मानव शरीर ‘परफेक्ट डिजाइन’ नहीं है, बल्कि विकास के लंबे दौर का परिणाम है : अध्ययन
मानव शरीर ‘परफेक्ट डिजाइन’ नहीं है, बल्कि विकास के लंबे दौर का परिणाम है : अध्ययन
( लकी ई हाइड, ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के एनॉटॉमी विभाग में प्राध्यापक )
ब्रिस्टल (ब्रिटेन), 10 अप्रैल (द कन्वरसेशन) मानव शरीर को अक्सर “बेहतरीन डिजाइन” का अद्भुत उदाहरण बताया जाता है जो सुंदर, कुशल और अपने उद्देश्य के लिए पूरी तरह अनुकूल है। लेकिन करीब से देखने पर एक अलग तस्वीर सामने आती है।
वास्तव में, यह एक त्रुटिरहित मशीन नहीं, बल्कि लाखों वर्षों में विकास के दौरान हुए बदलावों का परिणाम है। विकास में नई संरचनाएं शून्य से नहीं बनतीं, बल्कि पहले से मौजूद संरचनाओं में जरूरत के अनुसार, सुधार करता है।
इसके परिणामस्वरूप मानव शरीर की कई विशेषताएं “पर्याप्त रूप से ठीक” समाधान हैं। वे कार्यात्मक तो हैं, लेकिन पूर्ण नहीं हैं। कई बीमारियां और शारीरिक समस्याएं इन्हीं सीमाओं से उत्पन्न होती हैं।
रीढ़ की हड्डी
मानव शरीर में रीढ़ अर्थात स्पाइन इस तर्क का सबसे अच्छा उदाहरण है। हमारी कशेरुक स्तंभ यानी वर्टिब्रल कॉलम का विकास चार पैरों वाले, पेड़ों पर रहने वाले पूर्वजों से हुआ, जहां इसका मुख्य कार्य लचीलेपन के साथ शाखाओं के बीच चलना और स्पाइनल कॉर्ड की रक्षा करना था।
जब मनुष्य सीधा चलने लगा, तो रीढ़ को शरीर का वजन संभालने और संतुलन बनाए रखने की अतिरिक्त जिम्मेदारी मिली तथा उस पर दबाव बढ़ा।
रीढ़ का लचीलापन वजन को संतुलित करने में मदद करता है, लेकिन इससे कमर दर्द, डिस्क खिसकने और अन्य समस्याओं का खतरा भी बढ़ता है। ये समस्याएं इसलिए आम हैं क्योंकि रीढ़ वह काम कर रही है, जिसके लिए वह मूल रूप से विकसित नहीं हुई थी।
गर्दन
गर्दन में मौजूद ‘रिकरेंट लेरिंजियल नर्व’ भी एक असामान्य संरचना का उदाहरण है। यह नस वेगस नर्व की शाखा है तथा हृदय की गति और “आराम और पाचन” के दौरान धड़कन तथा श्वांस को नियंत्रित करती है। यह बोलने व निगलने में भी मदद करती है।
सीधे रास्ते से मस्तिष्क से गले तक जाने के बजाय यह नस पहले छाती में नीचे जाती है, एक प्रमुख धमनी के चारों ओर घूमती है और फिर वापस गले तक आती है।
यह जटिल मार्ग किसी बुद्धिमान डिजाइन का परिणाम नहीं, बल्कि मछली जैसे पूर्वजों से विरासत में मिला है। समय के साथ गर्दन लंबी हुई, लेकिन नस का रास्ता नहीं बदला। इससे सर्जरी के दौरान चोट का जोखिम बढ़ जाता है।
आंखें
मानव आंखें भी विकासवादी समझौते को दर्शाती हैं। आंख के पीछे स्थित रेटिना है, और प्रकाश को फोटोरिसेप्टर तक पहुंचने से पहले तंत्रिका परतों से गुजरना पड़ता है।
