महाराजा चार्ल्स का अमेरिका दौरा बताता है कि कूटनीति में राजशाही की भूमिका कम नहीं हुई

महाराजा चार्ल्स का अमेरिका दौरा बताता है कि कूटनीति में राजशाही की भूमिका कम नहीं हुई

महाराजा चार्ल्स का अमेरिका दौरा बताता है कि कूटनीति में राजशाही की भूमिका कम नहीं हुई
Modified Date: April 30, 2026 / 11:51 am IST
Published Date: April 30, 2026 11:51 am IST

( डेनिस आल्टमैन, ला ट्रोब यूनिवर्सिटी )

मेलबर्न, 30 अप्रैल (द कन्वरसेशन) महाराजा चार्ल्स तृतीय के हालिया अमेरिका दौरे ने यह संकेत दिया है कि युद्ध और कूटनीतिक तनाव के समय में भी राजशाही का प्रभाव बना रहता है।

फरवरी में व्हाइट हाउस ने सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक राजा की तरह प्रस्तुत करने वाली तस्वीरें जारी की थीं। इस सप्ताह उन्हें एक वास्तविक सम्राट की मेजबानी करने का अवसर मिला, जब महाराजा चार्ल्स और महारानी कैमिला आधिकारिक दौरे पर अमेरिका पहुंचे।

इस दौरान शाही दंपति का वॉशिंगटन और न्यूयॉर्क में ऐसा स्वागत किया गया, मानो वे अटलांटिक पार मौजूद तथाकथित “विशेष संबंध” के प्रतीक हों, जिस पर ब्रिटेन लंबे समय से जोर देता रहा है।

हालांकि, यह संबंध हाल के समय में तनावपूर्ण हो गए हैं, क्योंकि ब्रिटेन ने ईरान के खिलाफ जारी युद्ध में भाग लेने से इनकार कर दिया जिस पर ट्रंप ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री केअर स्टार्मर के खिलाफ तीखी टिप्पणियां की हैं।

अमेरिका के साथ संबंध मजबूत करने के लिए राजशाही का उपयोग करना ब्रिटेन की पुरानी परंपरा रही है, जबकि यह तथ्य भी है कि अमेरिका स्वयं राजशाही शासन के खिलाफ विद्रोह के बाद अस्तित्व में आया था।

ट्रंप एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्हें ब्रिटेन में दो बार राजकीय दौरे का सम्मान मिला है और वह महाराजा के साथ अपनी मित्रता की खुलकर सराहना करते हैं।

संवैधानिक सम्राट होने के कारण महाराजा चार्ल्स सरकार के विचारों से अलग कोई राय सार्वजनिक रूप से व्यक्त नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, यदि ट्रंप ईरान पर हमले में शामिल नहीं होने की ब्रिटेन की नीति की आलोचना करें या फॉकलैंड द्वीपों पर अर्जेंटीना के दावे का समर्थन करने की बात उठाएं, तो राजा सीधे जवाब नहीं दे सकते।

ओवल ऑफिस में ट्रंप से मुलाकात और अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करते हुए महाराजा चार्ल्स ने इस बात पर जोर दिया कि अस्थायी मतभेदों के बावजूद दोनों देश “मानव इतिहास के सबसे महान गठबंधनों में से एक” से जुड़े हुए हैं।

अपने बेहद सावधानी से तैयार भाषण में उन्होंने उन मुद्दों का भी उल्लेख किया, जहां दोनों देशों के बीच मतभेद हैं, जैसे कि यूक्रेन की रक्षा के लिए “अडिग संकल्प” की आवश्यकता।

पर्यावरण संरक्षण पर जोर देते हुए उन्होंने जलवायु परिवर्तन का भी उल्लेख किया, जो ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं रहा है।

महाराजा ने ‘ऑकस’ (एयूकेयूएस) का भी जिक्र किया, जिससे यह संकेत मिला कि वह ऑस्ट्रेलिया सहित 14 अन्य देशों के भी राष्ट्र प्रमुख हैं। हालांकि, इस दौरे को पूरी तरह ब्रिटेन के प्रतिनिधित्व के रूप में देखा गया, जो राजशाही की जटिल संरचना को दर्शाता है।

औपचारिकताओं से परे, यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह दौरा ट्रंप की विदेश नीति को प्रभावित करेगा? ट्रंप स्वयं को एक कुशल सौदेबाज मानते हैं और यह भी समझते हैं कि महाराजा अपने 15 क्षेत्रों के लिए कोई समझौते नहीं करते।

संभावना जताई जा रही है कि निजी तौर पर महाराजा ने ट्रंप के कुछ विचारों को नरम करने की कोशिश की हो। उन्होंने फॉकलैंड द्वीपों के निवासियों की ब्रिटिश पहचान के प्रति मजबूत प्रतिबद्धता को भी समझाने का प्रयास किया होगा।

जेफ्री एप्स्टीन से जुड़े विवाद को इस दौरे के दौरान सावधानीपूर्वक चर्चा से बाहर रखा गया जो ट्रंप और राजशाही दोनों पर छाया रहा है।

महारानी कैमिला का घरेलू हिंसा पीड़ितों से मिलने और घुड़दौड़ से जुड़े फार्म के दौरे का कार्यक्रम उनकी सास की परंपरा की झलक देता है।

यह दौरा ट्रंप और महाराजा चार्ल्स दोनों के लिए अपने-अपने प्रभाव को मजबूत करने का अवसर भी है। ईरान युद्ध के लंबा खिंचने और महंगाई बढ़ने के कारण ट्रंप की लोकप्रियता दबाव में है, जबकि व्हाइट हाउस को लगता है कि चार्ल्स के साथ उनकी तस्वीरें प्रशासन की चुनौतियों से ध्यान भटका सकती हैं।

वहीं, यह दौरा ब्रिटेन में भी यह याद दिलाता है कि राजशाही अब भी देश की सबसे प्रभावी ‘सॉफ्ट पावर’ है। लंदन में ऑस्ट्रेलिया के पूर्व उच्चायुक्त जॉर्ज ब्रैंडिस के अनुसार, महाराजा चार्ल्स को जीवन भर का प्रशिक्षण मिला है, जिससे वह विदेशी नेताओं को प्रभावित कर सकते हैं, भले ही वे उनके मंत्रियों से सहमत न हों।

हाल के वर्षों में राजशाही के लिए समय आसान नहीं रहा है। युवराज हैरी और युवराज एंड्रयू शाही कर्तव्यों से अलग हो चुके हैं, जबकि महाराजा चार्ल्स और भावी महारानी केट मिडलटन स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना कर चुके हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा दोनों नेताओं की छवि को मजबूत कर सकता है, हालांकि इससे नीतिगत बदलाव की संभावना कम है।

यह दौरा दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में राजशाही की उपयोगिता अब भी बनी हुई है। विश्लेषकों का मानना है कि इसी संदर्भ में डेनमार्क सरकार भी ग्रीनलैंड पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए महाराजा फ्रेडरिक एक्स और महारानी मैरी के दौरे पर विचार कर सकती है।

(द कन्वरसेशन) मनीषा अविनाश

अविनाश


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