बच्चों को कितना अवकाश चाहिए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम कैसा बचपन चाहते हैं
बच्चों को कितना अवकाश चाहिए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम कैसा बचपन चाहते हैं
( सिल्वी प्रेज़ लीमा, ओबेर्ता दे कातालूनिया यूनिवर्सिटी )
बार्सिलोना, 27 अप्रैल (द कन्वरसेशन) बार्सिलोना के एक स्कूल में खेल के समय को 30 मिनट से बढ़ाकर 40 मिनट करने के फैसले ने एक पुराने विवाद को फिर हवा दे दी है—क्या स्कूलों में अवकाश का समय बढ़ाया जाना चाहिए? कुछ शिक्षक और अभिभावक इसकी वकालत कर रहे हैं, जबकि अन्य को आशंका है कि इससे पढ़ाई पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, संभव है कि यह सवाल ही ठीक तरह से नहीं पूछा जा रहा हो। प्राथमिक विद्यालयों में अवकाश, सीखने से अलग कोई विराम नहीं है। उदाहरण के लिए, स्पेन में कानून और शैक्षणिक दृष्टिकोण के तहत कई स्वायत्त समुदायों—कातालूनिया, वेलेंसिया, कास्टिला-ला मंचा, अंदालूसिया और ला रियोहा—में इसे शिक्षण समय का हिस्सा माना जाता है। वहीं मैड्रिड, अरागोन और कैनरी द्वीप जैसे क्षेत्रों में इसे प्रत्यक्ष शिक्षण समय नहीं माना जाता, लेकिन वहां भी अवकाश के दौरान शिक्षकों की उपस्थिति अनिवार्य है।
इस प्रकार, स्पेन के अधिकतर हिस्सों में छह से बारह वर्ष की आयु वर्ग के प्राथमिक स्तर पर खेल का समय प्रतिदिन के पांच शिक्षण घंटों का हिस्सा होता है, क्योंकि अवकाश के दौरान भी शिक्षा विशिष्ट उद्देश्यों के साथ जारी रहती है—जैसे सामाजिक व्यवहार सीखना, आत्म-नियमन, बातचीत और समझौता करना, कल्पना करना, संबंध बनाना और साथ रहना सीखना।
साथ ही, वयस्कों की प्रत्यक्ष उपस्थिति के कारण अवकाश बढ़ाने का मतलब सीखने को कम करना नहीं, बल्कि एक विशेष प्रकार के सीखने को प्राथमिकता देना है।
खेल का मैदान एक शैक्षणिक स्थल
यह बहस अक्सर केवल शारीरिक गतिविधियों की जरूरत तक सीमित रह जाती है। निस्संदेह, खासकर आज के अधिक बैठने वाले जीवन में, बच्चों के लिए शारीरिक गतिविधियां जरूरी हैं। लेकिन अवकाश केवल शारीरिक ऊर्जा निकालने का माध्यम नहीं होना चाहिए।
स्वतंत्र खेल के लिए संरचित स्थान जरूरी होते हैं—उसे नियंत्रित करने के लिए नहीं, बल्कि उसे संभव बनाने के लिए। एक शैक्षणिक खेल मैदान में छोटे बच्चों के लिए प्रतीकात्मक खेल, गेंद या रस्सी जैसे उपकरणों के साथ खेल, शांत स्थान, बातचीत के कोने, रचनात्मक गतिविधियां और शारीरिक गतिविधि के अवसर शामिल होने चाहिए।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि स्वतंत्र और स्वतःस्फूर्त खेल का मतलब अव्यवस्थित खेल नहीं है। इसमें ऐसी व्यवस्था होती है जो स्वतंत्रता को संभव बनाती है—जैसे अलग-अलग गतिविधियों के लिए निर्धारित क्षेत्र, विभिन्न स्थानों के बीच ‘रोटेशन’ और खेलने के लिए विविध सामग्री का चयन।
जब केवल दौड़ने के लिए जगह दी जाती है, तो खेल सीमित हो जाता है और वही समस्याएं सामने आती हैं जिनकी चिंता की जाती है। लेकिन जब सामग्री, वयस्कों की उपस्थिति और संबंध बनाने के अवसर होते हैं, तो खेल का दायरा बढ़ जाता है।
वर्तमान कमी: खेल और कहानियां
