वन्यजीव तस्करी को रोकने में नयी प्रौद्योगिकियां बन रहीं मजबूत हथियार

वन्यजीव तस्करी को रोकने में नयी प्रौद्योगिकियां बन रहीं मजबूत हथियार

वन्यजीव तस्करी को रोकने में नयी प्रौद्योगिकियां बन रहीं मजबूत हथियार
Modified Date: February 9, 2026 / 11:10 am IST
Published Date: February 9, 2026 11:10 am IST

( ईव बोहनेट, फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी )

तलाहस्सी, नौ फरवरी (द कन्वरसेशन) दुनिया के सबसे लाभदायक और अरबों डॉलर के अवैध कारोबारों में से एक वन्यजीव तस्करी को रोकने में नयी और उभरती प्रौद्योगिकियां, खास तौर पर कृत्रिम मेधा (एआई), डेटा विश्लेषण और पोर्टेबल जांच उपकरण वैश्विक स्तर पर अहम भूमिका निभा रहे हैं।

इंटरपोल ने इन प्रौद्योगिकियों की मदद से 2025 के आखिर में 134 देशों में एक समन्वित अभियान चलाया, जिसके तहत करीब 30,000 जीवित जानवर बरामद किए गए, अवैध पौधों और लकड़ी से जुड़े उत्पादों को कब्जे में लिया गया और लगभग 1,100 संदिग्ध तस्करों की पहचान की गई।

वन्यजीव तस्करी दुनिया के सबसे लाभदायक अवैध कारोबारों में से एक है। ‘ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी’ संस्था के अनुसार, इससे हर साल सात से 23 अरब अमेरिकी डॉलर तक की कमाई होती है। इसमें जीवित जानवरों, दुर्लभ जानवरों, और वनस्पतियों, पौधों के पाउडर और तेल, हाथीदांत की नक्काशी, पशुओं के अंग और संगीत वाद्ययंत्रों जैसी वस्तुओं का व्यापार शामिल है।

अब तक प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाई अधिकतर प्रतिक्रियात्मक रही है। वैश्विक व्यापार की विशालता के कारण 10 में से बमुश्किल एक अंतरराष्ट्रीय मालवाहक खेप की जांच हो पाती है। तस्कर पहचान से बचने के लिए प्रजातियों के गलत या सामान्य नामों का इस्तेमाल करते हैं, ऑनलाइन कोड भाषा अपनाते हैं, खेप के मार्ग बदलते हैं और दबाव बढ़ने पर नए डिजिटल मंचों पर स्थानांतरित हो जाते हैं। तस्करों का पूरा नेटवर्क होता है जो तस्करी के लिए नए-नए तरीके अपनाता है।

इस चुनौती से निपटने में डिजिटल उपकरण अहम भूमिका निभा रहे हैं। वन्यजीव और वनस्पति की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर संधि (सीआईटीईएस) से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, एआई, डेटा विश्लेषण और पोर्टेबल जांच उपकरण प्रवर्तन एजेंसियों को अधिक प्रभावी बना रहे हैं।

माल की जांच के लिए उन्नत एक्स-रे स्कैनरों को सॉफ्टवेयर के साथ जोड़ा जा रहा है, जो पैकेजों के भीतर असामान्य आकृतियों या सामग्रियों को चिह्नित करता है। ऑस्ट्रेलिया के बंदरगाहों और डाक केंद्रों में किए गए परीक्षणों में विभिन्न खेपों में छिपाए गए जानवरों का पता चला है।

प्रजातियों की पहचान के लिए एआई आधारित सॉफ्टवेयर भी विकसित किए गए हैं। चीनी विज्ञान अकादमी के सहयोग से तैयार एक प्रणाली निरीक्षकों को चैटबॉट जैसे इंटरफेस के जरिए जानवरों या उनके अंगों की पहचान करने में मदद करती है। इससे मिलती-जुलती प्रजातियों के बीच अंतर करना आसान होता है, जिनकी कानूनी सुरक्षा अलग-अलग हो सकती है।

मैदानी स्तर पर त्वरित जांच के लिए पोर्टेबल डीएनए किट भी सामने आ रहे हैं। ये छोटे उपकरण 20 से 30 मिनट में कई प्रजातियों की पहचान कर सकते हैं और पारंपरिक प्रयोगशालाओं पर निर्भरता कम करते हैं। इसी तरह, हैंडहेल्ड स्कैनर लकड़ी की आंतरिक संरचना के आधार पर उसकी प्रजाति पहचानने में मदद करते हैं, जिससे अवैध कटाई पर अंकुश लगाया जा सकता है।

इसके अलावा, विभिन्न देशों के जटिल वन्यजीव व्यापार कानूनों को एक मंच पर लाने वाले डिजिटल टूल भी विकसित हो रहे हैं। शोधकर्ता व्यापार आंकड़ों के जरिए उन प्रजातियों की पहचान कर रहे हैं, जिन्हें कड़े अंतरराष्ट्रीय संरक्षण की जरूरत है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ये तकनीकें मानव विशेषज्ञता का विकल्प नहीं, बल्कि उसे और प्रभावी बनाती हैं। कोई एक उपाय वन्यजीव तस्करी को खत्म नहीं कर सकता, लेकिन तकनीक आधारित ये प्रयास प्रवर्तन एजेंसियों को अधिक सक्रिय, समन्वित और सक्षम बना रहे हैं।

द कन्वरसेशन

मनीषा गोला

गोला


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