बारूदी सुरंग और युद्ध के अवशेष गंभीर खतरा, समस्या के समाधान के लिए और प्रयास जरूरी
बारूदी सुरंग और युद्ध के अवशेष गंभीर खतरा, समस्या के समाधान के लिए और प्रयास जरूरी
(निकोल टाउनसेंड, यूनिसर्विटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स)
सिडनी, 28 अगस्त (द कन्वरसेशन) हाल के सप्ताहों में रिकॉर्ड गर्मी और सूखे के बीच यूरोप में जंगलों में लगी आग ने तबाही मचाई और फ्रांस, स्पेन तथा पुर्तगाल में तीन लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना पड़ा। यूरोप की कई नदियों में जलस्तर भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया।
इन घटनाओं ने पिछले युद्धों की एक घातक विरासत—बिना फटे बमों और अन्य विस्फोटक हथियारों—की ओर ध्यान खींचा है।
दक्षिणी फ्रांस में लगी आग के दौरान द्वितीय विश्व युद्ध के समय के फ्रांसीसी और जर्मन गोलों का एक ऐसा भंडार मिला जिसके बारे में पहले जानकारी नहीं थी। इसमें करीब 400 गोले थे। आग की गर्मी में ये गोले फट गए और लोगों के लौटने से पहले अधिकारियों को इलाके को खाली कराना पड़ा।
जलस्तर घटने के कारण नीदरलैंड, हंगरी और स्लोवाकिया में भी बिना फटे विस्फोटक हथियार सामने आए हैं।
यूरोप में लगी आग और सूखा इस लंबे समय से चली आ रही समस्या को नए सिरे से रेखांकित करते हैं लेकिन युद्ध के विस्फोटक अवशेष दुनियाभर में लाखों लोगों के लिए खतरा बने हुए हैं।
—– युद्ध के विस्फोटक अवशेष —–
प्रथम विश्व युद्ध के बाद से दुनिया में अनेक संघर्ष हुए हैं, जिन्होंने इलाकों को तबाह करने के साथ युद्ध क्षेत्रों में बिना फटे, छोड़े गए या अन्यथा त्यागे गए विस्फोटक हथियारों को पीछे छोड़ दिया।
इन्हें ‘एक्सप्लोसिव रिमनेंट्स ऑफ वॉर’ (ईआरडब्ल्यू) कहा जाता है। 2025 में अनुमानतः 60 देशों में करीब 10 करोड़ लोग इनके खतरे का सामना कर रहे थे।
ईआरडब्ल्यू में मुख्य रूप से दो तरह के हथियार शामिल हैं। पहला है ‘अनएक्सप्लोडेड ऑर्डनेंस’ (यूएक्सओ), यानी ऐसे विस्फोटक हथियार जो इस्तेमाल के समय नहीं फट सके। दूसरा है ‘एबैंडन्ड एक्सप्लोसिव ऑर्डनेंस’ (एएक्सओ), यानी संघर्ष समाप्त होने के बाद पीछे छोड़ दिए गए विस्फोटक हथियार।
बुडापेस्ट में मिला बम यूएक्सओ की श्रेणी में आएगा, जबकि गिरोंद में लगी आग के दौरान फटा विस्फोटक भंडार संभवतः एएक्सओ श्रेणी का था।
इन दोनों श्रेणियों में तोप के गोले, मोर्टार, हथगोले और विमानों से गिराए जाने वाले बड़े बम समेत विभिन्न प्रकार के हथियार शामिल हो सकते हैं।
बारूदी सुरंगें भी युद्ध से जुड़ा एक प्रमुख विस्फोटक खतरा हैं। कानूनी रूप से बारूदी सुरंगों को युद्ध के विस्फोटक अवशेष नहीं माना जाता, क्योंकि उन्हें संघर्ष के दौरान जानबूझकर बिछाया जाता है। हालांकि, दुनियाभर के संघर्षों में इनके व्यापक इस्तेमाल के कारण ये युद्ध से जुड़ा प्रमुख विस्फोटक खतरा हैं।
—– कौन से देश प्रभावित हैं? —–
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोपीय देशों ने युद्ध के दौरान बिछाई गई बारूदी सुरंगों को हटाने का काम तेजी से शुरू किया। अकेले नीदरलैंड में मई से नवंबर 1945 के बीच करीब 14 लाख सुरंगें हटाई गईं। डेनमार्क में जर्मन सेना ने लगभग इतनी ही संख्या में सुरंगें बिछाई थीं और 1945 के अंत तक वहां ज्ञात अधिकांश सुरंग क्षेत्रों को साफ कर दिया गया था।
2024 तक ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और डेनमार्क को बारूदी सुरंगों से मुक्ति के अभियान को पूरा कर चुके देशों के रूप में वर्गीकृत किया गया।
इसके बावजूद अक्टूबर 2025 तक दुनिया के कम से कम 57 देश और अन्य क्षेत्र मानव-विरोधी बारूदी सुरंगों से प्रभावित थे। इनमें से कई अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया में हैं।
