रिट याचिका दाखिल करने के लिए वादी और अधिवक्ता की व्यक्तिगत उपस्थिति जरूरी नहीं: उच्च न्यायालय

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रिट याचिका दाखिल करने के लिए वादी और अधिवक्ता की व्यक्तिगत उपस्थिति जरूरी नहीं: उच्च न्यायालय

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  • Publish Date - July 29, 2026 / 12:32 AM IST,
    Updated On - July 29, 2026 / 12:32 AM IST

लखनऊ, 28 जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि रिट याचिका दाखिल करते समय वादियों और अधिवक्ताओं के लिए फोटो पहचान के उद्देश्य से व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना अनिवार्य नहीं है।

अदालत ने कहा कि देश में कहीं भी विधिवत नोटरीकृत हलफनामे इस उद्देश्य के लिए वैध हैं।

उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय ने उच्च न्यायालय द्वारा अपनाई गई फोटो शपथ-पत्र पहचान प्रणाली को चुनौती देने वाली एक याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

पीठ ने कहा कि स्टांप रिपोर्टिंग अनुभाग सभी विधिसम्मत हलफनामों को स्वीकार करता है, चाहे वे फोटो शपथ-पत्र पहचान प्रक्रिया के माध्यम से दाखिल किए गए हों या किसी नोटरी के समक्ष विधिवत नोटरीकृत किए गए हों।

याचिकाकर्ता विश्वजीत चौधरी ने इस व्यवस्था को चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि सामान्य वादियों को फोटो सत्यापन के लिए व्यक्तिगत रूप से उच्च न्यायालय में उपस्थित होना पड़ता है, जबकि केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारियों को इससे छूट दी गई है।

उनका कहना था कि यह भेदभावपूर्ण व्यवस्था मनमानी है और संविधान के अनुच्छेद-14 का उल्लंघन करती है।

याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू की गई ई-फाइलिंग व्यवस्था अब भी लागू है और इसके तहत वादी देश में कहीं से भी विधिवत नोटरीकृत हलफनामे के साथ रिट याचिका तथा अन्य आवेदन दाखिल कर सकते हैं।

पीठ ने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत दिए गए एक जवाब में पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि दाखिले के चरण में विधिवत नोटरीकृत हलफनामे स्वीकार किए जाते हैं।

इस स्पष्टीकरण के मद्देनजर अदालत ने कहा कि रिट याचिका दाखिल करने के लिए फोटो पहचान को अनिवार्य मानने का कोई आधार नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने याचिका को अनावश्यक बताते हुए खारिज कर दिया।

भाषा

सं, जफर रवि कांत