समुदाय के अधिकारों और बहुलवाद की रक्षा के लिए यह चुनाव अहम: अलीगढ़ में मुस्लिम मतदाताओं ने कहा

Ads

समुदाय के अधिकारों और बहुलवाद की रक्षा के लिए यह चुनाव अहम: अलीगढ़ में मुस्लिम मतदाताओं ने कहा

  •  
  • Publish Date - April 21, 2024 / 05:19 PM IST,
    Updated On - April 21, 2024 / 05:19 PM IST

(तस्वीर के साथ)

(उज्मी अतहर)

अलीगढ़ (उप्र), 21 अप्रैल (भाषा) उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में अपेक्षाकृत धीमे चुनाव प्रचार के बीच इस लोकसभा चुनाव को लेकर मुस्लिम समुदाय का नजरिया थोड़ा अलग दिखाई देता है। इनमें से कुछ लोग अधिकारों और बहुलवाद की रक्षा के लिहाज से इसे अहम चुनाव के रूप में देख रहे हैं जबकि अन्य लोग राजनीतिक दलों की ओर से खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। इसके साथ ही प्रमुख राजनीतिक दल अपने मूल जानाधार पर ध्यान केंद्रित करने में लगे हैं।

अलीगढ़ संसदीय क्षेत्र में मुस्लिम एक बड़ा समुदाय है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ताले बनाने के गढ़ के रूप में मशहूर अलीगढ़ शहर में 40 प्रतिशत लोग मुस्लिम हैं।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के 45 वर्षीय चालक शादाब खान ने कहा, ‘‘मेरे लिए यह चुनाव संविधान की रक्षा के बारे में है, जो मुझे और इस देश में हर किसी को समानता का अधिकार देता है।’’

शहर के मुस्लिम समुदाय के कई अन्य लोगों ने भी उनकी भावना का समर्थन किया।

अलीगढ़ के शमशाद बाजार में एक स्थानीय भोजनालय के कार्यकर्ता सैयद आमिर ने इस चुनाव को भारत में बहुलवाद के अस्तित्व का मामला बताया। आमिर ने कहा, ‘‘अगर हम अभी वोट नहीं करेंगे तो हम यह मौका हमेशा के लिए खो सकते हैं।’’

शहर के सिविल लाइंस क्षेत्र के मोहम्मद शिराज की तरह कुछ मुस्लिम मतदाताओं में निराशा की भावना है जो राजनीतिक दलों की ओर से खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं।

शिराज ने कहा, ‘‘सत्तारूढ़ दल को हमारे वोट की जरूरत नहीं है और विपक्ष मानता है कि हमारे पास उन्हें वोट देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यही कारण है कि भले ही चुनाव में कुछ ही दिन बचे हैं, लेकिन किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता ने हमसे संपर्क नहीं किया है, उम्मीदवारों की तो बात ही छोड़ दें।’’

इन सबके बीच अलीगढ़ में चुनाव प्रचार अपेक्षाकृत धीमा है तथा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) जैसे प्रमुख दलों के उम्मीदवार विशिष्ट जनसांख्यिकीय समूहों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

भाजपा के निवर्तमान सांसद सतीश गौतम अपनी पार्टी के पारंपरिक समर्थक व्यापारी समुदाय तक पहुंच को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि सपा ग्रामीण जाटों का समर्थन जुटाने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

समाजवादी पार्टी के एक पदाधिकारी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘हमारा गठबंधन अलीगढ़ में हिंदू-मुस्लिम एकता पर लड़ रहा है और यह बताने की जरूरत नहीं है, लेकिन परीक्षा की तरह आप कठिन विषयों पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। हम भी ऐसा ही कर रहे हैं लेकिन हम मुस्लिम समुदाय के कल्याण को अपने दिल में रखते हैं।’’

एएमयू के इतिहास विभाग के प्रोफेसर मोहम्मद सज्जाद का कहना है कि ‘बहुसंख्यक एकीकरण’ के वर्तमान माहौल में अल्पसंख्यक मतदाता अकसर खुद को निरर्थक महसूस करते हैं।

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘जिस तरह से कई वर्षों से बहुसंख्यकवादी एकजुटता देखी जा रही है, ऐसे में सवाल अब मुस्लिम मतों को लेकर नहीं है। यह इस बारे में है कि क्या हिंदू मतदाताओं को हिंदुत्व या बहुलवादी और सहिष्णु हिंदू धर्म की ओर झुकना चाहिए। क्या वे गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता जैसे आर्थिक मुद्दों के आधार पर वोट करेंगे या केवल धार्मिक वर्चस्ववाद के मामलों पर मतदान करेंगे?’’

सज्जाद ने कहा, ‘‘यह निर्णय अंततः बहुसंख्यक समुदाय द्वारा किया जाएगा, 10-12 प्रतिशत अल्पसंख्यक इतना विशिष्ट महत्व नहीं रखता है। यह कुछ ऐसा है जिसे हिंदुओं को तय करना है।’’

भारत के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक एएमयू इस तरह के विचार के केंद्र में स्थित है। डॉ. इफ्तिखार अहमद अंसारी जैसे अकादमिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस संस्था में भारत के धर्मनिरपेक्ष और बहुलवादी लोकाचार अंतर्निहित हैं, लेकिन इसे उभरती लोकतांत्रिक और सामाजिक मांगों को अपनाने की चुनौती का भी सामना करना पड़ता है।

अंसारी ने कहा, ‘‘मुसलमानों ने कभी भी एक रूढ़िवादी गुट के रूप में मतदान नहीं किया है, जैसा कि उन पर ‘ठप्पा’ लगा दिया गया है। उन्होंने सामूहिक रूप से मतदान नहीं किया है… लेकिन वे उन लोगों को वोट देते हैं जो उनकी संस्कृति को सबसे अच्छी तरह संरक्षित कर सकते हैं और बढ़ावा दे सकते हैं जिसमें कि वे पले-बढ़े हैं।’’

राजनीति विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘यहां तक ​​कि एएमयू में भी मुसलमानों के बारे में यही धारणा है कि वे रूढ़िवादी मानसिकता वाले हैं या वे झुंड की मानसिकता रखते हैं, लेकिन यह सच्चाई नहीं है…वे बहुत खुले विचारों वाले हैं।’’

प्रोफेसर सैयद अली नदीम रिजवी ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यहां एक भी मुस्लिम नहीं है जिसे ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहा जा सके।

उन्होंने कहा, ‘‘यहां के मुसलमान अपने अधिकारों के बारे में बात करेंगे और ऐसा करना आपको राष्ट्र-विरोधी नहीं बनाता है।’’

अलीगढ़ में 26 अप्रैल को दूसरे चरण में लोकसभा चुनाव होना है। अलीगढ़ संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत खैर, बरौली, अतरौली, कोल और अलीगढ़ सदर विधानसभा क्षेत्र आते हैं।

भाषा संतोष नेत्रपाल

नेत्रपाल