सिडनी, 22 अगस्त (द कन्वरसेशन) चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रम जल्द ही हाल के वर्षों के सबसे अभिनव चंद्र अन्वेषण अभियानों में से एक शुरू करने जा रहा है। इस मिशन का उद्देश्य उन स्थानों का अध्ययन करना है, जहां सूर्य की रोशनी कभी नहीं पहुंचती और जहां चंद्रमा पर मौजूद जल-बर्फ के बारे में अब भी कई अहम सवालों के जवाब नहीं मिले हैं।
करीब दो दशक से हम सब इस बात से अवगत हैं कि चंद्रमा पर किसी न किसी रूप में पानी मौजूद है। हालांकि, अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि हमेशा छाया में रहने वाले विभिन्न ‘क्रेटर’ (गर्त) में कितनी मात्रा में ऐसी जल-बर्फ है जिसे हासिल किया जा सकता है, वह सतह से कितनी गहराई पर मौजूद है और उसका स्वरूप कैसा है।
इस बर्फ तक पहुंचना आसान नहीं होगा। यह चंद्रमा के गहरे और दुर्गम क्रेटर की तलहटी में मौजूद है, जहां सूर्य की रोशनी कभी नहीं पहुंचती। अरबों वर्षों से यह बर्फ बाहरी हस्तक्षेप के बिना शून्य से नीचे 200 डिग्री सेल्सियस तापमान में जमी हुई है।
ये क्षेत्र चंद्रमा के सबसे मूल्यवान स्थानों में हैं, लेकिन इन तक पहुंचना और इनका अध्ययन करना सबसे कठिन भी है।
जनवरी 1959 में सोवियत संघ के लूना-1 यान के चंद्रमा के आसपास पहुंचने के बाद से चंद्र अन्वेषण ने लंबा सफर तय किया है। अपोलो मिशन और उसके बाद के अभियानों ने स्पष्ट कर दिया कि चुनौती अब सिर्फ चंद्रमा तक पहुंचने की नहीं है। असली चुनौती उन स्थानों का अन्वेषण करना है, जहां इंसानों और पारंपरिक रोवर्स के लिए पहुंचना बेहद मुश्किल है।
इसके साथ ही यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि क्या भविष्य में चंद्रमा अपने आप ही कुछ संसाधन उपलब्ध करा सकता है, जिनकी वहां काम करने वाले अनुसंधानकर्ताओं को आवश्यकता होगी।
चीन ने पिछले दो दशकों में चंद्रमा के अन्वेषण के लिए लगातार अधिक महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रम विकसित किया है। इसका नाम प्राचीन चीनी चंद्र देवी चांग’ई के नाम पर रखा गया है। चांग’ई-7 मिशन के इस महीने के अंत तक चंद्रमा की ओर रवाना होने की उम्मीद है, हालांकि चीन के एक अलग रॉकेट से जुड़ी हालिया विफलता के कारण प्रक्षेपण की तारीख को लेकर कुछ अनिश्चितता बनी हुई है।
चांग’ई-7 क्या हासिल करेगा?
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चांग’ई-7 चंद्रमा के अन्वेषण के लिए कई नई तकनीकों और तरीकों का परीक्षण करेगा। इसमें एक ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर और हॉपर शामिल होंगे।
इसके अलावा, च्वेछियाओ-2 चंद्र रिले उपग्रह पहले ही अपनी जगह पर पहुंच चुका है। इसे मार्च 2024 में अलग से प्रक्षेपित किया गया था। इसके बाद इसने चांग’ई-6 मिशन को सहयोग दिया और चांग’ई-7 के दौरान पृथ्वी तथा चंद्रमा की सतह के बीच संचार बनाए रखने में मदद करेगा।
मिशन वास्तव में कहां उतरेगा, यह अभी पूरी तरह तय नहीं है। हालांकि, इसके चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय ऐटकेन क्षेत्र में शैकलटन क्रेटर के पास या उससे लगे किसी ऐसे ऊंचे स्थान पर उतरने की संभावना है, जहां सूर्य की रोशनी पहुंचती हो।
मिशन का सबसे दिलचस्प हिस्सा हॉपर होगा। पहियों वाले रोवर के विपरीत, हॉपर को ऊबड़-खाबड़ भूभाग के ऊपर छलांग लगाकर आगे बढ़ने और ऐसे क्रेटरों में उतरने के लिए तैयार किया गया है, जहां सूर्य की रोशनी कभी नहीं पहुंचती। पारंपरिक वाहन संभवतः ऐसे स्थानों में प्रवेश ही नहीं कर पाएंगे।