स्कूल का खेल मैदान और अवकाश का समय बच्चों के भावनात्मक, सामाजिक और संज्ञानात्मक विकास को मजबूत करने का अवसर देता है। यह स्क्रीन के विकल्प के रूप में ध्यान और कल्पना जैसी क्षमताओं को विकसित करने में मदद करता है।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि बच्चे सप्ताह में कितने घंटे खेलते हैं, बल्कि यह है कि दैनिक स्कूल जीवन में किन गतिविधियों को शामिल किया जाना चाहिए—जैसे खेल, नाटक और कहानी पढ़ना।
इन तीनों गतिविधियों का एक साझा उद्देश्य है—प्रतीकात्मक क्षमता को सक्रिय करना। खेल के जरिए बच्चा वास्तविकता को दर्शाता है, नाटक के जरिए उसे प्रस्तुत करता है और कहानी के माध्यम से उसकी कल्पना करता है। ये सभी गतिविधियां विकास को बढ़ावा देती हैं और भावनाओं को समझने में मदद करती हैं।
स्वतंत्रता हो, लेकिन वयस्कों की भूमिका के साथ
शिक्षक केवल अनुशासन बनाए रखने के लिए नहीं होते, बल्कि उनकी मध्यस्थता की भूमिका बच्चों के अनुभवों को व्यक्त और साझा करने में मदद करती है।
जब विवाद होते हैं, तो शिक्षक को केवल निर्णय देने के बजाय समाधान की प्रक्रिया में मार्गदर्शन करना चाहिए—जैसे बच्चों से पूछना कि क्या हुआ, वे क्या चाहते थे और उन्होंने स्थिति को कैसे महसूस किया। इस तरह विवाद को सीखने के अवसर में बदला जा सकता है।
स्व-निर्माण की प्रक्रिया
वयस्कों की भाषा बच्चों की आत्म-छवि को प्रभावित करती है। “तुम हमेशा परेशान करते हो” कहने के बजाय “आज तुम्हें खेल में अपनी जगह ढूंढने में कठिनाई हो रही है” कहना बच्चे को बदलाव की संभावना के साथ पहचान देता है।
इस प्रकार, वयस्कों के शब्द न केवल व्यवहार को नियंत्रित करते हैं, बल्कि एक सक्षम और मूल्यवान छात्र की पहचान भी गढ़ते हैं।
सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा
जब हम समझते हैं कि खेल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सीखने की बुनियाद है, तो इसे स्कूल समय में योजनाबद्ध रूप से शामिल किया जा सकता है। कुछ स्कूल दिन की शुरुआत या अंत में खेल-आधारित गतिविधियों को शामिल कर रहे हैं, जिससे छात्रों को सीखने के लिए तैयार होने और दिनभर के अनुभवों को समेटने में मदद मिलती है।
इनमें सुबह की खेल गतिविधियां, दिन के अंत में आरामदायक गतिविधियां, रोजाना कहानी पढ़ना, कला और नाटक जैसी गतिविधियां शामिल हो सकती हैं, जो संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।
कथाओं की भूमिका
कहानियां और नाटक बच्चों की सुनने और भाषा कौशल को मजबूत करते हैं। बड़े बच्चों के लिए ये गतिविधियां ध्यान केंद्रित करने, विभिन्न दृष्टिकोण समझने और अपने विचार विकसित करने में मदद करती हैं।
साझा कहानी सुनना या नाटक में भाग लेना बच्चों को नियमों का पालन, प्रतीक्षा करना, कल्पना करना और दूसरों से जुड़ना सिखाता है।
अवकाश बढ़ाना या दृष्टिकोण बदलना?
अवकाश का समय बढ़ाना एक सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन यह तभी प्रभावी होगा जब इसके साथ यह विचार भी किया जाए कि इसका उपयोग कैसे किया जाए।
मुद्दा केवल समय बढ़ाने का नहीं, बल्कि स्कूल में खेल, कहानी और अभिव्यक्ति की भूमिका को नए सिरे से समझने का है। अंततः यह बहस इस बात पर केंद्रित है कि हम औपचारिक शिक्षा के दौरान बच्चों को किस हद तक बच्चा बने रहने देते हैं।
( द कन्वरसेशन ) मनीषा अविनाश
अविनाश
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