देश में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कार्य पिछले कुछ वर्षों में शुरू हुआ : मनोज सिन्हा

देश में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कार्य पिछले कुछ वर्षों में शुरू हुआ : मनोज सिन्हा

देश में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कार्य पिछले कुछ वर्षों में शुरू हुआ : मनोज सिन्हा
Modified Date: January 4, 2026 / 07:43 pm IST
Published Date: January 4, 2026 7:43 pm IST

गोंडा, चार जनवरी (भाषा) जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने रविवार को कहा कि पूरे देश में एक राष्ट्र के लिए आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कार्य पिछले कुछ वर्षों में शुरू हुआ है।

नंदिनी नगर परिसर में आयोजित राष्ट्रकथा के संयोजक व पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के आमंत्रण पर एक दिवसीय दौरे पर यहां पहुंचे मनोज सिन्हा ने संवाददाताओं से कहा कि राष्ट्र कथा के आयोजन से विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने के लिए अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्य की भी चिंता होगी।

उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया के जीडीपी में भारत का जो योगदान था, उसके समक्ष यूरोपियन राज्य और अमेरिका का भी योगदान नहीं हुआ करता था। लेकिन लंबे कालखंड की गुलामी के कारण यहां का धन, यश, वैभव लूटा गया।

 ⁠

सिन्हा ने कहा कि 11वीं शताब्दी में जो राष्ट्र दुनिया का सबसे संपन्न राष्ट्र था, आजादी के बाद उसका योगदान बहुत कम हो गया। पिछले 10-11 वर्षों में देश की आर्थिक ताकत काफी विकसित हुई है।

उन्होंने कहा कि जो इंग्लैंड हमसे 45 ट्रिलियन डॉलर लूट के ले गया, उसी इंग्लैंड को पीछे छोड़कर के हम दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं। आज दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था युवाओं के संकल्प से ही तेजी से आगे बढ़ेगी और यहां के युवा राष्ट्र को वैभव पर ले जाएंगे। फिर से विकसित भारत बनेगा।

उन्होंने पूर्व सांसद को इस आयोजन के लिए बधाई दी। इससे पूर्व नंदिनी निकेतन पहुंचने पर उपराज्यपाल ने सबसे पहले नंदिनी माता की विधिवत पूजा-अर्चना की। इसके बाद वे परिसर में स्थित यज्ञशाला पहुंचे, जहां उन्होंने मां बगलामुखी की पूजा की।

वैदिक विद्वानों के मंत्रोच्चार के बीच उन्होंने राष्ट्र की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की। पूजा-अर्चना के बाद मंच पर पहुंचने पर पूर्व सांसद ने उनका स्वागत किया। दोनों नेताओं ने एक साथ बैठकर सद्गुरु ऋतेश्वर जी महाराज द्वारा प्रवाहित राष्ट्र कथा का श्रवण किया।

भाषा

सं, आनन्द रवि कांत


लेखक के बारे में