अमेरिका के हटने पर भी नाटो रहेगा, लेकिन यह कैसा गठबंधन होगा?

अमेरिका के हटने पर भी नाटो रहेगा, लेकिन यह कैसा गठबंधन होगा?

अमेरिका के हटने पर भी नाटो रहेगा, लेकिन यह कैसा गठबंधन होगा?
Modified Date: May 20, 2026 / 04:21 pm IST
Published Date: May 20, 2026 4:21 pm IST

(गोराना ग्रिक, यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी के स्विस फेडरल इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ज्यूरिच में सेंटर फॉर सिक्योरिटी स्टडीज के ग्लोबल सिक्योरिटी विभाग की प्रमुख )

सिडनी, 20 मई (द कन्वरसेशन) नाटो का वार्षिक शिखर सम्मेलन जुलाई में तुर्किए में होना है, लेकिन इस समय यह गठबंधन अपने इतिहास की शायद सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है। भविष्य में अमेरिका की अनुपस्थिति या उसकी सुरक्षा गारंटियों के बिना नाटो का स्वरूप आखिर कैसा होगा ?

पिछले कुछ हफ्तों में ट्रंप प्रशासन ने ऐसे कई कदम उठाए हैं, जिन्हें यूरोप में इस रूप में देखा गया है कि ईरान युद्ध में अमेरिका का अधिक समर्थन न करने पर सहयोगियों से “बदला” लिया जा रहा है। इनमें जर्मनी से 5,000 अमेरिकी सैनिकों की वापसी, पोलैंड में 4,000 सैनिकों की तैनाती रोकना और स्पेन को गठबंधन से निलंबित करने पर विचार जैसी खबरें शामिल हैं।

यूरोप वाशिंगटन की रणनीतिक दिशा को लेकर पहले ही असहज है। नाटो सहयोगियों को लग रहा है कि अब यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए अधिक जिम्मेदारी खुद उठानी होगी और अमेरिका पर निर्भरता घटानी होगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का गठबंधनों के प्रति दृष्टिकोण लंबे समय से सीमित माना जाता रहा है, और अब उनके “नए नाटो” का दृष्टिकोण स्पष्ट होता दिख रहा है।

फरवरी में नाटो के रक्षा मंत्रियों की बैठक में अमेरिकी रक्षा नीति के उप सचिव एल्ब्रिज कोल्बी ने “नाटो 3.0” की अवधारणा प्रस्तुत की। इसके तहत यूरोप को पारंपरिक प्रतिरोध में कहीं अधिक भूमिका निभानी होगी, जबकि अमेरिका चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा पर ध्यान केंद्रित करेगा और यूरोपीय सुरक्षा में अधिक सीमित और दूरस्थ भूमिका निभाएगा।

व्हाइट हाउस पर यह भी आरोप है कि वह नाटो के दायरे को पहले की तुलना में सीमित करने और यूक्रेन तथा इंडो-पैसिफिक के चार साझेदार देशों—जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड—को जुलाई के शिखर सम्मेलन से बाहर रखने पर जोर दे रहा है।

यह अमेरिकी रणनीतिक सोच में एक बड़े बदलाव को दर्शाता है, जहां नाटो को अब उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के राजनीतिक समुदाय के बजाय एक सीमित सैन्य ढांचे के रूप में देखा जा रहा है, जिसकी उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि यूरोप कितना बोझ उठाता है और ट्रंप के एजेंडे के प्रति कितना अनुकूल रहता है।

इस नए दृष्टिकोण में अमेरिका अपने सहयोगियों से केवल अधिक खर्च करने की मांग नहीं कर रहा, बल्कि कम अमेरिकी सैन्य संसाधनों और कम सुरक्षा गारंटियों के साथ अधिक जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा कर रहा है।

इसके साथ ही एक गहरी समस्या यह भी है कि गठबंधन के भीतर विश्वास में गिरावट आई है, जिससे दशकों से चली आ रही नाटो की प्रतिरोध रणनीति कमजोर हो रही है। परिणामस्वरूप एक “यूरोपीयकृत नाटो” उभर रहा है, लेकिन यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि इसका वास्तविक स्वरूप क्या होगा।

