घबराहट में खरीदारी करने से स्थिति और खराब हो जाती है

घबराहट में खरीदारी करने से स्थिति और खराब हो जाती है

घबराहट में खरीदारी करने से स्थिति और खराब हो जाती है
Modified Date: March 11, 2026 / 04:52 pm IST
Published Date: March 11, 2026 4:52 pm IST

(जैकब कीच, ग्रिफ़िथ यूनिवर्सिटी और करीना रून, यूनिवर्सिटी ऑफ़ द सनशाइन कोस्ट)

गोल्ड कोस्ट (ऑस्ट्रेलिया), 11 मार्च (द कन्वरसेशन) क्या आप हाल ही में किसी पेट्रोल स्टेशन पर गए हैं? हो सकता है आपको झटका लगा हो – और सिर्फ़ इसलिए नहीं कि ‘डिस्प्ले’ पर कीमत शायद 2 आस्ट्रेलियाई डालर प्रति लीटर से ज़्यादा थी।

जब दुनिया दशकों में सबसे गंभीर ऊर्जा संकट में से एक से जूझ रही है, तो ऑस्ट्रेलियाई हज़ारों की संख्या में पेट्रोल पंपों पर जमा हो रहे हैं, कारों, ट्रेलर-माउंटेड फ्यूल टैंक और यहां तक कि जेरी कैन में भी पेट्रोल भरवा रहे हैं। इसके जवाब में, कुछ स्टेशनों ने पेट्रोल एवं अन्य ईंधन की ‘राशनिंग’ शुरू कर दी है और पंप बंद कर दिए हैं।

लेकिन कई ऑस्ट्रेलियाई लोगों को एक बेचैनी जैसा महसूस हो रहा होगा। 2020 की शुरुआत में, जब कोविड महामारी ने विश्व आपूर्ति श्रंखला को प्रभावित किया था तो उपभोक्ता पास्ता से लेकर टॉयलेट पेपर तक ज़रूरी चीज़ों को संग्रह करने के लिए दौड़ पड़े, जिससे दुनिया भर में दुकानें खाली हो गईं। जैसे-जैसे महामारी जारी रही, घबराहट में खरीदारी की और लहरें आईं, जबकि व्यापार प्रतिष्ठान और सरकार बार-बार लोगों से ऐसा न करने की अपील कर रहे थे।

तो, कुछ लोग संग्रह करने के लिए क्यों दौड़ पड़ते हैं, और उन्हें ऐसा न करने के लिए कहने का कोई असर नहीं होता । हमारे पिछली शोध में इन सवालों पर विस्तार से गौर किया गया। ऐसा करने से लोगों को रोकने के लिए, हमें उन्हें एक प्रभावी संदेश देना होगा।

घबराहट में खरीदारी कौन करता है – और क्यों?

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घबराहट में की गयी खरीदारी से किसी को मदद नहीं मिलती। जब कई लोग एक साथ ऐसा करते हैं, तो मांग में अचानक तेज़ बढ़ोतरी से नई आपूर्ति श्रंखला की समस्या पैदा होती हैं जो वरना होती ही नहीं।

2020 में, लॉकडाउन की वजह से घबराहट में की गयी खरीदारी के बाद, हमने लगभग 800 ऑस्ट्रेलियाई लोगों का सर्वे किया ताकि यह समझने की कोशिश की जा सके कि इसके पीछे कौन से मनोवैज्ञानिक कारण हैं।

हमने तीन मुख्य श्रेणियां देखीं: देर तक चलने वाले भोज्य पदार्थ (जैसे कैन्ड फ़ूड), क्लीनिंग प्रोडक्ट्स, और हाइजीन प्रोडक्ट्स (टॉयलेट पेपर सहित)।

हमारी रिसर्च ने अच्छी तरह से स्थापित साइकोलॉजिकल थ्योरीज़ पर ध्यान दिया जो बताती हैं कि दुनिया के बारे में हमारी सोच और अंदरूनी विश्वास हमारे काम करने के तरीके पर कैसे असर डालते हैं। हमने क्या पाया।

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तीनों उत्पाद श्रेणी में, हमने पाया कि लोगों का नज़रिया और खतरे की सोच इस बात से जुड़ी थी कि उन्होंने कितना खरीदा।

