उप्र विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति, सेवा विस्तार के खिलाफ याचिका दायर
उप्र विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति, सेवा विस्तार के खिलाफ याचिका दायर
लखनऊ, तीन जून (भाषा) उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति और निर्धारित सेवानिवृत्ति की आयु के बाद भी उनके पद पर बने रहने को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के समक्ष चुनौती दी गई है।
विधानसभा के एक पूर्व अधिकारी ने यह याचिका दायर की है।
मामला न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह के सामने आया, जिन्होंने मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया और निर्देश दिया कि इसे किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।
याचिका उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष के पूर्व सूचना अधिकारी कर्मेश प्रताप सिंह ने दायर की है।
याचिकाकर्ता ने उस कानूनी अधिकार पर सवाल उठाया है जिसके तहत दुबे प्रमुख सचिव के पद पर बने हुए हैं।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि 2009 में दुबे की नियुक्ति ने उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय (भर्ती और सेवा की शर्तें) नियम, 1974 का उल्लंघन किया, जिसमें चुनिंदा श्रेणी के पदों पर नियुक्ति के लिए 52 वर्ष की ऊपरी आयु सीमा निर्धारित की गई थी।
याचिका के अनुसार, जब दुबे की नियुक्ति हुई थी तब वह पहले ही आयु सीमा पार कर चुके थे।
याचिकाकर्ता ने उस कानूनी अधिकार को साबित करने के लिए निर्देश देने का अनुरोध किया जिसके तहत दुबे पद पर बने हुए है और मामले के फैसले तक उन्हें कार्यालय की शक्तियों का प्रयोग करने से रोकने के लिए एक अंतरिम आदेश देने का भी अनुरोध किया है।
याचिका में कहा गया है कि दुबे ने 13 जनवरी 2009 को उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली और उसी दिन उन्हें प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य) नियुक्त किया गया। छह दिन बाद उन्हें विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव पद का प्रभार सौंपा गया।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि नियुक्ति प्रक्रिया विज्ञापन, प्रतिस्पर्धी चयन, लोक सेवा आयोग के परामर्श या संविधान के अनुच्छेद 187 के तहत आवश्यक अनुमोदन के बिना की गई थी।
याचिका में दावा किया गया कि 2010-11 के दौरान विधानसभा सचिवालय सेवा नियमों में किए गए संशोधनों को कभी भी सदन के सामने नहीं रखा गया, लेकिन बाद में दुबे को बार-बार सेवा विस्तार देने के लिए उनका इस्तेमाल किया गया।
याचिका में विधानसभा सचिवालय सहकारी समिति से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं के आरोप भी लगाए गए, जिसमें करोड़ों रुपये के अनियमित ऋण और अन्य वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगाया गया।
इसमें दावा किया गया कि राष्ट्रपति सचिवालय, प्रधानमंत्री कार्यालय और राज्यपाल सचिवालय सहित कई संवैधानिक प्राधिकारियों को शिकायतें सौंपी गईं, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
भाषा सं जफर पारुल शफीक
शफीक

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