उठाया गया था क्योंकि उन्हें अपने कारोबार के लिए एक बंदरगाह की जरूरत थी। इस कारोबार में वेनेजुएला को खाने-पीने की चीजें और मछली निर्यात करने के अलावा गुलामों की तस्करी भी शामिल थी।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद क्यूरासाओ और अरूबा नीदरलैंड एंटिल्स का हिस्सा बन गए और 2010 में आजादी मिलने तक उसी का हिस्सा रहे।

यहां के लोगों के बीच ‘पापियामेंटो’ भाषा आज भी काफी लोकप्रिय है, हालांकि पहले इस पर प्रतिबंध था क्योंकि यह गुलामों की भाषा मानी जाती थी।

हालांकि डच प्रभाव ने फुटबॉल संस्कृति को बनाने में मदद की जिसका बहुत अच्छा नतीजा निकला। क्यूरासाओ के परिवारों के लिए, बेहतर भविष्य के लिए अपने बच्चों को नीदरलैंड भेजना जीवन का एक हिस्सा बन गया है। और इससे राष्ट्रीय टीम को भी मदद मिली है क्योंकि लगभग सभी खिलाड़ियों ने अपने कौशल को बेहतरीन डच फुटबॉल अकादमियों में निखारा है। उदाहरण के लिए चोंग फेनूर्ड अकादमी से निकले खिलाड़ी हैं।

डच स्टाइल फुटबॉल में भारी निवेश के बावजूद इस क्षेत्र का हर कोच अच्छे नतीजे नहीं दे पाया।

डच और बार्सिलोना के महान खिलाड़ी पैट्रिक क्लुइवर्ट ने शुरुआती वर्षों में बहुत अच्छा काम किया। उनकी देखरेख में राष्ट्रीय टीम ने बैंकॉक में किंग्स कप जीता जो एक प्रतिष्ठित टूर्नामेंट है और जिसमें कभी भारत को भी आमंत्रित किया जाता था।

हालांकि जब दिग्गज कोच गुस हिडिंक आए और उन्होंने टीम संस्कृति के बारे में अपने नए विचारों के साथ कुछ अलग करने की कोशिश की लेकिन उनका तरीका काम नहीं आया।

हिडिंक ने ‘ओपन बस पार्टी’ को रोकने की कोशिश की थी जो क्यूरासाओ की संस्कृति का एक अहम हिस्सा है और इसका विरोध हुआ।

इसके बाद एडवोकाट आए जिन्होंने दक्षिण कोरिया को 2002 के ऐतिहासिक सेमीफाइनल तक पहुंचाया था। वह अपनी रणनीतिक समझ और मानवीय दृष्टिकोण के साथ आए जिससे क्वालीफायर के दौरान टीम को बहुत मदद मिली।

यही वजह थी कि जब एडवोकेट ने क्वालीफायर के दौरान अपनी बीमार बेटी के साथ रहने के लिए नौकरी छोड़ी थी तो बेटी के ठीक होने के संकेत मिलने पर उन्हें वापस बुला लिया गया।

16वीं सदी में बीमार पुर्तगाली नाविकों ने क्यूरासाओ का नाम ‘इल्हा दा क्यूरासाओ’ रखा था, जिसका मतलब है ‘ठीक करने वाला द्वीप’। यह नाम उन्होंने विटामिन सी से भरपूर उन फलों की वजह से रखा था जिन्हें वे बीमारी के दौरान खाते थे।

एडवोकेट इस छोटे से देश की सबसे बड़ी परीक्षा में वही ‘हीलिंग टच’ (राहत देने वाला स्पर्श) लेकर आए हैं।

भाषा नमिता आनन्द

आनन्द


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