पांच माह से अधिक का अजन्मा भ्रूण कानून की नजर में ‘व्यक्ति’ है: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

पांच माह से अधिक का अजन्मा भ्रूण कानून की नजर में ‘व्यक्ति’ है: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

पांच माह से अधिक का अजन्मा भ्रूण कानून की नजर में ‘व्यक्ति’ है: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
Modified Date: March 20, 2026 / 11:38 pm IST
Published Date: March 20, 2026 11:38 pm IST

लखनऊ, 20 मार्च (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने शुक्रवार को कहा कि पांच माह से अधिक समय तक गर्भ में पलने वाले अजन्मे भ्रूण को कानून की नजर में एक ‘व्यक्ति’ माना जाएगा और एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु होने पर परिवार अलग से मुआवजे का हकदार होगा।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने रेलवे दावा अधिकरण, लखनऊ के एक आदेश के खिलाफ प्रथम अपील स्वीकार करते हुए यह निर्णय दिया। अधिकरण ने पूर्व में केवल एक गर्भवती महिला की मृत्यु के लिए मुआवजा मंजूर किया था और अजन्मे बच्चे के लिए राहत से इनकार किया था।

यह मामला दो सितंबर, 2018 को हुई एक दुखद घटना से जुड़ा है जिसमें आठ से नौ माह की गर्भवती भानमती ट्रेन पर चढ़ते समय गिर गईं और गंभीर रूप से घायल हो गईं। बाद में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई और साथ ही उनके अजन्मे बच्चे की भी मृत्यु हो गई।

अधिकरण ने अप्रिय रेलवे घटनाओं से जुड़े प्रावधानों के तहत महिला की मृत्यु के लिए आठ लाख रुपये का मुआवजा दिया था, लेकिन मुआवजे के लिए उस भ्रूण को एक अलग इकाई नहीं माना था। पीड़ित परिवार ने बाद में इस निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की।

इस अपील को स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा कि विकास के एक निश्चित चरण से परे जाने पर भ्रूण एक स्वतंत्र जीवन का दर्जा प्राप्त कर लेता है और उस भ्रूण के नुकसान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अजन्मे बच्चे की मृत्यु को मुआवजे के उद्देश्य से एक बच्चे की मृत्यु के समान माना जाना आवश्यक है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि रेलवे अधिनियम के तहत अधिकारी दुर्घटनाओं के पीड़ितों को मुआवजा देने के उत्तरदायी हैं और इस तरह का उत्तरदायित्व दुर्घटना में एक अजन्मे बच्चे की मृत्यु सहित सभी जनहानि पर लागू होता है।

अदालत ने भ्रूण की मृत्यु के लिए अधिकरण को अलग से मुआवजा देने का निर्देश दिया।

भाषा सं राजेंद्र सुरभि

सुरभि

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