भारत यूएनएससी में नियमों पर आधारित समुद्री व्यवस्था को प्राथमिकता देगा : जयशंकर
भारत यूएनएससी में नियमों पर आधारित समुद्री व्यवस्था को प्राथमिकता देगा : जयशंकर
( तस्वीरों सहित )
( योषिता सिंह )
संयुक्त राष्ट्र, 14 जुलाई (भाषा) विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि भारत यह सुनिश्चित करेगा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में समुद्री नाविकों की सुरक्षा तथा आतंकवाद के वित्तपोषण के मुकाबले सहित स्वतंत्र, खुले और नियम आधारित समुद्री व्यवस्था के मुद्दे पर ‘‘उचित ध्यान’’ दिया जाए, जिनकी आवश्यकता है।
जयशंकर ने सोमवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में 2028-29 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अस्थायी सीट को लेकर भारत के आधिकारिक अभियान को शुरू करते हुए ये टिप्पणी की। इस कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र में तैनात राजदूत, राजनयिक और अधिकारी शामिल हुए थे।
भारत अब तक आठ बार यूएनएससी का अस्थायी सदस्य रहा है। पिछली बार वह 2021-22 में यूएनएससी का अस्थायी सदस्य बना था।
मंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच वाणिज्यिक पोत पर हुए हमलों में कई भारतीय नाविक मारे गए हैं और कई लोगों को बचाया गया है।
जयशंकर ने कहा कि भारत ऐसे समय में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता के लिए अपनी उम्मीदवारी पेश कर रहा है, जब दुनिया ‘‘एक गहरे विरोधाभास’’ का सामना कर रही है।
उन्होंने कहा, ‘‘दुनिया के पास इससे पहले कभी भी इतने बड़े पैमाने पर मानव कल्याण को आगे बढ़ाने की इतनी व्यापक क्षमता नहीं थी। साथ ही, हम टकराव, हिंसा और अस्थिरता का ऐसा स्तर देख रहे हैं, जिनसे वे लोग भी खतरे की जद में हैं, जो जो इन घटनाओं से बहुत दूर हो सकते हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘इस जटिल स्थिति से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र को पहल करनी होगी और सुरक्षा परिषद को दिशा दिखानी होगी। इसलिए, इसकी सदस्यता के लिए चुनाव बहुत अहम हो जाते हैं।’’
जयशंकर ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के प्रति भारत का नजरिया नियमों, भरोसे और ईमानदारी के जरिए सर्वांगीण प्रगति सुनिश्चित करने से संबंधित ‘शांति: सेक्योरिंग हॉलिस्टिक एडवांस्मेंट थ्रू नॉर्म्स, ट्रस्ट एंड इंटिग्रिटी’ पर आधारित है। उन्होंने यूएनएससी कार्यकाल के लिए भारत की प्राथमिकताओं के बारे में विस्तार से बताया।
उन्होंने कहा, ‘‘ये प्राथमिकताएं हैं – ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज बनना; सुधार के बाद बहुपक्षवाद को आगे बढ़ाना; भविष्य के लिए तैयार शांति-रक्षा व्यवस्था; कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के गलत इस्तेमाल से पैदा होने वाले खतरों से निपटना; समुद्री इलाकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और आतंकवाद के वित्त पोषण का मुकाबला करना।’’
‘ग्लोबल साउथ’ से तात्पर्य उन देशों से है, जिन्हें अक्सर विकासशील, कम विकसित अथवा अविकसित के रूप में जाना जाता है और ये मुख्य रूप से अफ्रीका, एशिया और लातिन अमेरिका में स्थित हैं।
जयशंकर ने कहा, ‘‘ऐसे दौर में जब आपूर्ति श्रृंखला हमारी अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ती हैं, दुनिया समुद्री इलाकों की सुरक्षा पर भी तेजी से ध्यान दे रही है।’’
उन्होंने कहा कि चुनौती की शुरुआत संबंधित अंतरराष्ट्रीय कानूनों, विशेष रूप से समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीएलओएस) का अनुपालन सुनिश्चित करने से होती है।
जयशंकर ने कहा, ‘‘हमारे सामूहिक हित इसी बात में निहित हैं कि समुद्री व्यापार सुरक्षित और बिना रुकावट के जारी रहे।’’ उन्होंने कहा कि जिन देशों के पास जरूरी क्षमताएं हैं, उन्हें समुद्री दस्युओं से निपटने के लिए सहयोग भी करना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘खाड़ी क्षेत्र में हो रही घटनाओं से नाविकों की सुरक्षा भी एक बड़ी चिंता का विषय बन गई है।’’
जयशंकर ने कहा कि खोज और बचाव अभियानों को बढ़ावा देना, मानवीय सहायता और आपदा राहत प्रदान करना तथा सर्वोत्तम तरीकों को साझा करते हुए दक्षता विकास को प्रोत्साहित करना – ये सभी ऐसे क्षेत्र रहे हैं, जिनमें भारत लंबे समय से सक्रिय रहा है।
उन्होंने कहा, ‘‘हम यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेंगे कि सुरक्षा परिषद में इन मुद्दों पर उचित ध्यान दिया जाए।’’