सीधे शब्दों में कहें तो, जब लोगों को लगता था कि संग्रह करना समझदारी है तो वे ज़्यादा खरीदने की ज़्यादा संभावना रखते थे। इसी तरह, अगर लोगों को लगता था कि चीजों को जमा न करने में खतरा है, तो वे ज़्यादा खरीदते थे।

दिलचस्प बात यह है कि हमारे अध्ययन में कई ज़रूरी कारक घबराहट में की जाने वाली खरीदारी से नहीं जुड़े थे। उदाहरण के लिए, उम्र, लैंगिकता, आय और घर के आकार में अंतर से यह अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता था कि लोग ज़्यादा खरीदेंगे या नहीं।

इसके अलावा, लोगों के व्यक्तित्व की खासियतें – जैसे परेशानी और अनिश्चितता को सहना और पहले जमाखोरी की आदत – लगातार संग्रह करने का अंदाज़ा नहीं लगाती थीं।

इससे पता चलता है कि इस प्रकार की खरीदारी का व्यवहार काफी हद तक इस बात से तय होता है कि आम लोग खतरे को कैसे समझते हैं और अनिश्चित हालात में क्या सही लगता है, यह तय करते हैं।

बेहतर संदेश देना

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इन नतीजों के आधार पर, हमने एक ‘फॉलो-अप स्टडी’ की। इस बार, हमने अपनी शोध का इस्तेमाल एक ऐसा तरीका बनाने के लिए किया जो इस प्रकार की खरीदारी को रोक सके, फिर ऑस्ट्रेलियाई समाज के सदस्यों के एक नमूने पर इसका असर पता लगाया गया।

हमने उन्हें एक वीडियो दिखाया जिसमें आपूर्ति श्रंखला को स्थिर बताया गया था और इस बात पर ज़ोर दिया गया था कि आम तौर पर खरीदारी करने से समुदाय को कैसे मदद मिलती है और कमज़ोर लोगों की सुरक्षा होती है। इसने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि ज़्यादातर लोग ज़िम्मेदारी से पेश आ रहे थे और सही काम करने के बारे में साझा मूल्यों की अपील की।

इससे लोगों के संग्रह करने के इरादे कम हो गए। इसने सामाजिक नियमों के बारे में उनके नज़रिए और सोच को भी काफी हद तक बदल दिया। और उन्होंने संग्रह न करने को कम खतरा माना।

सबक जो हम सीख सकते हैं

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तो, इस बार घबराहट में की जाने वाली खरीदारी को रोकने में मदद के लिए हम एक समुदाय के तौर पर क्या सीख सकते हैं? कोविड के शुरुआती दौर में, कुछ नेताओं ने इसे “स्वार्थी” या “आस्ट्रेलियाई भावना के विपरीत” तक कहा था।

हालांकि, असल में इसे कम करने के लिए, स्मार्ट मैसेजिंग में लोगों की समझदारी का सम्मान करने और उनके डर को मानने की ज़रूरत है। यह भरोसा दिलाकर ऐसा कर सकता है, साथ ही यह भी मान सकता है कि जो दिक्कतें वे देख रहे हैं, वे असली हैं। फिर लोग फिर से सोच सकते हैं कि क्या संग्रह करना सच में ज़रूरी है।

इस बार कुछ अलग कारण हो सकते हैं। एक तो, शुरुआती कोविड में अफरा तफरी में इस प्रकार की खरीदारी ज़्यादातर कमी के कारण थी। 2020 की शुरुआत में कई उपभोक्ता उत्पादों की कीमतों में तुरंत तेज़ी नहीं आई थी।

अभी का तेल का झटका ईंधन की कीमतों पर तुरंत असर डाल रहा है। इससे घबराहट में की जाने वाली खरीदारी को बढ़ावा देने वाले कुछ मनोवैज्ञानिक कारण और बढ़ सकते हैं।

इससे यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि स्थिति को कैसे बताया जाए। हमारे शोध से पता चलता है कि इस प्रकार की खरीदारी स्वार्थ से कम और दूसरे लोग कैसे काम करते हैं, इससे ज़्यादा प्रभावित होती है।

ईंधन की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी से ये सोच और बढ़ सकती है। इसलिए भरोसा दिलाने, ज़िम्मेदार व्यवहार को सामान्य बनाने और लोगों में अपने समुदाय के प्रति ज़िम्मेदारी की भावना जगाने पर ध्यान देना चाहिए।

द कन्वरसेशन

नरेश

नरेश पवनेश

पवनेश


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