भूख लगने पर भोजन का स्वाद खाने से पहले ही ‘महसूस’ करने लगता है दिमाग: अध्ययन

भूख लगने पर भोजन का स्वाद खाने से पहले ही ‘महसूस’ करने लगता है दिमाग: अध्ययन

भूख लगने पर भोजन का स्वाद खाने से पहले ही ‘महसूस’ करने लगता है दिमाग: अध्ययन
Modified Date: June 22, 2026 / 10:51 am IST
Published Date: June 22, 2026 10:51 am IST

( मैगी हैमेस एवं मेई पेंग – यूनिवर्सिटी ऑफ ओटागो )

डुनेडिन (न्यूजीलैंड), 22 जून (द कन्वरसेशन) अगर आपको रात के खाने में कुछ खास खाने की इच्छा हो रही है तो संभव है कि आपका दिमाग उसे खाने से पहले ही उसके स्वाद को महसूस करने लगे। एक नए अध्ययन में यह दावा किया गया है कि भूख की स्थिति में मस्तिष्क भोजन के स्वाद, गंध और उसे खाने के अनुभव की मानसिक कल्पना को अधिक सजीव रूप से महसूस करने लगता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, अधिकतर लोग यह अनुभव कर चुके हैं कि खाली पेट बाजार जाने पर वे जरूरत से ज्यादा मीठे, तैलीय या पसंदीदा खाद्य पदार्थ खरीद लेते हैं। आमतौर पर इसे भूख का असर माना जाता है, लेकिन नया अध्ययन बताता है कि भूख केवल खाने की इच्छा नहीं बढ़ाती, बल्कि भोजन से जुड़ी मानसिक छवियों और संवेदनाओं को भी अधिक प्रभावशाली बना देती है।

अध्ययन में कहा गया कि मानव मस्तिष्क के लिए भोजन हमेशा से एक बहु-संवेदी अनुभव रहा है। यह अनुभव किसी पेस्ट्री को देखने, भोजन की सुगंध महसूस करने या उसके स्वाद और बनावट को याद करने से शुरू हो सकता है। भोजन से जुड़े अनुभव मस्तिष्क में स्मृतियों के रूप में दर्ज हो जाते हैं और बाद में मानसिक कल्पना के माध्यम से दोबारा महसूस किए जा सकते हैं।

शोधकर्ताओं की मानें तो लोग अपने मन में नींबू के खट्टे स्वाद, ताजा बनी कॉफी की सुगंध या किसी पसंदीदा व्यंजन की बनावट तक की कल्पना कर सकते हैं। वैसे, यह क्षमता सभी लोगों में समान नहीं होती। कुछ लोग स्वाद और गंध से जुड़ी अनुभूतियों को अत्यंत स्पष्ट रूप से याद कर सकते हैं, जबकि कुछ लोगों को केवल धुंधली अनुभूति होती है।

अध्ययन के तहत डुनेडिन स्थित ओटागो विश्वविद्यालय में 60 प्रतिभागियों पर प्रयोग किया गया। सभी प्रतिभागियों ने पिछली रात उपवास रखा था। उन्हें दो अलग-अलग सत्रों में शामिल किया गया। एक सत्र में उन्हें भूखा रखा गया, जबकि दूसरे सत्र में उन्हें भरपेट नाश्ता कराया गया।

प्रतिभागियों को विभिन्न खाद्य पदार्थों की तस्वीरें दिखाई गईं और उनसे उन खाद्य पदार्थों के स्वाद या बनावट की कल्पना करने के लिए कहा गया। इसके बाद उन्होंने बताया कि ऐसी कल्पना करना कितना आसान था, वह कितनी जल्दी मन में आई और वह कितनी स्पष्ट महसूस हुई।

