2030 तक दुनिया की तीन प्रतिशत बिजली का इस्तेमाल कर सकता है एआई, अत्यधिक पानी की खपत हो सकती है
2030 तक दुनिया की तीन प्रतिशत बिजली का इस्तेमाल कर सकता है एआई, अत्यधिक पानी की खपत हो सकती है
( अमांदा टर्नबुल-मैक्री, यूनिवर्सिटी ऑफ वाइकातो )
हैमिल्टन (न्यूजीलैंड), पांच जून (द कन्वरसेशन) कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते उपयोग से ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाले दबाव को लेकर संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की एक नई रिपोर्ट ने गंभीर चेतावनी जारी की गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक एआई से जुड़ी प्रणालियां दुनिया की कुल बिजली खपत का लगभग तीन प्रतिशत हिस्सा उपयोग कर सकती हैं, जबकि डेटा केंद्रों की शीतलन जरूरतों के लिए इस्तेमाल होने वाला पानी वैश्विक आबादी की वार्षिक पेयजल आवश्यकता से भी अधिक हो सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि एआई की बढ़ती क्षमता और लोकप्रियता के साथ उसके पर्यावरणीय प्रभाव भी तेजी से बढ़ रहे हैं। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि एआई मॉडल समय के साथ अधिक दक्ष और कम ऊर्जा खपत वाले हो जाएंगे, जिससे उनकी पर्यावरणीय लागत घटेगी। हालांकि, रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यह धारणा भ्रामक हो सकती है।
रिपोर्ट में ‘जेवॉन्स पैराडॉक्स’ का उल्लेख किया गया है, जिसके अनुसार किसी तकनीक की दक्षता बढ़ने पर संसाधनों की कुल खपत कम होने के बजाय बढ़ सकती है। यह सिद्धांत 19वीं सदी के अर्थशास्त्री विलियम स्टेनली जेवॉन्स के अवलोकन पर आधारित है, जिन्होंने पाया था कि कोयले के उपयोग की दक्षता बढ़ने के बावजूद उसकी कुल मांग और खपत में वृद्धि हुई थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसे-जैसे एआई मॉडल अधिक सस्ते और सुलभ होंगे, उनके उपयोग के नए क्षेत्र विकसित होंगे और कुल मांग बढ़ेगी, जिससे दक्षता से होने वाली बचत का लाभ समाप्त हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष ही दुनिया भर के डेटा केंद्रों ने उतनी बिजली की खपत की थी जितनी सऊदी अरब करता है। सऊदी अरब विश्व का 11वां सबसे बड़ा बिजली उपभोक्ता देश है। यदि 2030 तक बिजली की मांग अनुमान के अनुरूप दोगुनी होती है, तो उसके कार्बन प्रभाव की भरपाई के लिए 10 वर्षों तक 6.7 अरब पेड़ उगाने की आवश्यकता पड़ेगी।
अध्ययन में कहा गया है कि डेटा केंद्रों को 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी तथा विशाल भू-क्षेत्र की जरूरत होगी, जिसका आकार मेक्सिको सिटी के क्षेत्रफल से लगभग 10 गुना अधिक हो सकता है।
रिपोर्ट ने एआई उद्योग में मौजूद असमानताओं को भी रेखांकित किया है। इसके अनुसार, केवल 32 देशों में एआई-विशिष्ट क्लाउड अवसंरचना मौजूद है और उसकी 90 प्रतिशत क्षमता अमेरिका और चीन में केंद्रित है। इससे उन देशों और क्षेत्रों के बीच डिजिटल खाई और चौड़ी हो सकती है जो एआई प्रणालियों का विकास और नियंत्रण करते हैं तथा जो केवल उनका उपयोग करते हैं।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एआई से जुड़ा पर्यावरणीय बोझ भी समान रूप से वितरित नहीं है। खनिजों के दोहन और इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) का प्रभाव अक्सर उन देशों पर अधिक पड़ता है जो एआई तकनीक के प्रमुख उत्पादक नहीं हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि एआई के पर्यावरणीय प्रभाव को निर्धारित करने वाले दो प्रमुख कारक हैं—उसका उपयोग कितना किया जाता है और किस प्रकार किया जाता है। टेक्स्ट, कोड, चित्र और वीडियो तैयार करने जैसे विभिन्न कार्यों के लिए अलग-अलग स्तर की कंप्यूटिंग क्षमता और ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
रिपोर्ट में एआई के लिए संपूर्ण मूल्य श्रृंखला आधारित नियमन की वकालत की गई है, जिसमें खनिजों के स्रोत से लेकर पुनर्चक्रण और सुरक्षित निपटान तक सभी चरण शामिल हों। इसमें एआई विकास के दौरान पर्यावरणीय प्रभावों के खुलासे को अनिवार्य बनाने तथा जलवायु और ऊर्जा योजनाओं में एआई की संभावित मांग को शामिल करने की सिफारिश की गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कई देश सरकारी और सार्वजनिक सेवाओं में एआई को तेजी से अपना रहे हैं। न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने एआई रणनीतियां और ढांचे तैयार किए हैं, लेकिन इनमें ऊर्जा उपयोग और उत्सर्जन संबंधी अनिवार्य खुलासों की व्यवस्था नहीं है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि एआई के लिए ‘हल्के नियमन’ और केवल सिद्धांत-आधारित दृष्टिकोण से उसके बढ़ते पर्यावरणीय प्रभावों की अनदेखी हो सकती है। उनका कहना है कि प्राकृतिक पर्यावरण अर्थव्यवस्था, संस्कृति और मानव कल्याण की आधारशिला है और तकनीकी नवाचार की नीतियों में स्थिरता को केंद्र में रखा जाना चाहिए।
रिपोर्ट में आह्वान किया गया है कि एआई विकास की दिशा को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकी भविष्य की ओर मोड़ा जाए।
द कन्वरसेशन मनीषा वैभव
वैभव

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