होर्मुज़ जलडमरूमध्य संकट के बीच मिलते चार अहम सबक : विश्लेषण

होर्मुज़ जलडमरूमध्य संकट के बीच मिलते चार अहम सबक : विश्लेषण

होर्मुज़ जलडमरूमध्य संकट के बीच मिलते चार अहम सबक : विश्लेषण
Modified Date: April 18, 2026 / 01:50 pm IST
Published Date: April 18, 2026 1:50 pm IST

( मीगन मैक्रे, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी )

कैनबरा, 18 अप्रैल (द कन्वरसेशन) एक विश्लेषण में दावा किया गया है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजराइल के युद्ध और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव के बीच प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गैलीपोली अभियान से मिले कई महत्वपूर्ण सबक सामने आते हैं।

विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि छोटे रणनीतिक कदम अक्सर बड़े और दीर्घकालिक सैन्य संघर्षों में बदल सकते हैं।

इसमें कहा गया है कि अमेरिका ने ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण की कोशिशों के जवाब में उसके बंदरगाहों की नाकेबंदी का फैसला कर लिया। वहीं, ईरान ने पहली बार इस अहम जलमार्ग पर अपनी संप्रभुता को मान्यता देने की मांग को युद्ध समाप्ति की शर्तों में शामिल किया।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है, जहां से वैश्विक व्यापार के बड़े हिस्से का परिचालन होता है।

विश्लेषण के अनुसार, ऐसे समुद्री ‘चोक प्वाइंट’ पर सैन्य कार्रवाई को अक्सर त्वरित और आसान समझ लिया जाता है, लेकिन इतिहास बताता है कि इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

इसी संदर्भ में 25 अप्रैल को गैलीपोली अभियान की वर्षगांठ का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि 1915 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने काला सागर तक पहुंच बनाने के लिए तुर्की के नियंत्रण वाले डार्डानेल्स जलडमरूमध्य पर कब्जा करने की कोशिश की थी। यह अभियान तत्कालीन ब्रिटिश नेतृत्व, विशेषकर विंस्टन चर्चिल की पहल पर शुरू हुआ था।

शुरुआत में इसे केवल नौसैनिक अभियान माना गया और यह आकलन किया गया कि इसे आसानी से अंजाम दिया जा सकता है। हालांकि, तुर्की की मजबूत रक्षा तैयारियों, तटीय तोपों और समुद्री बारूदी सुरंगों के कारण मित्र राष्ट्रों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। जब नौसैनिक अभियान विफल हुआ तो जमीनी सेना को उतारा गया, जिससे संघर्ष और लंबा तथा अधिक घातक हो गया।

विश्लेषण में कहा गया है कि गैलीपोली अभियान में मित्र राष्ट्रों और तुर्की, दोनों पक्षों के कुल मिलाकर लगभग 4.83 लाख सैनिक हताहत हुए और अंततः मित्र राष्ट्रों को पीछे हटना पड़ा।

इस ऐतिहासिक अनुभव से चार प्रमुख सबक मिलते हैं। पहला, जटिल रणनीतिक फैसलों में किसी एक प्रभावशाली व्यक्ति के प्रभाव में आने से बचना चाहिए और व्यापक विचार-विमर्श जरूरी है। दूसरा, विरोधी पक्ष को कमतर आंकना गंभीर भूल साबित हो सकता है। तीसरा, सीमित उद्देश्य वाले अभियान अक्सर “मिशन क्रीप” के कारण धीरे-धीरे बड़े युद्ध में बदल जाते हैं। चौथा, युद्ध की मानवीय और सामाजिक लागत बेहद भारी होती है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

विश्लेषण में कहा गया है कि आधुनिक समय में ड्रोन और मिसाइल जैसे सस्ते और प्रभावी हथियारों के प्रसार से समुद्री मार्गों पर नौसैनिक बल पहले से अधिक असुरक्षित हो गए हैं। इससे अपेक्षाकृत कमजोर देश या देश से इतर तत्व भी शक्तिशाली सैन्य बलों को चुनौती देने में सक्षम हो गए हैं।

इसके अलावा, ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति में व्यवधान जैसे व्यापक आर्थिक प्रभावों का आकलन अभी पूरी तरह नहीं किया जा सका है, जिसका असर विशेष रूप से विकासशील और कमजोर देशों पर पड़ सकता है।

विश्लेषण के अनुसार, मौजूदा ईरान संकट के भी जल्द सुलझने की संभावना नहीं नजर आती और केवल सैन्य उपायों से इसका समाधान संभव नहीं है।

इसमें कहा गया है कि 1915 के विपरीत आज ऑस्ट्रेलिया जैसे देश स्वत: किसी संघर्ष में शामिल होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय ले सकते हैं और उन्हें इस संदर्भ में सावधानी बरतनी चाहिए।

( द कन्वरसेशन ) मनीषा वैभव

वैभव


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