ऑप्टिक नर्व रेटिना के पीछे से बाहर निकलती है, जिससे दृष्टि क्षेत्र में एक ‘ब्लाइंड स्पॉट’ बनता है, जहां हम देख नहीं सकते। हालांकि मस्तिष्क इस कमी को भर देता है, इसलिए हमें इसका एहसास नहीं होता। इस प्रकार, उत्कृष्ट दृष्टि के बावजूद हमारी दृश्य प्रणाली में यह खामी मौजूद है।
दांत
मानव दांत भी बताते हैं कि विकास टिकाऊपन से अधिक कार्यक्षमता को प्राथमिकता देता है। मनुष्यों में केवल दो बार दांत आते हैं—दूध के और स्थायी। एक बार स्थायी दांत टूटने या गिरने के बाद वे दोबारा नहीं आते, जबकि शार्क जैसे जीवों में दांत लगातार बनते रहते हैं।
अक्ल दाढ़ (विजडम टीथ) विकास में देरी का उदाहरण हैं। हमारे पूर्वजों के जबड़े बड़े थे और कठोर भोजन के लिए उपयुक्त थे। समय के साथ भोजन नरम हुआ और जबड़े छोटे हो गए, लेकिन दांतों की संख्या उतनी ही रही। इस कारण कई लोगों में अक्ल दाढ़ के लिए जगह नहीं बचती, जिससे दर्द और सर्जरी की जरूरत पड़ती है।
पेल्विस यानी श्रोणि
प्रसव मानव विकास की एक अहम प्रक्रिया है। मानव श्रोणि को सीधा चलने और शिशुओं को जन्म देने की जरूरत के दौरान अहम संतुलन बनाना पड़ता है।
संकीर्ण श्रोणि चलने में मदद करती है, लेकिन जन्म मार्ग को छोटा बनाती है। वहीं, शिशुओं का सिर अपेक्षाकृत बड़ा होता है, जिससे प्रसव जटिल और कभी-कभी खतरनाक हो जाता है। इसने न केवल शरीर की संरचना, बल्कि सामाजिक व्यवहार को भी प्रभावित किया है, जैसे प्रसव के दौरान सहयोग की आवश्यकता होती है।
विकास की निरंतरता
विकास हमेशा हर संरचना को समाप्त नहीं करता, जब तक वह बहुत बड़ा नुकसान न पहुंचाए। उदाहरण के लिए, अपेंडिक्स को पहले बेकार माना जाता था, लेकिन अब इसे प्रतिरक्षा प्रणाली में सीमित भूमिका निभाने वाला माना जाता है। हालांकि, इसमें सूजन (अपेंडिसाइटिस) जानलेवा हो सकती है।
साइनस का कार्य भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। ये खोपड़ी को हल्का कर सकते हैं या आवाज को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन इनकी संरचना के कारण इनमें संक्रमण का खतरा अधिक रहता है।
इसी तरह, कानों के आसपास की छोटी मांसपेशियां हमारे विकासवादी अतीत की याद दिलाती हैं। अन्य स्तनधारियों में ये कान को घुमाने में मदद करती हैं, लेकिन मनुष्यों में अधिकांश लोग इन्हें प्रभावी रूप से इस्तेमाल नहीं कर पाते।
कुल मिला कर कहा जा सकता है कि मानव शरीर एक परिपूर्ण डिजाइन नहीं, बल्कि विकास का जीवंत दस्तावेज है—जिसमें अनुकूलन, समझौते और ऐतिहासिक बदलाव दर्ज हैं।
यह समझ हमें सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं को नए नजरिये से देखने में मदद करती है। कमर दर्द, कठिन प्रसव, दांतों की भीड़ और साइनस संक्रमण जैसी समस्याएं केवल संयोग नहीं, बल्कि हमारे विकासवादी इतिहास का परिणाम हैं।
( द कन्वरसेशन ) मनीषा पवनेश
पवनेश

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