( फायरमेस्क रहीम, यूमास बोस्टन )
बोस्टन (अमेरिका), पांच मई (द कन्वरसेशन) खाड़ी क्षेत्र के अरब देश लंबे समय से ईरान के खतरे के बीच एकजुटता का प्रदर्शन करते रहे हैं लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह एकता अक्सर सतही होती है और इसके पीछे गहरे नीतिगत मतभेद छिपे रहते हैं।
हाल ही में 28 अप्रैल 2026 को सऊदी अरब के जेद्दा में खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) की बैठक में सदस्य देशों ने एकजुटता का संदेश देते हुए ईरान को चेतावनी दी कि किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी ने इसे “खाड़ी देशों की एकजुट स्थिति” का प्रतीक बताया और होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान के दावे को खारिज किया।
हालांकि यह एकता का प्रदर्शन ऐसे समय में सामने आया है जब जीसीसी के भीतर मतभेद भी उभरकर सामने आए हैं, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात का ओपेक से बाहर होना भी शामिल है।
जानकारों के अनुसार, यह विरोधाभास नया नहीं है। ईरान के साथ तनाव बढ़ने पर खाड़ी देश अक्सर सार्वजनिक रूप से एकजुट नजर आते हैं, लेकिन उनकी नीतियां और प्राथमिकताएं अलग-अलग बनी रहती हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि खाड़ी क्षेत्र की मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था पर 1979 की ईरानी क्रांति का गहरा प्रभाव पड़ा था। इस क्रांति से पहले ईरान और सऊदी अरब को अमेरिका के दो प्रमुख सहयोगी माना जाता था लेकिन क्रांति के बाद ईरान एक इस्लामिक गणराज्य के रूप में उभरा, जिसने शिया विचारधारा को बढ़ावा दिया। इससे सुन्नी नेतृत्व वाले खाड़ी देशों के साथ उसका वैचारिक टकराव बढ़ा।
इसी पृष्ठभूमि में 1981 में बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने मिलकर जीसीसी की स्थापना की। हालांकि इसका उद्देश्य आर्थिक और राजनीतिक सहयोग था, लेकिन इसके पीछे साझा सुरक्षा चिंताएं भी प्रमुख थीं। इसके बावजूद सदस्य देशों के बीच शुरुआत से ही एकरूपता नहीं रही और हर देश अपनी अलग सुरक्षा प्राथमिकताओं के अनुसार नीतियां बनाता रहा।
1980 में शुरू हुए ईरान-इराक युद्ध के दौरान भी यह अंतर स्पष्ट रूप से सामने आया, जब कुछ देशों ने इराक का समर्थन किया, जबकि ओमान ने तटस्थ रुख अपनाया। इससे यह संकेत मिला कि जीसीसी देश सामूहिक रूप से एकजुट होकर रणनीतिक निर्णय लेने में सीमित हैं।
1990 में इराक द्वारा कुवैत पर आक्रमण और उसके बाद अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन की कार्रवाई ने खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा संरचना को फिर बदल दिया। इसके बाद जीसीसी देशों ने अमेरिका पर अपनी सुरक्षा के लिए निर्भरता बढ़ा दी और अपने यहां अमेरिकी सैन्य ठिकानों की अनुमति दी। हालांकि इस कदम ने भी सदस्य देशों के बीच नीतिगत अंतर को पूरी तरह खत्म नहीं किया।
ईरान के साथ संबंधों को लेकर भी जीसीसी देशों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं। जहां ओमान और कतर ने संवाद और संतुलन की नीति अपनाई, वहीं सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान को क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी मानते हुए अधिक सख्त रुख अपनाया।
2003 में इराक युद्ध के बाद ईरान का प्रभाव बढ़ने से इन मतभेदों में और वृद्धि हुई। यह अंतर 2017 के कतर संकट के दौरान भी सामने आया, जब सऊदी अरब, यूएई और बहरीन ने कतर से संबंध तोड़ लिए और उस पर प्रतिबंध लगा दिया। बाद में 2021 में यह विवाद समाप्त हुआ, लेकिन इससे जीसीसी की आंतरिक एकता पर सवाल खड़े हुए।
हाल के वर्षों में क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया है। अक्टूबर 2023 में हमास के हमले और उसके बाद के घटनाक्रमों ने स्थिति को और जटिल बना दिया। जून 2025 में ईरान ने कतर में अमेरिकी ठिकाने पर हमला किया, जो किसी जीसीसी देश पर उसका पहला सीधा हमला था। इसके बाद 2026 में संघर्ष के दौरान ईरान ने सभी छह सदस्य देशों को निशाना बनाया और होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा प्रभावित हुआ।
इन घटनाओं के बाद जीसीसी देशों ने एक बार फिर सामूहिक सुरक्षा और एकजुटता पर जोर दिया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह एकता अस्थायी है। जैसे ही क्षेत्रीय तनाव कम होगा, सदस्य देश फिर अपने-अपने राष्ट्रीय हितों और रणनीतियों के अनुसार काम करने लगेंगे।
विश्लेषकों के अनुसार, 1979 के बाद से खाड़ी क्षेत्र में एक पैटर्न स्पष्ट रूप से देखा गया है—संकट के समय एकजुटता का प्रदर्शन और सामान्य परिस्थितियों में नीतिगत मतभेद। ऐसे में जीसीसी को पूरी तरह एकजुट संगठन के रूप में देखने के बजाय एक ऐसे मंच के रूप में समझना अधिक उचित है, जहां सहयोग और असहमति दोनों साथ-साथ मौजूद रहते हैं।
द कन्वरसेशन
मनीषा नरेश
नरेश