ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करना चाहता है इजराइल, लेकिन क्या उसे खुद परमाणु हथियार रखने चाहिए?

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करना चाहता है इजराइल, लेकिन क्या उसे खुद परमाणु हथियार रखने चाहिए?

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करना चाहता है इजराइल, लेकिन क्या उसे खुद परमाणु हथियार रखने चाहिए?
Modified Date: March 25, 2026 / 05:57 pm IST
Published Date: March 25, 2026 5:57 pm IST

(मैरिएन हैंसन, क्वींसलैंड विश्वविद्यालय)

क्वींसलैंड, 25 मार्च (द कन्वरसेशन) पश्चिम एशिया युद्ध में इजराइल का घोषित लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है। फिर भी, इजराइल का इस मामले में दोहरा मापदंड दीर्घकाल में टिकाऊ नहीं है।

परमाणु हथियारों के मामले में दुनिया में यह कोई छिपा हुआ रहस्य नहीं है कि इजराइल के पास परमाणु हथियारों का एक भंडार है। इसने 1950 के दशक में इनका विकास शुरू किया और 1960 के दशक के अंत तक पूरी तरह से परिचालन क्षमता हासिल कर ली।

इजराइल इस तथ्य की पुष्टि या खंडन करने से इनकार करता है, लेकिन हथियार नियंत्रण संगठनों ने आकलन किया है कि देश के पास लगभग 80-90 परमाणु हथियार हैं।

हाल के दिनों में, ईरान ने दक्षिणी शहर डिमोना में इजराइल के परमाणु प्रतिष्ठान के नजदीक हमला किया, जिससे 100 से अधिक लोग घायल हो गए।

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के प्रमुख ने ‘‘परमाणु दुर्घटना’’ से बचने के लिए संयम बरतने का आह्वान किया।

एक गुप्त कार्यक्रम :

इजराइल के शस्त्रागार के अस्तित्व को प्रमाणित करने वाले कई प्रमाण मौजूद हैं। 1963 में, तत्कालीन उप रक्षा मंत्री शिमोन पेरेस ने कहा था कि इजराइल पश्चिम एशिया में परमाणु हथियार ‘‘पेश करने वाला पहला देश नहीं होगा।’’

इसका असल मतलब कुछ साल बाद अमेरिका में इजराइली राजदूत ने स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि कोई हथियार होने के बारे में घोषित करने के लिए उसका परीक्षण और सार्वजनिक घोषणा आवश्यक है।

कई व्हिस्लब्लोअर के बयानों, खुफिया रिपोर्ट और उपग्रह छवियों से इजराइल के परमाणु कार्यक्रम की व्यापकता और उसकी क्षमताओं की पुष्टि होती है।

हाल ही में, इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार में धुर दक्षिणपंथी मंत्री अमीचाई एलियाहू ने गाजा में परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का संकेत दिया, जो इजराइल की क्षमताओं की एक तरह से मौन स्वीकृति थी। बाद में नेतन्याहू ने उन्हें फटकार लगाई।

इसके अलावा, 2024 में भी इजराइल के पूर्व रक्षा और विदेश मंत्री एविग्डोर लिबरमैन ने ईरान के परमाणु हथियार को रोकने के लिए देश के पास उपलब्ध सभी साधनों का उपयोग करने की धमकी दी थी।

यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि इजराइल ने न केवल गुप्त रूप से अपने परमाणु हथियार विकसित किए, बल्कि उसने अपने प्रतिष्ठानों के अंतरराष्ट्रीय निरीक्षणों को भी अस्वीकार कर दिया है और परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) में शामिल होने से भी मना कर दिया है। इस संधि पर दुनिया के लगभग हर देश ने हस्ताक्षर किए हैं।

ईरान के कार्यक्रम को लेकर चिंताएं :

दूसरी ओर, ईरान के पास कभी भी परमाणु हथियार नहीं रहा है, हालांकि उसका कार्यक्रम एक दशक से अधिक समय से अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है।

ईरान ने 2015 में अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी के साथ संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जिसे ईरान परमाणु समझौता भी कहा जाता है) पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत प्रतिबंधों में राहत के बदले ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाए गए। इसमें आईएईए पर्यवेक्षकों द्वारा निरीक्षण भी शामिल थे।

हालांकि, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2018 में इस समझौते से खुद को अलग कर लिया। तब से, ईरान ने अपने ऊर्जा कार्यक्रम के लिए आवश्यक स्तर से कहीं अधिक यूरेनियम संवर्धन किया है। और पिछले साल, आईएईए ने कहा कि ईरान अपने परमाणु अप्रसार दायित्वों का पालन नहीं कर रहा है क्योंकि उसने अपने कार्यक्रम के बारे में पूरी जानकारी नहीं दी है।

हालांकि, मौजूदा युद्ध शुरू होने के बाद से, अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय अधिकारियों ने पुष्टि की है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने के करीब नहीं था और न ही उसने अमेरिका या इजराइल के लिए तत्काल परमाणु खतरा पैदा किया था।

संक्षेप में कहें तो इजराइल द्वारा लगभग 40 वर्षों से किए जा रहे इस दावे में कोई सच्चाई नहीं है कि ईरान परमाणु बम हासिल करने से ‘‘कुछ ही दूर’’ है।

परमाणु शक्तियों को संयम बरतने की आवश्यकता है :

यह हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर वापस ले जाता है कि क्या परमाणु हथियार विकसित करने और न करने के संबंध में दोहरे मापदंड अनिश्चित काल तक कायम रह सकते हैं?

पश्चिमी देशों ने इजराइल के परमाणु शस्त्रागार को मौन स्वीकृति दे दी है, जिससे यह संकेत मिलता है कि परमाणु हथियारों के लिए ‘‘सही पक्ष’’ और ‘‘गलत पक्ष’’ होते हैं, लेकिन यह एक जोखिम भरा और अंततः अस्थिर दृष्टिकोण है।

ऑस्ट्रेलिया के कैनबरा आयोग ने 1996 में कहा था, जब तक किसी एक देश के पास परमाणु हथियार रहेंगे, अन्य देश भी उन्हें हासिल करना चाहेंगे।

यही कारण है कि 2017 में कई देशों ने संयुक्त राष्ट्र परमाणु हथियार निषेध संधि को अपनाने के लिए मतदान किया। इस संधि का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के आधार पर परमाणु हथियारों को रखना, इनकी धमकी देना और उपयोग सभी देशों के लिए अवैध बनाना है, न कि केवल कुछ देशों के लिए।

अब तक 99 देशों द्वारा हस्ताक्षरित यह संधि इस बात को स्वीकार करती है कि परमाणु हथियार नागरिकों और युद्धरत पक्षों दोनों के लिए बड़े पैमाने पर विनाश का खतरा पैदा करते हैं, और यहां तक ​​कि एक ‘‘छोटा’’ परमाणु युद्ध भी विनाशकारी क्षति का कारण बनेगा।

(द कन्वरसेशन) शफीक नरेश

नरेश


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