नेपाल की विनाशकारी बाढ़ : 10 सेकंड का समय बचा सकता है जान

नेपाल की विनाशकारी बाढ़ : 10 सेकंड का समय बचा सकता है जान

नेपाल की विनाशकारी बाढ़ : 10 सेकंड का समय बचा सकता है जान
Modified Date: August 31, 2026 / 04:25 pm IST
Published Date: August 31, 2026 4:25 pm IST

(निरंजन शिवकोटी, आरएमआईटी यूनिवर्सिटी )

सिडनी, 31 अगस्त (द कन्वरसेशन) छब्बीस अगस्त को सुबह करीब 8:45 बजे नेपाल के रसुवा सीमा शुल्क कार्यालय में सीमा शुल्क एवं सूचना अधिकारी करबीर गैरे को अचानक भूकंप जैसा महसूस हुआ। वह बाहर निकले और धूल के गुबार के साथ आती एक विशाल बाढ़ को देखा। वह चीख उठे, ‘‘बाढ़ आ रही है, भागो!’’

गैरे और अन्य लोग तुरंत ऊंचाई की ओर भागे। करीब 10 सेकंड बाद कीचड़ भरा पानी उनके आसपास की संरचनाओं को बहा ले गया।

गैरे ने बाद में स्थानीय मीडिया संस्थान ‘रतोपाटी’ को बताया कि वे 10 सेकंड निर्णायक साबित हुए। खतरे को भांपकर ऊंचाई की ओर भागने वाले लोग बच गए, जबकि देरी करने या दूसरी दिशा में भागने वाले लोग बाढ़ की चपेट में आ गए या लापता हो गए।

उनका अनुभव एक अहम बात को रेखांकित करता है–चेतावनी तभी जान बचा सकती है, जब वह लोगों को तत्काल कार्रवाई के लिए प्रेरित करे।

ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले नेपाली समुदाय के लिए यह आपदा निजी त्रासदी है। ऑस्ट्रेलिया में बसे परिवार और मित्र नेपाल में अपने प्रियजनों की खबर का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

तबाही से आगे यह आपदा एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती है– क्या लोगों को बाढ़ की चेतावनी मिलते ही तत्काल कार्रवाई करने का प्रशिक्षण दिया जाए तो जानें बचाई जा सकती हैं?

मेरा मानना है कि इसका जवाब हां है।

—– नेपाल में आपदा —–

छब्बीस अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ नेपाल-चीन सीमा के पास ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में शुरू हुई और भोटेकोशी तथा त्रिशूली-नारायणी नदी तंत्र में पानी का सैलाब आ गया। सैकड़ों लोगों की मौत हुई है और बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं।

इस आपदा को केवल चेतावनी व्यवस्था की विफलता के रूप में देखना उचित नहीं होगा। नेपाल में बाढ़ का पूर्वानुमान और शुरुआती चेतावनी देने की एक स्थापित व्यवस्था है, जिसमें जलस्तर की निगरानी और मोबाइल फोन पर अलर्ट शामिल हैं।

मीडिया में प्रकाशित नेपाल के बाढ़ पूर्वानुमान प्रभाग की प्रारंभिक तकनीकी रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों को सुबह करीब नौ बजे सूचना मिली कि तिब्बत की ओर से भोटेकोशी नदी में बाढ़ आ गई है। इसके बाद सुबह 9:15 से 9:16 बजे के बीच रसुवा, नुवाकोट, धादिंग और चितवन के संवेदनशील समुदायों को करीब छह लाख शुरुआती चेतावनी वाले एसएमएस भेजे गए।

प्रभाग के अनुसार, समय पर चेतावनी प्रसारित किए जाने से कई लोग सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने में सफल रहे।

इसलिए सबक यह नहीं है कि शुरुआती चेतावनी बेकार है। सबक यह है कि शुरुआती चेतावनी को समय रहते कार्रवाई से जोड़ना जरूरी है। उदाहरण के लिए, लोगों को यह स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि ‘‘खाली करना’’ या ‘‘सुरक्षित स्थान पर जाना’’ वास्तव में क्या मायने रखता है।

—– आपात स्थिति में लोग कैसे प्रतिक्रिया देते हैं? —–

आपात स्थिति में लोगों के निकासी व्यवहार पर मेरे शोध से इस संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। एक अध्ययन में हमने मेलबर्न में 1,134 रेलयात्रियों से आपात स्थिति में निकासी के दौरान उनकी संभावित प्रतिक्रिया के बारे में पूछा। हमने पाया कि यात्री सक्रिय कदम उठाने के बजाय प्रतिक्रिया देने की अधिक प्रवृत्ति रखते हैं।

मसलन, वे खुद तुरंत निकास की ओर बढ़ने के बजाय स्टेशन कर्मचारियों के निर्देश का इंतजार करते थे। वे यह भी देखते थे कि दूसरे यात्री क्या कर रहे हैं और उसी का अनुसरण करते थे।

दूसरे अध्ययन में हमने मेलबर्न हवाई अड्डे के 500 और चीन के चिंगदाओ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के 450 यात्रियों सहित कुल 950 यात्रियों से आपात स्थिति में उनके व्यवहार के बारे में पूछा।

