ईरान पर हमले के बाद ट्रंप ने सत्ता परिवर्तन की बात की, लेकिन यह बहुत मुश्किल हो सकता है

ईरान पर हमले के बाद ट्रंप ने सत्ता परिवर्तन की बात की, लेकिन यह बहुत मुश्किल हो सकता है

ईरान पर हमले के बाद ट्रंप ने सत्ता परिवर्तन की बात की, लेकिन यह बहुत मुश्किल हो सकता है
Modified Date: March 1, 2026 / 07:44 pm IST
Published Date: March 1, 2026 7:44 pm IST

मिनियापोलिस, एक मार्च (एपी) ईरान पर अमेरिका और इजराइल के पहले मिसाइल हमले के ठीक एक घंटे बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया कि वह सत्ता परिवर्तन की उम्मीद करते हैं।

ट्रंप ने एक वीडियो में ईरानी जनता से कहा, ‘‘अब अपने भाग्य की बागडोर अपने हाथों में लेने का समय है। यही कार्रवाई का समय है। इसे यूं ही नहीं गंवाएं।’’

यह जटिल नहीं लगता। आखिरकार, ईरान की मूल रूप से अलोकप्रिय सरकार भीषण हवाई हमलों से कमजोर हो चुकी है, उसके कुछ शीर्ष नेता मारे गए हैं या लापता हैं और वाशिंगटन समर्थन का संकेत दे रहा है, ऐसे में एक दमनकारी शासन को उखाड़ फेंकना कितना मुश्किल हो सकता है?

संभवतः यह बहुत कठिन है। इतिहास तो यही कहता है। सत्ता परिवर्तन के मामले में वाशिंगटन का लंबा और जटिल इतिहास रहा है। 1960 और 70 के दशक में वियतनाम युद्ध हुआ, 1989 में पनामा में। 1980 के दशक में निकारागुआ, 9/11 के हमने के बाद के वर्षों में इराक और अफगानिस्तान और कुछ ही सप्ताह पहले वेनेजुएला में भी ऐसा ही हुआ।

ईरान का भी एक उदाहरण है। 1953 में, सीआईए ने एक तख्तापलट की साजिश रचने में मदद की, जिसने ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेता को सत्ता से हटा दिया और शाह मोहम्मद रजा पहलवी को लगभग पूर्ण सत्ता सौंप दी। लेकिन शाह की तरह, जिन्हें दशकों के लगातार अलोकप्रिय शासन के बाद 1979 की ईरान की इस्लामी क्रांति में उखाड़ फेंका गया था, सत्ता परिवर्तन शायद ही कभी योजना के अनुसार होता है।

अमेरिका के अनुकूल सरकारें स्थापित करने के प्रयास अक्सर स्पष्ट इरादों से शुरू होते हैं, चाहे वह इराक में लोकतंत्र का समर्थन करना हो या शीतयुद्ध के चरम पर कांगो में किसी साम्यवाद-विरोधी नेता का साथ देना हो। लेकिन अक्सर ये इरादे राजनीति में फंस जाते हैं, जहां लोकतांत्रिक सपने गृहयुद्ध में बदल जाते हैं।

ट्रंप ने 2016 में कहा था, ‘हमें राष्ट्र निर्माण और सत्ता परिवर्तन की विफल नीति को त्याग देना चाहिए।’

उन्होंने 2025 में सऊदी अरब में दिए गए एक भाषण में अफगानिस्तान और इराक में अमेरिकी प्रयासों की आलोचना करते हुए कहा था, ‘‘अंततः, तथाकथित राष्ट्र-निर्माताओं ने जितने राष्ट्रों का निर्माण किया, उससे कहीं अधिक राष्ट्रों को उन्होंने नष्ट कर दिया। हस्तक्षेप करने वाले उन जटिल समाजों में हस्तक्षेप कर रहे थे जिन्हें वे समझते भी नहीं थे।’’

अब, शनिवार की घटनाओं के बाद, एक अहम सवाल उठता है: क्या आज की अमेरिका सरकार समझ पा रही है कि वह किस मुसीबत में फंसने जा रही है? यह स्पष्ट नहीं है कि सत्ता परिवर्तन का असल मतलब क्या होगा।

एपी अमित नेत्रपाल

नेत्रपाल


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