क्या विश्व में शांति संभव है? मैंने युद्ध और शांति का अध्ययन किया है

क्या विश्व में शांति संभव है? मैंने युद्ध और शांति का अध्ययन किया है

क्या विश्व में शांति संभव है? मैंने युद्ध और शांति का अध्ययन किया है
Modified Date: January 4, 2026 / 05:59 pm IST
Published Date: January 4, 2026 5:59 pm IST

(एलेक्स बेल्लामी द्वारा, क्वींसलैंड विश्वविद्यालय)

ब्रिस्बेन, चार जनवरी (द कन्वरसेशन) किसी भी लिहाज से देखा जाये तो 2025 विश्व शांति के लिए अच्छा वर्ष नहीं था।

इससे भी बदतर बात यह कि यह शांति की दिशा में एक दशक से चली आ रही गिरावट और युद्धों में बढ़ोतरी को दिखाता है।

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विश्व शांति और हम इसे कैसे प्राप्त कर सकते हैं, इस विषय पर लिखी गई पुस्तक के लेखक के रूप में मेरा आकलन इस प्रकार है।

कई पैमानों के अनुसार, विश्वभर में शांति की स्थिति में गिरावट आ रही है।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा वित्त पोषित एक स्वतंत्र निगरानी संस्था, ‘द आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन’ और ‘इवेंट डाटा इंडेक्स’ के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में वैश्विक संघर्ष दोगुना हो गया है।

‘इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सिक्योरिटी स्टडीज’ की रिपोर्ट के अनुसार, अकेले 2025 तक सशस्त्र संघर्ष में 23 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसमें कहा गया है कि 2025 में हिंसक संघर्ष में लगभग 2,40,000 लोग मारे गये।

‘इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस के ग्लोबल पीस इंडेक्स’ ने बताया कि दुनियाभर में शांति की स्थिति लगातार छठे वर्ष बिगड़ी है।

रिपोर्ट के अनुसार इस गिरावट के कुछ लक्षण इस प्रकार हैं:

-वैश्विक व्यापार में स्थिरता

-विकासशील देशों में सरकारी राजस्व का 42 प्रतिशत हिस्सा ऋण ब्याज भुगतान में चला जाता है (अब सबसे बड़ा वैश्विक ऋणदाता चीन है)।

-शांति निर्माण पर खर्च की जाने वाली राशि में कटौती

-युद्ध तब होता है जब संघर्ष बढ़ता है और शांति लाने वाली चीजों के प्रति प्रतिबद्धता कम होती जाती है।

इन रुझानों के पीछे तीन कारण हैं:

-उदार लोकतंत्र का सापेक्षिक पतन और सत्तावादी शक्तियों का उदय

-वैश्विक वित्तीय संकट और कोविड जैसे गंभीर झटके

-वैश्वीकरण पर आधारित आर्थिक विकास से उत्पन्न समस्याएं, विशेषकर बढ़ती असमानता और सामाजिक विखंडन।

हम वास्तव में जानते हैं कि युद्ध और शांति के पीछे क्या कारण होते हैं।

कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि युद्ध और शांति की घटनाएं स्वाभाविक रूप से घटती-बढ़ती रहती हैं, जो संरचनात्मक शक्तियों द्वारा संचालित होती हैं जो मानवीय हस्तक्षेप को चुनौती देती हैं।

लेकिन यह युद्ध और शांति दोनों से जुड़े कारकों के बारे में हमारी समझ में हुई अपार प्रगति को नजरअंदाज करता है।

यह भी सर्वविदित है कि शांति रक्षा से नागरिकों के उत्पीड़न, संघर्ष से संबंधित यौन हिंसा और संघर्ष के पुनः भड़कने की आशंका में कमी आती है।

पिछले दो दशकों में, शोधकर्ताओं ने उन कारकों की पहचान करने में उत्कृष्ट कार्य किया है। हम जानते हैं कि युद्ध आकस्मिक रूप से अप्रत्याशित या अस्पष्ट नहीं होता है।

इसका अर्थ यह है कि युद्ध मानव नियंत्रण से परे नहीं है।

युद्ध एक विकल्प है

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यह धारणा कि मनुष्य स्वभाव से ही युद्धप्रिय होता है, उतनी ही सरल है जितनी यह दावा कि हम स्वभाव से ही शांतिप्रिय होते हैं। मानवविज्ञानी और जीवविज्ञानी दोनों ही यह सिद्ध कर चुके हैं कि हम स्वभाव से दोनों ही होते हैं।

युद्ध एक सामाजिक प्रथा है और किसी भी सामाजिक प्रथा की तरह, यह मानवीय निर्णयों के कारण होता है।

मनुष्य के पास स्वायत्तता और विकल्प होते हैं। निश्चित रूप से सामाजिक संरचनाएं, राजनीतिक विचार और आर्थिक दबाव विकल्पों को प्रभावित करते हैं, लेकिन वे उन्हें निर्धारित नहीं करते।

इसका यह मतलब नहीं है कि ‘‘अगर हम चाहें तो युद्ध खत्म हो जायेगा’’।

युद्ध इसलिए होता है क्योंकि लोगों के बीच महत्वपूर्ण मुद्दों और मूल्यों को लेकर गंभीर मतभेद होते हैं – ऐसी चीजें जिन्हें वे इतना महत्व देते हैं कि वे समझौता करने के बजाय संघर्ष करना पसंद करते हैं।

लेकिन जनता, सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संगठन ऐसी परिस्थितियां बना सकते हैं जिनसे युद्ध की आशंका कम हो जाए और युद्ध को रोकने, सीमित करने और हल करने के साधन अधिक प्रभावी हो जाएं।

क्या किया जाना चाहिए?

अंतरराष्ट्रीय प्रणालियों का निर्माण उनके सदस्यों द्वारा किया जाता है।

शांति के आधारभूत तत्व निम्नलिखित हैं:

-जवाबदेह हों (लोकतांत्रिक)

-मानवाधिकारों का सम्मान करें

-सक्षम संस्थाएं हों

-सभी को गरिमापूर्ण जीवन और अवसर प्रदान करें

– लैंगिक समानता वाले समाजों को बढ़ावा देना।

लेकिन यह ऐसी चीज नहीं है जिसे जल्दी या आसानी से बदला जा सके और यह एक राजनीतिक संघर्ष है जिसे प्रत्येक समाज को अपनी शर्तों पर लड़ना होगा।

इसलिए, उन अंतरराष्ट्रीय साधनों के पुनर्निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना बुद्धिमानी है जिनके बारे में हम जानते हैं कि वे बदलाव ला सकते हैं।

आगामी वर्ष के लिए तीन अत्यावश्यक प्राथमिकताएं:

सबसे पहले, हमें संयुक्त राष्ट्र चार्टर के बुनियादी सिद्धांतों के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन की पुष्टि करनी होगी, जिसमें अहिंसा का सिद्धांत भी शामिल है।

दूसरा, हमें संयुक्त राष्ट्र और क्षेत्रीय शांति निर्माण प्रयासों और क्षमताओं के लिए समर्थन को फिर से शुरू करना होगा।

तीसरा, हमारे समय के सबसे गंभीर संकट, गाजा का समाधान करना।

विश्व में शांति संभव है क्योंकि शांति और युद्ध मानवीय संस्थाएं हैं, न कि प्रकृति की शक्तियां।

(द कन्वरसेशन)

देवेंद्र नरेश

नरेश


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