महत्वपूर्ण रूप से, हमने पाया कि लोग आपात स्थिति से निपटने की अपनी क्षमता के बारे में जैसा महसूस करते हैं, उसका संबंध सुरक्षित तरीके से वहां से निकलने की उनकी धारणा से था।

हालांकि हमारे अध्ययन परिवहन क्षेत्र की आपात स्थितियों से संबंधित थे, लेकिन इनके सबक बाढ़ के मामले में भी प्रासंगिक हैं। आपदा शुरू होने के बाद लोगों को पहली बार यह तय करने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए कि क्या करना है।

उन्हें पहले से पता होना चाहिए कि कब निकलना है, कहां जाना है और सुरक्षित स्थान तक कैसे पहुंचना है। इससे स्पष्ट होता है कि आपात स्थिति आने से पहले ही लोगों को तैयार करने की जरूरत है।

बाढ़ से निपटने के लिए लोगों को सरल और पहले से अभ्यास की गई प्रतिक्रिया के लिए तैयार किया जाना चाहिए। जब अत्यधिक बाढ़ की चेतावनी जारी हो, तो संवेदनशील इलाकों में रहने वाले लोगों को स्थानीय निकासी प्रक्रिया पहले से पता होनी चाहिए।

उन्हें नदी के आसपास के क्षेत्र से निकलकर ऊंचे स्थानों तक पहुंचने का रास्ता मालूम होना चाहिए। उन्हें पानी को अपनी आंखों से देखने का इंतजार नहीं करना चाहिए, सामान लेने के लिए वापस नहीं लौटना चाहिए और न ही वाहन बचाने की कोशिश करनी चाहिए।

—– तकनीक जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं —–

नेपाल को बाढ़ और बारिश की निगरानी, मोबाइल अलर्ट और सामुदायिक चेतावनी प्रणालियों में लगातार निवेश करने की जरूरत है।

लेकिन निगरानी के लिए मौजूद भौतिक ढांचा भी जोखिम में है। खबरों के अनुसार, नेपाल में चार स्वचालित जल निगरानी केंद्र बाढ़ में बह गए। ऐसे में वैकल्पिक सेंसर, उपग्रह, कैमरे, सायरन, रेडियो, सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणालियों और प्रशिक्षित स्थानीय नेटवर्क के जरिये भी चेतावनी जारी करने की व्यवस्था होनी चाहिए।

नेपाल के पास समुदाय-आधारित बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणालियों का पहले से अनुभव है, जिसमें निगरानी, संचार और सामुदायिक तैयारी को एक साथ जोड़ा जाता है। इन प्रणालियों में बढ़ते जलस्तर का लगभग वास्तविक समय में पता लगाया जा सकता है और चेतावनी की सूचना प्रशिक्षित स्थानीय कर्मियों तक पहुंचाई जाती है। ये कर्मी एसएमएस, मोबाइल फोन और सायरन जैसे माध्यमों से निचले इलाकों में रहने वाले संवेदनशील समुदायों और संबंधित अधिकारियों तक सूचना पहुंचाते हैं।

चेतावनी को कार्रवाई में बदलने में शिक्षा की निर्णायक भूमिका होती है।

—– पुनर्वास में लगेंगे कई वर्ष —–

फिलहाल प्राथमिकता उनलोगों को बचाना है जिन्हें बचाया जा सकता है। लापता लोगों का पता लगाना, घायलों का उपचार करना और भोजन तथा चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना भी प्राथमिकता है।

लेकिन पुनर्वास तत्काल बचाव अभियान से कहीं आगे तक चलेगा। घरों, सड़कों, पुलों, स्कूलों और लोगों की आजीविका को फिर से स्थापित करना होगा। बचे हुए लोगों को लंबे समय तक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सहायता की आवश्यकता हो सकती है।

इसलिए पुनर्निर्माण का लक्ष्य केवल नष्ट हुई चीजों को फिर से खड़ा करना नहीं होना चाहिए, बल्कि पहले से अधिक सुरक्षित व्यवस्था तैयार करना होना चाहिए। इसके लिए मजबूत बुनियादी ढांचा, लचीले संचार नेटवर्क, बेहतर निकासी मार्ग और अधिक तैयार समुदाय जरूरी होंगे।

नेपाल की बाढ़ की त्रासदी हमें याद दिलाती है कि हर चरम प्राकृतिक घटना को रोका नहीं जा सकता, लेकिन लोगों के जीवित बचने की संभावना बेहतर की जा सकती है।

एक प्रभावी शुरुआती चेतावनी प्रणाली को केवल इस आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए कि उसने कितनी चेतावनियां भेजीं, बल्कि इस आधार पर भी कि लोग उन्हें कितना समझते हैं और समय रहते उसपर कार्रवाई करते हैं।

एक जीवित बचे व्यक्ति के अनुभव से पता चलता है कि कभी-कभी केवल 10 सेकंड जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन सकते हैं।

जिन लोगों ने अपनी जान गंवाई और जिन परिवारों को अब भी अपने प्रियजनों का इंतजार है, उनके प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं और प्रार्थनाएं हैं। इस त्रासदी में जान गंवाने वालों को सबसे सार्थक श्रद्धांजलि यही होगी कि हम इससे सबक लें और अधिक सुरक्षित तथा बेहतर ढंग से तैयार भविष्य का निर्माण करें।

द कन्वरसेशन

मनीषा सुरेश

सुरेश


लेखक के बारे में