दर्द का आकलन ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ की तरह नहीं किया जा सकता, वैज्ञानिकों ने बताई वजह

दर्द का आकलन ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ की तरह नहीं किया जा सकता, वैज्ञानिकों ने बताई वजह

दर्द का आकलन ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ की तरह नहीं किया जा सकता, वैज्ञानिकों ने बताई वजह
Modified Date: June 4, 2026 / 12:31 pm IST
Published Date: June 4, 2026 12:31 pm IST

( जॉन वोलेर्ट, यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर )

लंदन, चार जून (द कन्वरसेशन) आधुनिक मस्तिष्क स्कैनिंग तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते उपयोग के बीच वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि किसी व्यक्ति के दर्द का आकलन ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ (झूठ पकड़ने वाली मशीन से जांच) की तरह नहीं किया जा सकता, क्योंकि दर्द एक व्यक्तिगत अनुभव है जिसे केवल तकनीकी संकेतों के आधार पर प्रमाणित या खारिज नहीं किया जा सकता।

वैज्ञानिकों का कहना है कि पुराना या दीर्घकालिक दर्द अक्सर दिखाई नहीं देता, लेकिन इसका असर व्यक्ति के जीवन पर गहरा पड़ता है। इससे कामकाज, सामाजिक जीवन और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। ऐसे में बीमा दावों, मुआवजे, सरकारी सहायता और रोजगार से जुड़े मामलों में दर्द को मान्यता मिलना कई लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

इसी संदर्भ में वर्ष 2006 का एक चर्चित मामला अक्सर उद्धृत किया जाता है। कार्ल कोच नामक व्यक्ति ने कार्यस्थल पर हुए एक हादसे में गंभीर रूप से झुलसने के बाद अपने नियोक्ता के खिलाफ हर्जाने का मुकदमा दायर किया था। दुर्घटना के बाद वह लगातार दर्द से पीड़ित था, लेकिन नियोक्ता ने उस पर दर्द का बहाना बनाने का आरोप लगाया।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने एक तंत्रिका वैज्ञानिक को विशेषज्ञ गवाह के रूप में स्वीकार किया। वैज्ञानिक ने दावा किया कि मस्तिष्क स्कैन में कोच के दर्द के संकेत दिखाई दे रहे हैं। इसके बाद मामला उस राशि से दस गुना अधिक पर सुलझा, जितनी राशि नियोक्ता पहले देने को तैयार था।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह निष्कर्ष वैज्ञानिक रूप से उतना स्पष्ट नहीं है जितना प्रतीत होता है। उनका तर्क है कि यदि कोई विशेषज्ञ यह दावा कर सकता है कि स्कैन में दर्द दिखाई दे रहा है, तो वही तकनीक किसी दूसरे मामले में यह भी निष्कर्ष निकाल सकती है कि व्यक्ति दर्द का नाटक कर रहा है। यही स्थिति इस तकनीक को विवादास्पद बनाती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, पुराना दर्द उन चिकित्सीय स्थितियों में से एक है जिन पर अक्सर संदेह किया जाता है। दर्द से पीड़ित लोगों के अनुभव बताते हैं कि कई बार उनके परिवार, मित्र, नियोक्ता और यहां तक कि चिकित्सक भी उनके दर्द को गंभीरता से नहीं लेते।

शोध से यह भी सामने आया है कि महिलाओं, अल्पसंख्यक समुदायों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और कम शिक्षित लोगों के दर्द को अपेक्षाकृत कम विश्वसनीय माना जाता है। विडंबना यह है कि यही समूह अक्सर दीर्घकालिक दर्द से अधिक प्रभावित भी होते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक मस्तिष्क स्कैनर और एआई तकनीक ने कुछ शोधकर्ताओं को ऐसे उपकरण विकसित करने के लिए प्रेरित किया है जो दर्द का पता लगाने वाले ‘लाई डिटेक्टर’ की तरह काम कर सकें। हाल के वर्षों में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिकाओं ‘नेचर न्यूरोसाइंस’ और ‘नेचर मेडिसिन’ में प्रकाशित कुछ अध्ययनों ने ऐसी संभावनाओं की ओर संकेत भी किया था।

अमेरिका में कुछ स्वास्थ्य प्रणालियों में एआई आधारित मॉडल का उपयोग यह तय करने के लिए किया जा रहा है कि किन मरीजों को दर्द निवारक ओपिओइड दवाएं दी जानी चाहिए और किन मामलों में नशे की लत की आशंका अधिक है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मॉडल कई बार पक्षपातपूर्ण निष्कर्ष देते हैं और सामाजिक पूर्वाग्रहों को भी दोहरा सकते हैं।