हॉपर को शामिल करने का कारण इन क्षेत्रों की कठिन परिस्थितियां हैं। यहां क्रेटरों की खड़ी दीवारें, ऊबड़-खाबड़ भूभाग और स्थायी अंधेरा है। इसके अलावा, इसको स्वायत्त रूप से दिशा तय करने और संचार बनाए रखने में भी सक्षम होना होगा।
चीनी वैज्ञानिक केवल पानी के संकेतों की तलाश नहीं करेंगे। चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों में पानी मौजूद होने के पुख्ता प्रमाण पहले से हैं। असली सवाल यह है कि वह पानी वास्तव में कहां मौजूद है, किस रूप में है, उसकी सांद्रता कितनी है और क्या उसे वहां से हासिल करना व्यावहारिक रूप से संभव है।
इस तरह चांग’ई-7 केवल चंद्रमा की खोज करने से आगे बढ़कर यह समझने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा कि उसके संसाधनों का वास्तविक उपयोग किया जा सकता है या नहीं।
नासा अपना रहा है अलग रास्ता
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दूसरे देश भी इसी सवाल का जवाब तलाश रहे हैं। अमेरिका भी लंबे समय में चंद्रमा पर लगातार और स्थायी गतिविधियां संभव बनाने के लक्ष्य पर काम कर रहा है। हालांकि नासा को भी वही भौतिक चुनौतियों का सामना करना होगा, लेकिन उन्हें हल करने के लिए उसने अलग तरीका अपनाया है।
चांग’ई-7 एक समन्वित सरकारी मिशन है, जिसके सभी हिस्सों को एक ही विशिष्ट लक्ष्य को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यह पहले से सक्रिय च्वेछियाओ-2 बुनियादी ढांचे का भी इस्तेमाल कर सकता है।
इसके विपरीत, नासा अपने कमर्शियल लूनर पेलोड सर्विसेज (सीएलपीएस) कार्यक्रम के जरिए चंद्रमा पर एक तरह का व्यावसायिक तंत्र विकसित कर रहा है। इसके तहत नासा उन कंपनियों से चंद्रमा तक उपकरण पहुंचाने, वहां उनकी आवाजाही और दूसरी तकनीकी सेवाओं की खरीद करता है, जो अपने अंतरिक्ष यानों की मालिक हैं और उनका संचालन भी खुद करती हैं।
फिलहाल नासा ने 17 मिशनों के लिए अनुबंध किए हैं, जिनके तहत 60 से अधिक वैज्ञानिक उपकरण चंद्रमा तक पहुंचाए जाने हैं।
मूल बात यह है कि गंतव्य ही चुनौतियां तय करता है, लेकिन अलग-अलग अंतरिक्ष कार्यक्रम उन चुनौतियों से निपटने के लिए अलग-अलग तरीके अपना रहे हैं।
चंद्रमा पर रहना सीखना
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चंद्रमा के संसाधनों का पता लगाना केवल पहला कदम है। चांग’ई-7 यह पता लगाने की कोशिश करेगा कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के आसपास उपयोगी संसाधन कहां मौजूद हैं और उनकी प्रकृति क्या है।
इसके बाद संभावित रूप से 2028 में प्रक्षेपित होने वाला चांग’ई-8 यह प्रदर्शित करने की दिशा में आगे बढ़ेगा कि इन संसाधनों का वास्तव में किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसके बाद मानवयुक्त अन्वेषण की बारी आने की संभावना है। इसका अंतिम लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय चंद्र अनुसंधान केंद्र का निर्माण होगा, जिसका नेतृत्व संयुक्त रूप से चीन राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन और रूस की रोसकॉसमॉस अंतरिक्ष एजेंसी करेंगी।
प्रशांत महासागर के दूसरी ओर, सीएलपीएस के जरिए विकसित तकनीक और हासिल किया गया वैज्ञानिक अनुभव नासा के नेतृत्व वाले व्यापक आर्टेमिस कार्यक्रम में काम आएगा।
नासा खुद आर्टेमिस कार्यक्रम को चंद्रमा के निरंतर अन्वेषण की नींव तैयार करने वाला प्रयास बताता है। इस तरह, चीन और अमेरिका भले ही अलग-अलग रास्ते अपना रहे हों, लेकिन दोनों के सामने मूल चुनौती एक ही है—चंद्रमा के सबसे कठिन और अंधेरे हिस्सों तक पहुंचना, वहां मौजूद संसाधनों को समझना और यह पता लगाना कि भविष्य में इंसान वहां कितनी दूर तक रह और काम कर सकते हैं।
द कन्वरसेशन रंजन संतोष
संतोष