गुंडा अधिनियम बेगुनाहों को परेशान करने का जरिया नहीं बनना चाहिए: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
गुंडा अधिनियम बेगुनाहों को परेशान करने का जरिया नहीं बनना चाहिए: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
लखनऊ, 12 सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश में गुंडा अधिनियम के कथित गलत इस्तेमाल पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह कानून बेगुनाह लोगों को परेशान करने का जरिया नहीं बनना चाहिए। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने शुक्रवार को एक याचिका मंजूर करते हुए कहा कि गुंडा अधिनियम ‘‘बहुत शक्तिशाली’’ कानून है और इसका इस्तेमाल बेहद सावधानी से, केवल स्पष्ट मामलों में तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से किया जाना चाहिए।
पीठ ने यह टिप्पणी जाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित करने और छह महीने के लिए जिला बदर करने के गोंडा के जिलाधिकारी (डीएम) के आदेश को रद्द करते हुए की।
अदालत ने मंडलायुक्त के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें डीएम के फैसले को बरकरार रखा गया था।
गोंडा के जिलाधिकारी ने 11 मई 2026 को गुंडा अधिनियम के तहत यह आदेश जारी किया था।
यह कार्रवाई दो आपराधिक मामलों और एक ‘बीट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट’ के आधार पर की गई थी।
इनमें एक मामला 2010 और दूसरा 2020 का था।
अदालत ने पाया कि 2010 के मामले में गोंडा के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) ने 26 अगस्त 2017 को ही जाहिद अली को बरी कर दिया था।
पीठ ने कहा कि जिस मामले में कोई व्यक्ति पहले ही बरी हो चुका हो, उसे बाद में उसे ‘गुंडा’ घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
पीठ ने यह भी कहा कि 2020 के आपराधिक मामले और 2026 में अली को गुंडा घोषित करने के आदेश के बीच करीब छह वर्ष का अंतर है और दोनों के बीच कोई तार्किक संबंध नहीं बनता।
उच्च न्यायालय ने पुलिस रिपोर्ट में उस मामले का उल्लेख किए जाने पर भी आपत्ति जताई, जिसमें अली पहले ही बरी हो चुका था।
अदालत ने कहा कि इससे संकेत मिलता है कि डीएम के समक्ष याचिकाकर्ता की गलत तस्वीर पेश की गई।
पीठ ने कहा कि केवल 2020 के एक आपराधिक मामले में शामिल होने से यह साबित नहीं होता कि अली आदतन अपराधी हैं या अपराध करते हैं अथवा अपराध के लिए उकसाते हैं।
अदालत ने ‘बीट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट’ को भी गुंडा एक्ट अधिनियम करने का पर्याप्त आधार मानने से इनकार कर दिया।
पीठ ने कहा कि उस सूचना के आधार पर कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया गया था और अली को इस संबंध में अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं दिया गया था इसलिए ऐसी जानकारी पर भरोसा करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।
पीठ ने यह भी पाया कि मंडलायुक्त ने उस मामले को, जिसमें अली बरी हो चुके थे, उनके खिलाफ लंबित मामला मान लिया।
अदालत ने कहा कि इससे पता चलता है कि मंडलायुक्त ने अपने विवेक का उचित इस्तेमाल नहीं किया।
डीएम और मंडलायुक्त, दोनों के आदेशों को कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं पाते हुए उच्च न्यायालय ने उन्हें रद्द कर दिया और जाहिद अली की याचिका मंजूर कर ली।
भाषा सं आनन्द जितेंद्र
जितेंद्र

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