तिल के दाने जितने छोटे दिमाग के बावजूद भंवरे कर सकते हैं लय की पहचान

तिल के दाने जितने छोटे दिमाग के बावजूद भंवरे कर सकते हैं लय की पहचान

तिल के दाने जितने छोटे दिमाग के बावजूद भंवरे कर सकते हैं लय की पहचान
Modified Date: April 3, 2026 / 11:42 am IST
Published Date: April 3, 2026 11:42 am IST

(एंड्रयू बैरों, मैक्वायर यूनिवर्सिटी)

सिडनी, तीन अप्रैल (द कन्वरसेशन) इंसानों की तरह अब भंवरों (बम्बलबी) में भी लय (रिदम) को पहचानने और सीखने की क्षमता पाई गई है, जबकि उनका दिमाग तिल के दाने जितना छोटा होता है।

‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है।

अब तक माना जाता था कि लय को समझने और पहचानने की क्षमता केवल बड़े और जटिल दिमाग वाले जीवों, जैसे इंसानों या कुछ पक्षियों और स्तनधारियों तक सीमित है। लेकिन इस अध्ययन से पता चलता है कि छोटे दिमाग वाले जीव भी इस जटिल कौशल को सीख सकते हैं।

प्रकृति में लय हर जगह मौजूद है-पक्षियों और मेंढकों की आवाज़ों से लेकर जुगनुओं की चमक और मधुमक्खियों के नृत्य तक। हालांकि पहले यह समझा जाता था कि ये सभी व्यवहार जन्मजात होते हैं और इनमें सीखने की भूमिका नहीं होती।

इस धारणा को परखने के लिए शोधकर्ताओं ने भंवरों पर प्रयोग किए। उन्हें कृत्रिम फूलों के जरिए प्रशिक्षित किया गया, जिनमें एलईडी लाइट्स लगी थीं। अलग-अलग लाइट पैटर्न में से एक पैटर्न पर मीठा घोल (इनाम) दिया जाता था, जबकि दूसरे पर नहीं। भंवरों को इन पैटर्न के बीच अंतर केवल उनकी लय के आधार पर समझना था।

प्रशिक्षण के बाद पाया गया कि भंवरे उसी लय वाले पैटर्न को चुनते हैं, जिससे उन्हें पहले इनाम मिला था। खास बात यह रही कि वे उसी लय को तेज या धीमी गति में भी पहचान सके। इससे साबित हुआ कि वे केवल पैटर्न नहीं, बल्कि लय की संरचना सीख रहे थे।

एक अन्य प्रयोग में भंवरों को कंपन (वाइब्रेशन) के जरिए लय सिखाई गई। उन्हें एक भूलभुलैया में प्रशिक्षित किया गया, जहां अलग-अलग लय यह संकेत देती थी कि इनाम किस दिशा में मिलेगा। बाद में जब कंपन की जगह रोशनी का इस्तेमाल किया गया, तब भी भंवरे सही दिशा चुनने में सफल रहे।

इससे स्पष्ट हुआ कि भंवरे लय को अलग-अलग माध्यमों—कंपन या रोशनी—में पहचान सकते हैं। यानी वे अमूर्त (एब्स्ट्रैक्ट) लय को समझने में सक्षम हैं, जो अब तक केवल इंसानों में ही देखी गई थी।

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह खोज हमारी इस सोच को बदलती है कि लय सीखने के लिए बड़े दिमाग की जरूरत होती है। संभव है कि छोटे दिमाग भी सरल तरीकों से इस जटिल प्रक्रिया को अंजाम दे सकते हैं।

यह अध्ययन इस ओर भी संकेत देता है कि दिमाग स्वयं लयबद्ध गतिविधियों से भरा होता है, जहां न्यूरॉन्स के संकेत एक ताल में चलते हैं। यही विशेषता जीवों को प्राकृतिक लय को पहचानने में मदद कर सकती है।

शोध के निष्कर्ष भविष्य में तकनीकी विकास के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं। यदि इस क्षमता को छोटे सेंसरों में विकसित किया जाए, तो इसका इस्तेमाल आवाज़ और संगीत पहचानने, हृदय की अनियमितताओं का पता लगाने या मिर्गी से पहले की मस्तिष्क गतिविधियों की पहचान जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है।

(द कन्वरसेशन ) मनीषा शोभना

शोभना


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