उन्होंने कहा कि समुद्री सुरक्षा के मामले में भारत बड़े पैमाने पर और नियमित रूप से योगदान देता है, जिसमें समुद्री डकैती रोकने, नशीले पदार्थों की तस्करी रोकने और मानव तस्करी के खिलाफ अभियान शामिल हैं।
जयशंकर ने कहा, ‘‘हमारी सेनाएं हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री मार्गों खासकर उत्तरी और दक्षिणी अरब सागर, अदन की खाड़ी, मलक्का जलडमरूमध्य और यहां तक कि गिनी की खाड़ी में भी सुरक्षा प्रदान कर रही हैं।’’
समुद्री इलाकों को सुरक्षित रखने के मुद्दे पर भारत ने ऐसे समय में ध्यान आकर्षित किया है, जब ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजराइल संघर्ष से कई चुनौतियां पैदा हो गई हैं; होर्मुज जलडमरूमध्य (एक अहम समुद्री मार्ग) के बंद होने और वहां नाकेबंदी से ईंधन की वैश्विक कीमतों और जरूरी आपूर्ति श्रृंखला पर बुरा असर पड़ रहा है तथा नाविकों की जान भी खतरे में पड़ गई है।
शांति के समय में दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का 25 प्रतिशत हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता था।
मंत्री ने कहा कि यूएनएससी अभियान के लिए भारत की एक और अहम प्राथमिकता प्रभावी और लगातार प्रयासों के जरिए आतंकवाद के वित्त पोषण को रोकना होगा।
जयशंकर ने कहा, ‘‘भले ही दुनिया विकास की गति को बनाए रखने और समृद्धि को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है, लेकिन कुछ पुरानी चुनौतियां अब भी हमारे सामने हैं। इनमें आतंकवाद एक बड़ी चुनौती है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘बहुत लंबे समय से हमारे प्रयास केवल इसके लक्षणों से निपटने पर केंद्रित रहे हैं, लेकिन जब तक हम इसके संसाधनों के आधार को खत्म करने पर ध्यान नहीं देंगे, तब तक हमें सीमित नतीजे ही मिलेंगे। हमारी प्रतिबद्धता आतंकवाद के वित्त पोषण को रोकने और आतंकवादी समूहों को सूचीबद्ध करने के लिए निष्पक्ष एवं साक्ष्य-आधारित प्रस्तावों को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करने की है।’’
वर्ष 2028-29 के कार्यकाल के लिए चुनाव अगले वर्ष जून में होंगे, जिसमें एशिया-प्रशांत समूह श्रेणी की एकमात्र सीट के लिए भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला होगा।
भारत इससे पहले 2021-22 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की प्रतिष्ठित 15 सदस्यीय संस्था में शामिल था। यह उसका इस शक्तिशाली निकाय में आठवां कार्यकाल था। इससे पहले भारत 1950-1951, 1967-1968, 1972-1973, 1977-1978, 1984-1985, 1991-1992 और 2011-2012 में सुरक्षा परिषद का सदस्य रह चुका है।
इस अवसर पर एक विशेष वीडियो प्रस्तुत किया गया, जिसमें वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका और योगदान तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अभियान के लिए उसकी प्राथमिकताओं को उजागर किया गया।
वीडियो में कहा गया है, ‘‘अराजकता से भरी दुनिया में एक सभ्यता ने हमेशा एक ही शब्द से जवाब दिया है – ‘शांति’।’’ वीडियो में मिसाइलों से तबाह होते शहरों और प्राकृतिक आपदाओं से मची तबाही के दृश्य दिखाए गए, साथ ही यह भी दिखाया गया कि कैसे भारत राहत और मानवीय सहायता प्रयासों के माध्यम से मदद के लिए आगे आता है।
जयशंकर ने कहा कि भारत जैसे देश, जिनका मतभेदों को दूर करने और सहमति बनाने का लंबा इतिहास रहा है, निश्चित रूप से इसमें अपना उचित योगदान दे सकते हैं।
वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र के 11 सक्रिय शांति अभियानों में से 10 में 4,300 कर्मी तैनात हैं। जयशंकर ने कहा, ‘‘बहुत कम देशों के पास शांति स्थापना को भविष्य के लिए तैयार करने का हमारे जैसा अनुभव होगा।’’
जयशंकर ने कहा कि भारत ने एआई के लिए मानव केंद्रित सोच पेश की है, जो एआई की क्षमताओं और देश की परंपराओं, दोनों पर आधारित है।
उन्होंने कहा, ‘‘एक ऐसे देश के तौर पर जिसने वैश्विक डिजिटल अंतर को पाटने में योगदान दिया है, हम एआई के मामले में भी उतनी ही प्रतिबद्धता रखते हैं।’’
जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि बहुत अधिक टकराव और तनाव वाली दुनिया में भारत ने हमेशा बातचीत और कूटनीति का समर्थन किया है।
उन्होंने कहा, ‘‘हमने मतभेदों को दूर करने और आम सहमति बनाने की कोशिश की है। हमारा ध्यान ‘ग्लोबल साउथ’ पर इन बदलावों के असर को कम करने पर रहा है।’’
भाषा सुरभि दिलीप
दिलीप

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