अध्ययन में पाया गया कि भूखे प्रतिभागियों के लिए भोजन के स्वाद की कल्पना करना अपेक्षाकृत आसान था। वे स्वयं को वह भोजन खाते हुए अधिक स्पष्ट रूप से देख पा रहे थे और उस अनुभव को अधिक आनंददायक भी बता रहे थे। शोधकर्ताओं के अनुसार, इससे संकेत मिलता है कि भूख दिमाग में भोजन से जुड़े पूरे अनुभव के अनुकरण को अधिक तीव्र बना देती है।

शोधकर्ताओं ने कहा कि यही कारण हो सकता है कि भोजन की लालसा कई बार इतनी प्रबल महसूस होती है। भूख की स्थिति में दिमाग केवल भोजन के बारे में नहीं सोचता, बल्कि उससे जुड़ी गंध, स्वाद और संभावित आनंद का भी मानसिक अनुभव करने लगता है।

अध्ययन में यह भी कहा गया कि यह निष्कर्ष उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जो सख्त डाइट या भोजन संबंधी नियंत्रण का पालन करने का प्रयास करते हैं। जैसे-जैसे भूख बढ़ती है, पसंदीदा खाद्य पदार्थों से जुड़े विचार अधिक स्पष्ट, आकर्षक और संतोषदायक महसूस हो सकते हैं, जिससे केवल इच्छाशक्ति के बल पर उनका विरोध करना कठिन हो जाता है।

अध्ययन का एक अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि प्रतिभागियों के लिए भोजन की बनावट की कल्पना करना उसके स्वाद की तुलना में अधिक आसान था। दिलचस्प बात यह है कि यह क्षमता भूख की स्थिति से विशेष रूप से प्रभावित नहीं हुई।

शोधकर्ताओं ने कहा कि स्वाद और गंध से जुड़ी मानसिक कल्पना को आमतौर पर दृश्य, श्रवण या स्पर्श संबंधी कल्पना की तुलना में अधिक कठिन माना जाता है। इसके बावजूद अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि भोजन से संबंधित निर्णयों और इच्छाओं में स्वाद तथा गंध की मानसिक कल्पना महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने यह जानने का प्रयास किया कि क्या किसी खाद्य पदार्थ की बार-बार कल्पना करने से उसका आकर्षण बढ़ सकता है। इस उद्देश्य से किए गए अध्ययन में प्रतिभागियों को किसी भोजन के स्वाद या बनावट की बार-बार कल्पना करने के लिए कहा गया।

परिणामों में पाया गया कि बार-बार कल्पना करने पर उस भोजन की मानसिक छवि धीरे-धीरे कम आकर्षक लगने लगी। हालांकि, जब प्रतिभागियों ने वास्तव में वह भोजन खाया तो उनके आनंद के स्तर में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आई।

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह निष्कर्ष मानसिक कल्पना की शक्ति और उसकी सीमाओं दोनों को दर्शाता है। मानसिक रूप से किसी भोजन की कल्पना करना उसके प्रति हमारी धारणा को प्रभावित कर सकता है, लेकिन वह वास्तविक भोजन अनुभव का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकता।

अध्ययन में कहा गया कि आज लोग बाजार में मिलने वाले उत्पादों, खाद्य पैकेजिंग, विज्ञापनों और सोशल मीडिया सामग्री के माध्यम से लगातार भोजन संबंधी संकेतों के संपर्क में रहते हैं। ऐसे संकेत न केवल लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं, बल्कि उनकी मानसिक कल्पनाओं को भी प्रभावित कर सकते हैं।

शोधकर्ताओं का मानना है कि भूख और मानसिक कल्पना के बीच संबंध को बेहतर ढंग से समझने से यह जानने में मदद मिल सकती है कि लोग भोजन संबंधी निर्णय कैसे लेते हैं और उनकी पसंदों को कौन-कौन से कारक प्रभावित करते हैं। इससे ऐसे वातावरण में स्वस्थ विकल्प चुनने की रणनीतियां विकसित करने में भी सहायता मिल सकती है, जहां भोजन का आकर्षण अक्सर केवल एक नजर, एक सुगंध या एक विचार की दूरी पर होता है।

द कन्वरसेशन मनीषा वैभव

वैभव


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