अफ्रीका से बाहर भी फैल सकता है इबोला, स्वास्थ्य अधिकारी क्या कदम उठा रहे

अफ्रीका से बाहर भी फैल सकता है इबोला, स्वास्थ्य अधिकारी क्या कदम उठा रहे

अफ्रीका से बाहर भी फैल सकता है इबोला, स्वास्थ्य अधिकारी क्या कदम उठा रहे
Modified Date: June 4, 2026 / 11:36 am IST
Published Date: June 4, 2026 11:36 am IST

(अबरार अहमद चुगताई, होली सील और एमडी सैफुल इस्लाम, यूएनएसडब्ल्यू सिडनी)

सिडनी, चार जून (कन्वरसेशन) इबोला के हालिया प्रकोप थमने के कोई संकेत नजर नहीं आ रहे हैं।

कांगो में 24 अप्रैल को इबोला के दुर्लभ ‘बुंडीबुग्यो’ स्वरूप (स्ट्रेन) का पहला संदिग्ध मामला सामने आया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 17 मई को इस प्रकोप को ‘‘अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’’ घोषित कर दिया।

केवल कांगो में ही 27 मई तक 906 संदिग्ध मामले और 223 मौते दर्ज होने के साथ ही इबोला प्रकोप दुनिया के इतिहास का तीसरा सबसे बड़ा प्रकोप बन चुका है।

आशंका है कि यह दूसरे महाद्वीपों तक भी पहुंच चुका है। स्वास्थ्य अधिकारी अब इटली में एक संदिग्ध मामले और ब्राजील में दो संभावित मामलों की जांच कर रहे हैं। माना जा रहा है कि ये तीनों लोग कांगो या युगांडा से लौटे यात्री हैं। वहीं, इबोला से संक्रमित पाए गए एक अमेरिकी नागरिक का इलाज फिलहाल जर्मनी में किया जा रहा है है।

बढ़ती चिंताओं के बीच, ‘कोएलिशन फॉर एपिडेमिक प्रिपेयर्डनेस इनोवेशन्स’ ने ‘बुंडीबुग्यो’ स्वरूप के खिलाफ संभावित तीन टीके बनाने के काम में तेजी लाने के लिए 8.6 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर से अधिक की धनराशि देने की घोषणा की है।

लेकिन तब तक सवाल यह है कि क्या यह प्रकोप और फैल सकता है? और इसे लेकर चिंता कितनी होनी चाहिए?

जानलेवा वायरस

इबोला एक दुर्लभ लेकिन संभावित रूप से घातक वायरस है, जो मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के शरीर से निकलने वाले रक्त, मल और उल्टी जैसे तरल पदार्थों से फैलता है।

इबोला के शुरुआती लक्षणों में गले में खराश, सिरदर्द, बुखार, थकान और शरीर में दर्द शामिल हैं। गंभीर मामलों में त्वचा पर चकत्ते, सांस लेने में तकलीफ, उल्टी, दस्त, पेट दर्द और दौरे पड़ सकते हैं।

इंसानों में इबोला की पहचान पहली बार 1976 में हुई थी। तब से दुनिया भर में इसके 40 से अधिक प्रकोप दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें से अधिकांश अफ्रीकी देशों में हुए।

मौजूदा प्रकोप दुर्लभ बुंडीबुग्यो स्वरूप से जुड़ा तीसरा प्रकोप है। अतीत के ज्यादातर प्रकोप अधिक घातक ‘‘ज़ैरे’’ स्वरूप के कारण हुए थे, जिसमें मृत्यु दर 90 प्रतिशत तक है जबकि बुंडीबुग्यो स्वरूप में यह आंकड़ा 34 प्रतिशत तक है।

इस ताजा प्रकोप क्यों फैल रहा?

इस प्रकोप के फैलने के कई कारक वही हैं, जिन्होंने 2014-16 के पश्चिम अफ्रीकी इबोला प्रकोप को भी भयावह बना दिया था। उस प्रकोप में 11,000 से अधिक लोगों की मौत हुई थी।

दोनों ही मामलों में वायरस कई महीनों तक फैलता रहा, उसके बाद जाकर प्रकोप की आधिकारिक घोषणा हुई। शुरुआती मरीजों में भी ऐसे लक्षण दिखाई दिए थे जो किसी एक बीमारी की स्पष्ट पहचान नहीं कराते थे।

दोनों प्रकोप तेजी से शहरी क्षेत्रों में फैले। स्वास्थ्य संस्थानों के भीतर संक्रमण का प्रसार भी दोनों मामलों में एक समान कारक रहा।

राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक अशांति भी दोनों प्रकोपों के प्रसार में अहम रही। हाल में कांगो में भीड़ ने अस्पतालों के अस्थायी तंबुओं में आग लगा दी, जिसके बाद कुछ मरीज पृथकवास वार्डों से भाग गए।

इसके अलावा कुछ सांस्कृतिक परंपराएं, विशेष रूप से अंतिम संस्कार की वे रस्में जिनमें मृत शरीर को छूना शामिल होता है, संक्रमण के प्रसार को तेज करने का कारण हो सकते हैं।

यह दूसरे महाद्वीपों तक कैसे पहुंचा?