प्रौद्योगिकी पत्रिका ‘वायर्ड’ की एक रिपोर्ट में ऐसे ही कुछ एआई सिस्टम की खामियों का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, ये प्रणालियां कई बार उन्हीं समूहों के प्रति अधिक संदेहपूर्ण रवैया अपनाती हैं जिन्हें पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि एआई की सबसे बड़ी सीमाओं में से एक यह है कि वह कई बार किसी निष्कर्ष तक पहुंच तो जाता है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि उसने वह निष्कर्ष किस आधार पर निकाला। ऐसे में उसके निर्णयों की विश्वसनीयता का मूल्यांकन करना कठिन हो जाता है।

विशेषज्ञों ने दर्द की तुलना पारंपरिक लाई डिटेक्टर परीक्षणों से करते हुए कहा कि लाई डिटेक्टर वास्तव में झूठ नहीं पकड़ते, बल्कि व्यक्ति की शारीरिक प्रतिक्रिया और तनाव के स्तर को मापते हैं। कोई व्यक्ति सच बोलते हुए भी घबराया हुआ हो तो मशीन उसे संदिग्ध मान सकती है।

इसी तरह दर्द से जुड़े मस्तिष्क संकेत भी केवल दर्द को नहीं, बल्कि तनाव, चिंता, भय और भावनात्मक परेशानी को भी दर्शा सकते हैं। इसलिए यह तय करना मुश्किल है कि स्कैन में दिखाई देने वाला संकेत वास्तव में दर्द का है या उससे जुड़ी किसी अन्य मानसिक स्थिति का।

वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रयोगशाला में विकसित की गई प्रणालियां अक्सर नियंत्रित परिस्थितियों में काम करती हैं, जहां प्रतिभागी स्वेच्छा से अध्ययन में शामिल होते हैं। लेकिन वास्तविक जीवन में स्थिति बिल्कुल अलग होती है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को यह भय हो कि स्कैन में उसका दर्द प्रमाणित नहीं हुआ तो उसे मुआवजा, बीमा लाभ या सरकारी सहायता नहीं मिलेगी, तो उसकी मानसिक स्थिति स्वाभाविक रूप से तनावपूर्ण होगी। ऐसे में मस्तिष्क की गतिविधियों को केवल दर्द का संकेत मानना भ्रामक हो सकता है।

विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया कि दर्द एक अत्यंत निजी अनुभव है, जो व्यक्ति के जीवन अनुभव, संस्कृति, मानसिक स्थिति और परिस्थितियों से प्रभावित होता है। एक ही चोट या बीमारी अलग-अलग लोगों में अलग-अलग स्तर का दर्द पैदा कर सकती है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि तीखा भोजन खाने से होने वाली जलन भी तकनीकी रूप से दर्द का एक रूप है, लेकिन बहुत से लोग इसे आनंददायक अनुभव मानते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि दर्द केवल जैविक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और सामाजिक अनुभव भी है।

इन्हीं कारणों से ‘दर्द के अध्ययन के लिए अंतरराष्ट्रीय संघ’ ने स्पष्ट रूप से कहा है कि दर्द का पता लगाने वाले तथाकथित ‘लाई डिटेक्टर’ विश्वसनीय नहीं हैं। हाल में प्रकाशित एक शोध लेख में वैज्ञानिकों ने तकनीकी और वैचारिक दोनों स्तरों पर मौजूद समस्याओं का उल्लेख करते हुए शोध समुदाय से इस दिशा में आगे बढ़ने के बजाय अधिक व्यावहारिक और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं, बीमा प्रणाली और न्यायिक प्रक्रियाओं में तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन उसे अंतिम सत्य नहीं माना जाना चाहिए। उनका कहना है कि मशीनें भी गलतियां कर सकती हैं और उनमें मौजूद एल्गोरिद्म समाज में पहले से मौजूद पूर्वाग्रहों को और मजबूत कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने पुराने दर्द के बारे में बताता है तो उसकी बात को गंभीरता से सुनना और उसके अनुभव का सम्मान करना अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि हर दर्द आंखों से दिखाई नहीं देता।

वैज्ञानिकों के अनुसार, मस्तिष्क स्कैन यह तय नहीं कर सकता कि कौन व्यक्ति वास्तव में पीड़ित है और कौन झूठ बोल रहा है। लेकिन यह बहस जरूर दिखाती है कि समाज कई बार तकनीकी आत्मविश्वास को सत्य मान बैठता है। चिकित्सा, बीमा और न्याय व्यवस्था में ऐसी सोच उन लोगों के लिए और अधिक कठिनाइयां पैदा कर सकती है जो पहले से ही अदृश्य दर्द के साथ जीवन गुजार रहे हैं।

द कन्वरसेशन मनीषा वैभव

वैभव


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