100 साल तक छिपी रही कोआला की नई जीवाश्म प्रजाति का पता चला
100 साल तक छिपी रही कोआला की नई जीवाश्म प्रजाति का पता चला
( केनी ट्रेवौइलॉन – कर्टिन यूनिवर्सिटी, हेलेन रेयान – वेस्टर्न ऑस्ट्रेलियन म्यूजियम, कैलाह थॉर्न और नताली वारबर्टन – मर्डोक यूनिवर्सिटी )
सिडनी, छह मई (द कन्वरसेशन) वर्ष 2024 में वेस्टर्न ऑस्ट्रेलियन म्यूजियम को मार्गरेट रिवर की मूनडाइन गुफा से अन्वेषक लिंडसे हैचर द्वारा खोजा गया कोआला की खोपड़ी का एक नमूना दिया गया। इस खोपड़ी में कुछ असामान्य था, जिसे शोधकर्ताओं ने पहचान लिया।
इस कोआला की खोपड़ी पर गड्ढेनुमा निशान थे।
कोआला ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर प्रमुख रूप से पाए जाते हैं, लेकिन वर्तमान में पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में लगभग विलुप्त हैं। हालांकि जीवाश्म साक्ष्य बताते हैं कि कोआला कभी पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों में रहते थे, जिनमें मार्गरेट रिवर से लेकर उत्तर में यानचेप और पूर्व में मदुरा तक के क्षेत्र शामिल हैं।
रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस में आज प्रकाशित एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बताया कि पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के ये कोआला आधुनिक कोआला की भटकी हुई आबादी नहीं थे, बल्कि एक अलग प्रजाति थे, जिसके बारे में एक सदी से अधिक समय तक किसी को पता नहीं चला।
ज्ञात कोआला से अलग
पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में कोआला के जीवाश्म पहली बार 1910 में मार्गरेट रिवर के पास मैमथ गुफा में मिले थे। हालांकि लगभग एक सदी तक अधिकतर नमूने केवल अलग-अलग जबड़ों और दांतों तक सीमित रहे।
पिछले 25 वर्षों में राज्य की दक्षिण-पश्चिम की गुफाओं से दो पूर्ण वयस्क खोपड़ियां मिलीं। इनके साथ विभिन्न गुफा स्थलों से प्राप्त जबड़े, दांत और अंगों की हड्डियों ने वैज्ञानिकों को यह जांचने का अवसर दिया कि क्या ये जीवाश्म आधुनिक कोआला की ही प्रजाति से संबंधित हैं? विस्तृत माप, तुलनात्मक शरीर रचना और विकासवादी विश्लेषण से पता चला कि ये जीवाश्म आधुनिक कोआला से भिन्न हैं।
इस नई प्रजाति की सबसे प्रमुख विशेषता आंख के नीचे ऊपरी जबड़े के गाल के हिस्से में गहरा, गोल खांचा है। यह विशेषता जीवित कोआला में नहीं पाई जाती। इसी आधार पर इस नई प्रजाति का नाम ‘फास्कोलार्क्टोस सल्कोमैक्सिलियारिस’ रखा गया, जिसका अर्थ है ‘खांचे वाली मैक्सिला (गाल की हड्डी)’।
इस प्रजाति की खोपड़ी अपेक्षाकृत छोटी और मजबूत थी, कान के पास की हड्डियों में अंतर था और दांत सामान्यतः चौड़े थे। यह खांचा संभवतः बड़े मांसपेशियों के लिए जगह बनाता था, जिससे ऊपरी होंठ अधिक गतिशील हो सकता था और कठोर पत्तियों को खाने में मदद मिलती होगी।
इसके अलावा, कंकाल की हड्डियां अधिक लंबी और पतली थीं, जिससे संकेत मिलता है कि यह कोआला अपेक्षाकृत पतला था।
गुफाओं में खोज
लिंडसे हैचर के परिवार द्वारा दान किए गए नमूनों से इस अध्ययन की शुरुआत हुई। इसके बाद शोधकर्ता यह पता लगाने के लिए गुफाओं में गए कि ये जीवाश्म वास्तव में कहां से आए और उनकी आयु क्या है।
स्थानीय गुफा शोध समूह की सहायता से वैज्ञानिकों ने यानचेप की कोआला गुफा और मार्गरेट रिवर के पास मूनडाइन तथा फाउंडेशन गुफाओं का पुनः दौरा किया।
यूरेनियम-थोरियम और रेडियोकार्बन डेटिंग से पता चला कि यह प्रजाति लगभग 28,000 वर्ष पहले विलुप्त हो गई थी। उस समय जलवायु ठंडी और शुष्क हो गई थी, जिससे दक्षिण-पश्चिम के यूकेलिप्टस वन लगभग 10,000 वर्षों तक सिकुड़ गए।
कोआला अत्यधिक भोजन करने के लिए जाने जाते हैं, इसलिए जब उनके आवास और भोजन के स्रोत कम हुए, तो इस प्रजाति का विलुप्त होना लगभग निश्चित था।
कोआला के इतिहास में बदलाव
यह खोज दो कारणों से महत्वपूर्ण है।
पहला, यह कोआला के इतिहास को नया रूप देती है। हाल के अतीत में कोआला की केवल एक ही नहीं, बल्कि कई प्रजातियां मौजूद थीं और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की अपनी विशिष्ट प्रजाति थी।
अब यह ज्ञात है कि पिछले कुछ हजार वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में कोआला की चार प्रजातियां रही हैं, जिनमें वर्तमान में पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में पाई जाने वाली ‘फास्कोलार्क्टोस सिनेरेउस’ भी शामिल है। इनमें से एक प्रजाति ‘फास्कोलार्क्टोस स्टिर्टोनी’ प्लाइस्टोसीन काल की विशालकाय कोआला की थी, जिसका आकार आधुनिक कोआला से लगभग दोगुना था।
दूसरा, यह खोज इस बात की याद दिलाती है कि कोआला वनों पर अत्यधिक निर्भर हैं। जब वन तेजी से घटते हैं, तो अनुकूलनशील स्तनधारी भी पूरे क्षेत्रों से गायब हो सकते हैं।
बढ़ते तापमान और सूखे के दौर में, अतीत के जलवायु परिवर्तन को समझना वर्तमान में बचे कोआला के लिए जोखिम का आकलन करने में मदद करता है।
पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के कोआला की कहानी वर्तमान जीवित कोआला प्रजाति की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है। भविष्य में कोआला के अस्तित्व के लिए पूर्वी यूकेलिप्टस वनों को जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई से बचाना अत्यंत आवश्यक है।
द कन्वरसेशन मनीषा वैभव
वैभव

Facebook


