सोशल मीडिया के जरिए खेल में तेजी से फैल रही है नफरत

सोशल मीडिया के जरिए खेल में तेजी से फैल रही है नफरत

सोशल मीडिया के जरिए खेल में तेजी से फैल रही है नफरत
Modified Date: May 26, 2026 / 07:24 pm IST
Published Date: May 26, 2026 7:24 pm IST

(कुशान सरकार)

नयी दिल्ली, 26 मई (भाषा) ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज ट्रेविस हेड की पत्नी जेसिका डेविस ने हाल ही में विराट कोहली के साथ मैदान पर हुई अपने पति की बहस के बाद अपने परिवार पर ऑनलाइन हो रही अपशब्दों की बौछार के बारे में बात की तो यह सिर्फ प्रशंसकों की आपसी प्रतिद्वंद्विता का एक और मामला नहीं था।

ना ही पंजाब किंग्स की कंटेंट टीम के साथ एक हल्के-फुल्के सोशल मीडिया वीडियो में दिखाई देने के बाद श्रेष्ठा अय्यर को निशाना बनाए जाने पर उनकी पीड़ादायक प्रतिक्रिया कोई छोटा मामला थी।

ये ‘भावुक प्रशंसकों’ के विकृत रूप लेने के इक्का-दुक्का मामले नहीं हैं।

ये एक विषैले तंत्र के लक्षण हैं – एक संगठित, मुद्रीकृत और अब अनियंत्रित नफरत का उद्योग जिसे क्रिकेट की बाहरी व्यावसायिक मशीनरी ने पिछले एक दशक में जानबूझकर बनाने में मदद की है।

जो आक्रामक सोशल मीडिया मार्केटिंग के रूप में शुरू हुआ था वह धीरे-धीरे एक विकृत राक्षस में बदल गया है।

इन चीजों की जानकारी रखने वाले एक जानकार ने पीटीआई को बताया, ‘‘ऐसी एजेंसियां हैं जो किसी विशेष खिलाड़ी के खिलाफ बेहिसाब नफरत फैलाने के लिए 25,000 रुपये से लेकर दो लाख रुपये तक वसूल सकती हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘अभियान चलाने के लिए अनुकूलित आंकड़े दिए जा सकते हैं। अब यह उन पर निर्भर करता है कि वे विषय को ट्रेंड कराएं। जाहिर है ट्रेंडिंग के घंटों और दिनों के हिसाब से कीमतें अलग-अलग होंगी।’’

लगभग एक दशक पहले क्रिकेटरों के आसपास सोशल मीडिया का खेल नाटकीय रूप से बदल गया जब ये मंच केवल जुड़ाव के साधन नहीं रह गए बल्कि व्यावसायिक लाभ के स्रोत बन गए।

एक खिलाड़ी के सोशल मीडिया फॉलोअर्स की संख्या तेजी से उसके डिजिटल विज्ञापन सौदों का मूल्य निर्धारित करने लगी।

एक वायरल हैशटैग करोड़ों के विज्ञापन सौदों में तब्दील हो सकता था और यहीं से पूरी व्यवस्था स्थायी रूप से बदल गई।

इस व्यवस्था की कार्यप्रणाली से परिचित बीसीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘‘और यहीं से एक बहुत महत्वपूर्ण घटक की शुरुआत हुई। खिलाड़ियों की छवि और विज्ञापनों को संभालने वाली खेल प्रबंधन फर्म।’’

अधिकारी ने समझाया, ‘‘मैनेजर अच्छे फॉलोअर्स वाले सोशल मीडिया प्रोफाइल खंगालते थे। उन्हें खिलाड़ी की सोशल मीडिया पहुंच बढ़ाने के लिए नियुक्त किया जाता था।’’

जल्द ही, फैन क्लबों की संख्या तेजी से बढ़ गई।

एल्गोरिदम ने सूक्ष्मता के बजाय आक्रोश, विश्लेषण के बजाय अपशब्दों और खेल की सराहना के बजाय गुटबाजी को बढ़ावा दिया।

जो शुरुआत में हानिरहित प्रशंसक सहभागिता प्रतीत होती थी वह धीरे-धीरे प्रचार का हथियार बन गई।

प्रबंधकों, एजेंसियों और सोशल मीडिया संचालकों ने पाया कि अस्वाभाविक प्रचार दोनों तरह से काम करता है – एक खिलाड़ी का महिमामंडन करता है और दूसरे को व्यवस्थित रूप से नीचा दिखाता है।

किसी ने यह अंदाजा नहीं लगाया था कि यह पूरा पारिस्थितिकी तंत्र इतनी तेजी से संस्थागत नियंत्रण से बाहर निकल जाएगा।

अब दुर्व्यवहार सिर्फ खिलाड़ियों तक ही सीमित नहीं रहा। उनके परिवार भी इसकी चपेट में आ गए। पत्नियां, बहनें और यहां तक कि बच्चे भी उस माहौल में आसानी से निशाना बन गए।

भाषा सुधीर आनन्द

आनन्द


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