बारूदी सुरंगों से सबसे अधिक प्रभावित देशों में अफगानिस्तान, बोस्निया और हर्जेगोविना, कंबोडिया, इथियोपिया, इराक, तुर्किये, यूक्रेन और पश्चिमी सहारा शामिल हैं।
इनमें से कुछ सुरंगें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बिछाई गई थीं। उत्तर अफ्रीका अभियान के दौरान अल्जीरिया, मिस्र, लीबिया, मोरक्को और ट्यूनीशिया में बड़ी संख्या में बारूदी सुरंगें बिछाई गई थीं।
बाद के संघर्षों में भी बड़े पैमाने पर बारूदी सुरंगें बिछाई गईं। उदाहरण के लिए, वियतनाम युद्ध के बाद देश का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा बारूदी सुरंगों से प्रभावित रह गया, जो तस्मानिया के आकार के बराबर क्षेत्र है। दशकों तक चले संघर्षों ने पड़ोसी कंबोडिया को भी बहुत प्रभावित किया, जबकि ईरान-इराक युद्ध के दौरान सीमा क्षेत्रों में लाखों बिना चिह्नित बारूदी सुरंगें बिछा दी गईं।
युद्ध के अवशेषों से प्रभावित देशों की सही संख्या बताना अधिक मुश्किल है, क्योंकि जहां कहीं भी संघर्ष हुआ हो, वहां ऐसे अवशेष मौजूद हो सकते हैं। कोई देश बारूदी सुरंगों से मुक्त घोषित हो सकता है, लेकिन फिर भी वहां युद्ध के अन्य विस्फोटक अवशेषों का खतरा बना रह सकता है।
केवल प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पश्चिमी मोर्चे पर 70 करोड़ से अधिक गोले और मोर्टार दागे गए थे। अनुमान है कि इनमें से करीब 14 करोड़ नहीं फटे। बेल्जियम और फ्रांस के किसान हर साल ऐसे और अन्य बिना फटे विस्फोटकों को नियमित रूप से खोजते और हटवाते हैं। इस प्रक्रिया को ‘आयरन हार्वेस्ट’ कहा जाता है।
ऑस्ट्रेलिया के आसपास भी द्वितीय विश्व युद्ध के अवशेष आज तक लोगों की जान ले रहे हैं और उन्हें घायल कर रहे हैं। सोलोमन द्वीप समूह में मोर्टार के गोले को रखते समय एक ऑस्ट्रेलियाई नागरिक की मौत हुई थी। हाल के वर्षों में डार्विन में भी कई बिना फटे विस्फोटक मिले हैं।
—– व्यापक प्रभाव —–
‘लैंडमाइन मॉनिटर’ के अनुसार, 2024 में बारूदी सुरंगों और युद्ध के अवशेषों के कारण 6,000 से अधिक लोग मारे गए या घायल हुए। इनमें ज्यादातर आम नागरिक थे और कम से कम 52 देशों में ऐसे मामले सामने आए।
बारूदी सुरंगों और युद्ध के अवशेषों का मुख्य खतरा उनके अचानक फटने से जुड़ा है, लेकिन इनसे पैदा होने वाला खतरा सुरक्षा और शारीरिक नुकसान तक सीमित नहीं है।
अध्ययनों से पता चला है कि इनकी मौजूदगी से खेती योग्य भूमि तक पहुंच सीमित हो सकती है, मिट्टी और पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है, खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता पर असर पड़ सकता है तथा आर्थिक विकास बाधित हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं और चरम मौसम इन जोखिमों को और बढ़ा रहे हैं। बाढ़ बारूदी सुरंगों और अन्य युद्ध अवशेषों को बहाकर दूसरी जगह पहुंचाने तथा उन्हें जमीन से बाहर निकालने का कारण बन सकती है, जबकि जंगलों में लगी आग से ये विस्फोटक अचानक फट सकते हैं।
यह केवल अतीत की समस्या नहीं है। यूक्रेन युद्ध जैसे मौजूदा संघर्षों में भी मानव-विरोधी बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल जारी है और कई यूरोपीय देशों ने इनके इस्तेमाल पर रोक लगाने वाली संधि से हटने का फैसला किया है।
कई देशों में सैन्य नेतृत्व वाले अभियान युद्ध के अवशेषों को हटाने के लिए काम कर रहे हैं, जिनमें प्रशांत द्वीप देश भी शामिल हैं। हालांकि, हाल की घटनाएं याद दिलाती हैं कि युद्ध के अवशेष और बारूदी सुरंगें आज भी गंभीर खतरा हैं और उनसे जुड़े व्यापक जोखिमों तथा चुनौतियों से निपटने के लिए एक समन्वित और व्यापक दृष्टिकोण की जरूरत है।
द कन्वरसेशन मनीषा नरेश
नरेश

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