एक बात निश्चित है कि अमेरिका की जगह कोई एक यूरोपीय देश अकेले नाटो का नेतृत्व नहीं कर सकता, क्योंकि किसी भी एक देश के पास पर्याप्त क्षमता, संसाधन या राजनीतिक वैधता नहीं है। इसलिए नेतृत्व प्रमुख यूरोपीय देशों के संयुक्त प्रयास से आगे बढ़ेगा।

यह प्रवृत्ति पहले से ही “यूरोप के मिनी-लेटरल दौर” में दिखाई दे रही है, जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी का ई3 समूह तथा इटली और पोलैंड को शामिल करने वाला ई5 गठबंधन शामिल है। ये समूह यूरोपीय सैन्य शक्तियों के बीच समन्वय को तेज कर रहे हैं।

ये ढांचे नाटो के विकल्प नहीं हैं, बल्कि वे साधन बन सकते हैं, जिनके जरिए नाटो के भीतर यूरोपीय नेतृत्व को संगठित किया जाएगा।

लेकिन यहीं से अनिश्चितताएं भी शुरू होती हैं। एक अधिक यूरोपीयकृत नाटो अनिवार्य रूप से अधिक एकजुट नाटो होगा, यह जरूरी नहीं है। गठबंधन पहले से ही 32 सदस्य देशों के बीच रणनीतिक मतभेदों से जूझ रहा है, और अमेरिकी नेतृत्व के पीछे हटने पर ये मतभेद और बढ़ सकते हैं।

ऐसे नाटो का प्रारंभिक फोकस संभवतः रूस के सैन्य आक्रमण और यूक्रेन युद्ध के खिलाफ सामूहिक रक्षा और प्रतिरोध पर अधिक होगा। शीत युद्ध के बाद संकट प्रबंधन, आतंकवाद-रोधी अभियान, ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा के साथ जो व्यापक एजेंडा विकसित हुआ था, वह पीछे जा सकता है।

हालांकि, दक्षिणी यूरोप के कई देश मानते हैं कि संकट प्रबंधन और साझेदारी नाटो के मूल कार्य बने रहने चाहिए, क्योंकि उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व से उत्पन्न अस्थिरता, प्रवासन दबाव और आतंकवाद उनके लिए गंभीर मुद्दे हैं।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साथ साझेदारी भी महत्वपूर्ण बनी हुई है, हालांकि अमेरिकी प्रशासन इसका समर्थन कम कर रहा है। जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड (आईपी4) के साथ सहयोग को एक महत्वपूर्ण ढांचा माना जा रहा है, खासकर रक्षा तकनीक, आपूर्ति श्रृंखला और रणनीतिक समन्वय के संदर्भ में।

“नया नाटो” अभी किसी स्थिर समझौते के रूप में मौजूद नहीं है। यह अलग-अलग दृष्टिकोणों, कमजोर राजनीतिक प्रतिबद्धताओं और अनसुलझे रणनीतिक प्रश्नों के बीच फंसा हुआ गठबंधन है।

यूरोप अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी अधिक लेने की दिशा में बढ़ रहा है, लेकिन अभी इस पर सहमति नहीं है कि “रणनीतिक स्वायत्तता” का वास्तविक अर्थ क्या होगा।

आज नाटो के सामने मूल प्रश्न यह नहीं है कि क्या यह गठबंधन बचेगा। वह निश्चित रूप से किसी न किसी रूप में बना रहेगा, क्योंकि नौकरशाही संस्थाएं बहुत टिकाऊ होती हैं।

असल सवाल यह है कि यह कैसा गठबंधन बनेगा और उसकी विश्वसनीयता कितनी रहेगी? क्या यह केवल रूस के खिलाफ सीमित सैन्य रक्षा तक सिमट जाएगा या फिर यूरोप की सभी प्रकार की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में सक्षम व्यापक राजनीतिक-सुरक्षा समुदाय बना रहेगा ?

द कन्वरसेशन

मनीषा दिलीप

दिलीप


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