पश्चिम अफ्रीका के प्रकोप की तरह यह नया इबोला प्रकोप भी पर्यटकों के जरिए दूसरे महाद्वीपों तक पहुंचा है।

कांगो की सीमा से लगे युगांडा में अब तक नौ मामलों और एक मौत की पुष्टि हो चुकी है।

कांगो में संक्रमित पाए गए एक अमेरिकी नागरिक का जर्मनी में उपचार किया जा रहा है और उसकी हालत स्थिर बताई गई है।

इटली में अधिकारी हाल में कांगो से लौटे एक यात्री की निगरानी कर रहे हैं, जो काग्लियारी शहर पहुंचा था।

कुछ खबरों के अनुसार, ब्राजील के अधिकारी दो संदिग्ध इबोला मामलों की जांच कर रहे हैं। इनमें एक यात्री कांगो से साओ पाउलो लौटा था, जबकि दूसरा युगांडा से रियो डी जेनेरो पहुंचा था।

हालांकि महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों संदिग्ध मरीजों में अन्य बीमारियों की पुष्टि हुई है। साओ पाउलो के मरीज को बुखार था और बाद में उसमें गंभीर मेनिन्जाइटिस का पता चला। वहीं रियो डी जेनेरो के मरीज में खांसी, ठंड लगना और दस्त के बाद मलेरिया की पुष्टि हुई तथा बाद में इबोला जांच में संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई।

इसलिए फिलहाल ब्राजील में इबोला का कोई पुष्ट मामला सामने नहीं आया है। लेकिन इन संदिग्ध मामलों के बाद देश ने इबोला से निपटने के लिए अपने सुरक्षा प्रोटोकॉल सक्रिय कर दिए हैं, जिनमें मरीजों को पृथकवास में रखना, जांच और महामारी संबंधी जांच शामिल हैं।

कई देशों ने इबोला को अपनी सीमाओं तक पहुंचने से रोकने के लिए यात्रा संबंधी प्रतिबंध लागू किए हैं।

अमेरिका और कनाडा ने कांगो, युगांडा और दक्षिण सूडान से आने वाले यात्रियों के प्रवेश पर अस्थायी प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिका के अलावा भारत और मेक्सिको जैसे देश भी विशेष रूप से हवाई अड्डों पर स्वास्थ्य जांच और रोग निगरानी उपायों को मजबूत कर रहे हैं। कुछ देशों ने कांगो से लौटने वाले अपने नागरिकों के लिए 21 दिन का अनिवार्य पृथकवास भी लागू किया है।

क्या यह और फैल सकता है, ऑस्ट्रेलिया तक भी?

फिलहाल इबोला के ऑस्ट्रेलिया तक पहुंचने का जोखिम बहुत कम माना जा रहा है।

ऑस्ट्रेलिया ने प्रभावित देशों के लिए कोई यात्रा या पृथकवास संबंधी नियम लागू नहीं किए हैं, लेकिन स्वास्थ्य मंत्री मार्क बटलर का कहना है कि अधिकारी इस प्रकोप पर ‘‘बहुत करीबी नजर’’ बनाए हुए हैं।

पिछले अनुभवों के आधार पर मध्य अफ्रीका में फैले इस प्रकोप के आगे बढ़ने के तीन संभावित परिदृश्य हो सकते हैं।

यदि प्रभावी नियंत्रण उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले महीनों में मामलों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है। कुछ आकलनों के अनुसार, मई के मध्य तक कांगो में मामलों की संख्या 1,000 तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था, जबकि आधिकारिक आंकड़ा लगभग 900 मामलों का है। यानी वास्तविक संख्या अधिकारिक आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है।

दूसरे और अधिक सकारात्मक परिदृश्य में, यदि स्वास्थ्य तंत्र को और मजबूत किया गया, अंतरराष्ट्रीय समुदाय का सहयोग जारी रहा, टीकों का विकास तेजी से हुआ और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ी, तो इस प्रकोप को नियंत्रित किया जा सकता है।

हालांकि, फिलहाल यही माना जा रहा है कि मामलों की संख्या अभी कुछ समय तक बढ़ती रहेगी और उसके बाद अधिकारी इस प्रकोप पर सफलतापूर्वक काबू पा सकेंगे।

फिर भी एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस बार कहीं अधिक तेजी से प्रतिक्रिया दी है, विशेष रूप से 2014-16 के विनाशकारी पश्चिम अफ्रीकी प्रकोप की तुलना में। संभव है कि यही त्वरित प्रतिक्रिया दुनिया को उसी स्तर की तबाही और मानवीय नुकसान से बचा ले।

द कन्वरसेशन

खारी मनीषा

मनीषा


लेखक के बारे में